मैं वही आदमखोर पिंकी बोल रही हूँ…

क बाघिन की पीड़ा, जो सिर्फ शिकार नहीं, इंसान की संवेदनहीनता की शिकार हुई
मैं वही आदमखोर पिंकी बोल रही हूँ, मेरी आँखों में गहराता वह अँधेरा, मेरे शरीर में धीरे-धीरे जमता वह ज़हर, जिसे तुम ट्रैंक्विलाइज़र यानी बेहोशी की दवा कहते हो. मैं वही आदमखोर पिंकी बोल रही हूँ, जिसके नाम के आगे तुमने रातों-रात ‘आदमखोर’, ‘कातिल’ और ‘खूंखार’ जैसे तमगे चिपका दिए. पर मरने से पहले, अपने भारी होते पंजों और बुझती हुई सांसों के बीच, मैं तुमसे कुछ पूछना चाहती हूँ. क्या तुमने कभी मेरी बेबसी और मेरे टूटे हुए दिमाग की चीख को सुनने और पढ़ने की कोशिश की? जंगल मेरा, घर मेरा जो सदियों से मेरी माँ, मेरी नानी और मेरी नस्लों का ठिकाना था, वह अचानक और धीरे-धीरे गायब हो गया. मैं वर्षों की छांव से निकली एक सुरक्षित कोने की तलाश में, लेकिन जहाँ भी कदम रखा, वहाँ पेड़ों की जगह कांक्रीट के खंभे, कटीले तार के घेरे और शोर उगलती गाड़ियों थी. तुम कहते हो मैं अमरावती के ‘ग्रामीण क्षेत्र’ में आ गई. सच तो यह है कि तुम्हारे खेत, तुम्हारी सड़कें और तुम्हारी बस्तियाँ मेरे घर के आंगन पर बनाई गई. तुमने मेरा घर उजाड़ा, पर जब मैं बेघर होकर भटकी, तो मुझे ‘घुसपैठिया’ कह दिया… वाह रे इंसान…
तुमने कभी सोचा कि उस भटकाव, उस अंतहीन शोर और लगातार पीछा करती मौत की दहशत ने मेरे दिमाग के साथ क्या किया होगा? जंगल की एक गर्वित रानी को दो पैरों वाले, कमजोर इंसान पर हमला क्यों करना पड़ा? क्या मुझे तुम्हारा मांस पसंद था? नहीं! जब मेरा संतुलन बिगड़ गया था तब इंसान बस्तियों के शोर और रोशनी ने मुझे हफ़्तों भूखा रखा तब भूख से फटते पेट, रोशनी और पटाखों के धमाकों से सहमते दिल,को पत्तों की सरसराहट पर भी जान का खतरा महसूस होता. तब मैंने वह कदम उठाया. जो मेरी क्रूरता नहीं बल्कि जीवित रहने की आखिरी कोशिश थी. इस सबने मेरे सोचने-समझने की शक्ति को पूरी तरह तोड़ दिया था.
हाँ, मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ चुका होगा. मैं पागल हो रही होगी, उस डर से जो तुमने मेरे चारों तरफ फैलाया था. वह आक्रामकता मेरी फितरत नहीं थी, वह मेरे टूटे हुए, विक्षिप्त दिमाग की आत्मरक्षा होगी. चार मौतें और मीडिया की दहशत-चार लोगों की मौत पर तुमने मातम मनाया, मीडिया में मेरी दहशत के किस्से गढ़े और वन विभाग की बंदूकों को मेरे पीछे लगा दिया. चार लोगों की मौत का दर्द मुझे भी महसूस होता, अगर मेरे भीतर का होश सलामत होता. पर उस खौफ का क्या, जो हर पल मैंने झेला? रात भर जलती सर्चलाइटें, पटाखों के धमाके, लाठी-डंडों की गूंज और सैकड़ों आदमियों का वह भयानक, हिंसक घेरा. मैं एक माँ, एक बेटी, जंगल का एक स्वतंत्र जीव थी, जिसे तुमने चारों तरफ से घेरकर एक बीमार, पागल और डरे हुए जीव से सीधा ‘दुश्मन’ बना दिया.
क्या तुम्हारी इंसानियत सिर्फ इंसानों के लिए है और यहीं मैं तुम्हारी उस तथाकथित ‘इंसानियत’ से पूछना चाहती हूँ, जब तुम्हारा कोई अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है, जब कोई इंसान डिप्रेशन या पागलपन के दौरे में किसी को चोट पहुँचा देता है, तो क्या तुम उसे सड़क पर दौड़ाकर सीधे गोली मार देते हो? क्या उसे सीधे मौत की सजा दी जाती है? नहीं! तुम उसे अस्पताल ले जाते हो, उसका इलाज करते हो, उसके पागलपन के पीछे का दर्द समझने की कोशिश करते हो. फिर मेरे साथ यह दोहरा मापदंड क्यों? सिर्फ इसलिए कि मेरे पास तुम्हारी भाषा नहीं थी? सिर्फ इसलिए कि मैं चार पैरों पर चलती थी?
कई दिनों तक तुम्हारी प्रशासनिक टीमें लापरवाही से तमाशा देखती रहीं. जब स्थिति संभल सकती थी, जब मुझे सुरक्षित तरीके से वापस जंगल के किसी गहरे कोने, किसी पिंजरे या रेस्क्यू सेंटर में भेजा जा सकता था, तब किसी ने तत्परता नहीं दिखाई. क्या एक सुरक्षित अभयारण्य की गुंजाइश भी तुम्हारी इस विशाल धरती पर मेरे लिए नहीं थी और जब पानी सिर से ऊपर निकल गया, जब जनता का दबाव बढ़ा, तो अपनी नाकामी और लापरवाही का पल्ला झाड़ने के लिए सबसे असाना रास्ता चुना गया मुझे मौत के घाट उतार देना और फिर वह डार्ट मेरी खाल में आकर चुभा। तुमने आसानी से ट्रिगर दबा दिया और मुझे एक बेबस, तड़पती मौत दे दी। वह ट्रैंक्विलाइजर मुझे बचाने के लिए नहीं, बल्कि एक झटके में तुम्हारी फाइलों को बंद करने के लिए दागा गया था।
तुम्हारी जीत, मेरी हार, तुमने मुझे मारकर जश्न मनाया कि तुमने इंसानों को बचा लिया। लेकिन अपनी इस जीत के अहंकार में तुमने यह नहीं देखा कि यह व्यवस्था की लाचारी को छिपाने के लिए प्रकृति के साथ किया गया एक और निर्मम पशुसंहार था। तुमने पहले मेरी ज़मीन छीनी, फिर मेरी भूख को मजबूर किया, और अंत में मुझे ही मुज़रिम बनाकर खत्म कर दिया। मेरी सांसें अब टूट रही हैं। मैं जा रही हूँ, पर यह सवाल तुम्हारे जंगलों की हवा में, तुम्हारी अदालतों और अंतरात्मा के सामने हमेशा गूंजता रहेगा. अगर अपने अस्तित्व को बचाना अपराध है, अगर बीमार और विक्षिप्त हो जाना अपराध है, तो बताओ इस धरती का सबसे बड़ा आदमखोर कौन है और सबसे पहले इलाज की जरूरत किसे थी, मुझे, या तुम्हारी इस संवेदनहीन इंसानियत को?
शब्दांकन:
उज्ज्वल अग्रवाल
अंतर्राष्ट्रीय कथा प्रवक्ता

Back to top button