‘अगर मैं खाना खाने बैठ जाता तो बच्चों को बचाने में देर हो जाती’

डफरिन अग्निकांड में सीएस डॉ. विनोद पवार की साहसिक भूमिका

अमरावती/दि.26– डफरिन अस्पताल के एसएनसीयू (स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट) में हुए भीषण अग्निकांड के दौरान जहां तीन नवजातों की मौत ने पूरे शहर को झकझोर दिया, वहीं 36 नवजात शिशुओं को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए जिला शल्य चिकित्सक (सीएस) डॉ. विनोद पवार द्वारा दिखाई गई बहादुरी की भी हर ओर चर्चा हो रही है. जान जोखिम में डालकर धुएं और आग के बीच कक्ष में प्रवेश करने वाले डॉ. पवार ने कहा कि यदि वे कोल्हापुर में भोजन करने के लिए रुक गए होते तो शायद समय पर अमरावती नहीं पहुंच पाते और बच्चों को बचाने में देरी हो जाती.
* तड़के हुआ विस्फोट, धुएं से भर गया पूरा कक्ष
सोमवार तड़के डफरिन अस्पताल के एसएनसीयू कक्ष में वेंटिलेटर में भीषण विस्फोट हुआ. विस्फोट के बाद कुछ ही क्षणों में आग की लपटों और घने धुएं ने पूरे कक्ष को अपनी चपेट में ले लिया. स्थिति इतनी भयावह थी कि कक्ष के भीतर सांस लेना भी मुश्किल हो गया था. आग की तीव्रता से छत पर लगी आपातकालीन जल प्रणाली भी क्षतिग्रस्त हो गई और कांच के टुकड़े चारों ओर बिखर गए. उस समय कक्ष में भर्ती दर्जनों नवजात शिशुओं की जान पर बन आई थी. इसी बीच बचाव अभियान शुरू किया गया और 36 नवजातों को सुरक्षित बाहर निकाला गया.
* कोल्हापुर से लौटते ही पहुंचे घटनास्थल
जिला शल्य चिकित्सक डॉ. विनोद पवार एक शासकीय कार्यक्रम में भाग लेने के लिए कोल्हापुर गए हुए थे. कार्यक्रम समाप्त होने के बाद वहां मौजूद लोगों ने उन्हें भोजन के लिए आग्रह किया, लेकिन उन्होंने समय की कमी को देखते हुए भोजन नहीं किया और केवल फल लेकर रवाना हो गए. डॉ. पवार ने बताया कि वे सोमवार तड़के लगभग तीन बजे अमरावती स्थित अपने घर पहुंचे थे. घर पहुंचने के कुछ ही समय बाद उन्हें डफरिन अस्पताल में आग लगने की सूचना मिली. सूचना मिलते ही उन्होंने एक पल भी गंवाए बिना सीधे अस्पताल का रुख किया.
* भीषण धुएं के बीच कांच तोड़कर अंदर पहुंचे
अस्पताल पहुंचने पर एसएनसीयू कक्ष धुएं से पूरी तरह भर चुका था. अंदर फंसे नवजातों का दम घुटने का खतरा बढ़ता जा रहा था. हालात की गंभीरता को देखते हुए डॉ. पवार ने तुरंत एक चादर को पानी में भिगोया, उसे अपने ऊपर लपेटा और एसएनसीयू कक्ष की मुख्य कांच की दीवार तोड़कर अंदर प्रवेश किया. घना धुआं होने के कारण अंदर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था. बचाव कार्य के दौरान धुएं के कारण डॉ. पवार खुद भी गिर पड़े और उन्हें मामूली चोट लगी. इसके बावजूद उन्होंने पीछे हटने के बजाय नर्सिंग स्टाफ की मदद से कक्ष में भरे धुएं को बाहर निकालने का रास्ता बनाया.
* बच्चों की जान बच गई, यही सबसे बड़ा संतोष
जिला शल्य चिकित्सक डॉ. पवार ने बताया कि कोल्हापुर में भोजन न करने का जो निर्णय उन्होंने लिया था, वही समय इस आपदा में काम आया. उन्होंने कहा, अगर मैं वहां भोजन के लिए रुक गया होता तो अमरावती पहुंचने में देर हो जाती. ईश्वर की कृपा से बचा हुआ वही समय 36 नवजातों की जान बचाने के काम आया. हादसे का दुख जरूर है, लेकिन बच्चों को सुरक्षित निकाल पाने का संतोष भी है.
* नर्सिंग स्टाफ ने भी निभाई अहम भूमिका
बचाव अभियान में अस्पताल के नर्सिंग स्टाफ और अन्य कर्मचारियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. धुएं और अफरा-तफरी के बीच सभी ने मिलकर नवजातों को एक-एक कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया. समय पर किए गए इस प्रयास के कारण बड़ी संख्या में बच्चों की जान बचाई जा सकी. डफरिन अस्पताल के इस अग्निकांड ने जहां सुरक्षा व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, वहीं संकट की घड़ी में डॉ. विनोद पवार और चिकित्सा कर्मियों द्वारा दिखाई गई तत्परता और साहस ने मानवता की एक मिसाल भी पेश की है.

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