‘उस’ मादा बाघिन के शव का हुआ पोस्टमार्टम
परतवाडा के रेस्क्यू सेंटर में पूरी की गई पीएम की प्रक्रिया

* प्रथमदृष्टया ‘कार्डियो-रेस्पिरेटरी फेल्योर’ सामने आया
* मौत की असली वजह जानने नमूने फोरेंसिक लैब भेजे
* हिस्टोपैथोलॉजी और टॉक्सिकोलॉजी रिपोर्ट से खुलेगा मौत का राज
अमरावती/दि.8 – चार लोगों की जान लेने वाली नरभक्षी बाघिन ‘पिंकी’ की जेरबंदी के बाद उपचार के दौरान हुई मौत की जांच अब वैज्ञानिक स्तर पर पहुंच गई है. मंगलवार को पशु चिकित्सकीय अधिकारियों की विशेष टीम ने राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की नियमावली के अनुसार बाघिन के शव का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम में प्रथमदृष्टया मौत का कारण ‘कार्डियो-रेस्पिरेटरी फेल्योर’ यानी हृदय और श्वास-प्रश्वास की क्रिया बंद होना सामने आया है. हालांकि, इसे अंतिम कारण नहीं माना गया है. मौत की वास्तविक और सटीक वजह पता लगाने के लिए बाघिन के शरीर के विभिन्न अंगों और ऊतकों के नमूने सुरक्षित किए गए हैं. इन नमूनों को हिस्टोपैथोलॉजी और टॉक्सिकोलॉजी जांच के लिए न्यायवैद्यक प्रयोगशाला भेजा जा रहा है. इन जांचों की अंतिम रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि बाघिन की मौत किन परिस्थितियों में हुई.
इस संदर्भ में वन विभाग द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, ‘पिंकी’ नामक बाघिन की मौत सोमवार, 7 सितंबर की शाम उपचार के दौरान हुई थी. इसके बाद उसके शव को परतवाडा के रेस्क्यू सेंटर ले जाकर सुरक्षित रखा गया, जहां पर मंगलवार को पशु चिकित्सकीय अधिकारियों की टीम ने एनटीसीए द्वारा निर्धारित नियमों और प्रक्रिया के तहत पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम के दौरान बाघिन के शरीर की आंतरिक स्थिति का चिकित्सकीय परीक्षण किया गया तथा आवश्यक अंगों और ऊतकों के नमूने सुरक्षित किए गए. मौत के कारण को वैज्ञानिक तरीके से निर्धारित करने के लिए इन नमूनों को आगे की जांच के लिए भेजा जा रहा है. प्रथमदृष्टया हृदय और श्वास-प्रश्वास की क्रिया बंद होने की स्थिति सामने आई है. हालांकि, यह स्थिति कई अलग-अलग चिकित्सकीय कारणों से उत्पन्न हो सकती है. इसलिए केवल पोस्टमार्टम के शुरुआती निष्कर्ष के आधार पर मौत का अंतिम कारण निर्धारित नहीं किया जा सकता.
बता दे कि, ‘पिंकी’ नामक बाघिन को शिरजगांव कसबा क्षेत्र में जेरबंद करने के दौरान बेहोशी की दवा देकर बेहोश किया गया था. जिसे अपने कब्जे में लेने के बाद पशु चिकित्सकीय विशेषज्ञों ने तत्काल उसका उपचार शुरू किया था. उपचार के बावजूद उसने पर्याप्त प्रतिक्रिया नहीं दी और शाम को उसकी मौत हो गई. ऐसे में अब बाघिन को बेहोश करने के लिए इस्तेमाल किए गए डार्ट और दवा की मात्रा को लेकर विभिन्न माध्यमों में अलग-अलग चर्चाएं और दावे सामने आ रहे हैं. इन्हीं चर्चाओं के बीच टॉक्सिकोलॉजी जांच महत्वपूर्ण हो गई है. टॉक्सिकोलॉजी परीक्षण के माध्यम से बाघिन के शरीर में दवाओं या अन्य रासायनिक पदार्थों की मौजूदगी और उनकी मात्रा का वैज्ञानिक परीक्षण किया जा सकेगा. इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि शरीर में इस्तेमाल की गई दवा की स्थिति क्या थी और उसका कोई प्रभाव मौत से संबंधित था या नहीं. इसी तरह हिस्टोपैथोलॉजी जांच में शरीर के ऊतकों की सूक्ष्म स्तर पर जांच की जाएगी. इससे किसी बीमारी, अंदरूनी क्षति अथवा अन्य असामान्य स्थिति के संकेत मिलने की संभावना है.
अमरावती प्रादेशिक विभाग के उपवनसंरक्षक अर्जुना के.आर. ने स्पष्ट किया कि पोस्टमार्टम में कार्डियो-रेस्पिरेटरी फेल्योर प्रथमदृष्टया सामने आया है, लेकिन बाघिन की मौत का अंतिम और सटीक कारण न्यायवैद्यक प्रयोगशाला की रिपोर्ट मिलने के बाद ही स्पष्ट होगा. वन विभाग ने इस मामले में सामने आ रही अटकलों के बीच वैज्ञानिक जांच को प्राथमिकता दी है. इसलिए फिलहाल दवा की मात्रा, ट्रैंक्युलाइजेशन प्रक्रिया या किसी अन्य कारण को मौत के लिए जिम्मेदार मानना उचित नहीं होगा. अंतिम निष्कर्ष विशेषज्ञ जांच रिपोर्ट के आधार पर ही निकाला जाएगा. अब सभी की निगाहें हिस्टोपैथोलॉजी और टॉक्सिकोलॉजी जांच की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं. यही रिपोर्ट यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि पिंकी की मौत के पीछे वास्तविक चिकित्सकीय कारण क्या था और जेरबंदी के बाद उसकी बिगड़ी हालत के पीछे कौन-से कारक जिम्मेदार थे.





