पिंकी : जिस बाघिन से हम डरे, उससे जुड़े सवालों से क्यों डरें?

करीब 20 दिनों तक वर्धा और आसपास के जिलों के लोग एक अनजाने भय के साये में जीते रहे. एक बाघिन वर्धा जिले में दाखिल हुई और फिर आसपास के इलाकों में लगातार अपना ठिकाना बदलती रही. कभी गांवों के आसपास, कभी खेतों में और कभी जंगल से लगे इलाकों में उसकी मौजूदगी दिखाई देती और फिर वह अचानक गायब हो जाती. उसके लिए यह पूरा इलाका महज उसका प्राकृतिक आवास था. लेकिन इंसानों के लिए उसकी मौजूदगी डरावने खौफ में बदल चुकी थी.
उसका नाम था-पिंकी.
जब उसकी कहानी खत्म हुई, तब तक चार इंसानी जिंदगियां जा चुकी थीं. आसपास के गांवों में दहशत थी. किसान खेतों में जाने से डर रहे थे. लोग अंधेरा होने के बाद घरों से निकलने से बच रहे थे. भारत के असाधारण वन्यजीवन का प्रतीक माना जाने वाला बाघ एकाएक लोगों के लिए भय का पर्याय बन गया था. आखिरकार शिरजगांव कस्बा में पिंकी को ट्रैंक्विलाइज कर काबू में लिया गया. लेकिन यहीं उसकी कहानी खत्म नहीं होती. वास्तव में, यहीं से उन सवालों की शुरुआत होती है, जिनसे हमें डरना नहीं चाहिए.
* 20 दिन, चार मौतें और लगातार चलती रही एक बाघिन
बताया गया कि पिंकी ने अष्टी के रास्ते वर्धा जिले में प्रवेश किया और आगे बढ़ते हुए मोर्शी, चांदूर बाजार तथा आसपास के क्षेत्रों तक पहुंची. एक बाघिन का इतने बड़े भू-भाग में लगातार विचरण करना हमें ठहरकर सोचने को मजबूर करता है. बाघ जिला सीमाओं को नहीं समझता. उसे राजस्व नक्शों, राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्रों या प्रशासनिक सीमाओं की जानकारी नहीं होती. वह अपने लिए शिकार, पानी, सुरक्षित आवास और क्षेत्र की तलाश करता है. हमने कागज पर जो सीमाएं खींच रखी हैं, उनका वन्यजीवों के लिए कोई अर्थ नहीं. लेकिन जैसे ही कोई वन्यजीव इंसानी भू-दृश्य में प्रवेश करता है, हम उससे उम्मीद करने लगते हैं कि वह हमारी बनाई सीमाओं को समझे. यही विरोधाभास भारत में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष की जड़ में है. पिंकी महज ऐसी बाघिन नहीं थी, जो एक सुबह अचानक किसी गांव में दिखाई दे गई. वह ऐसे भू-दृश्य से गुजर रही थी, जिस पर इंसानी बस्तियों, खेती, सड़कों और दूसरी गतिविधियों का लगातार विस्तार हुआ है. * रेस्क्यू ऑपरेशन और कुछ जरूरी सवाल
पिंकी को पकड़ने का अभियान वन विभाग के अधिकारियों और एक गैर-सरकारी संगठन की टीम ने मिलकर चलाया. लंबे और चुनौतीपूर्ण अभियान के बाद उसे ट्रैंक्विलाइज किया गया. उल्लेखनीय है कि अभियान के दौरान बाघिन को दो बार बेहोश करने के लिए ट्रैंक्विलाइजर का इस्तेमाल किया गया. पहली बार हस्तक्षेप के बाद पिंकी को मोर्शी स्थित एक स्कूल परिसर में प्राथमिक उपचार दिया गया. यहीं एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है-यदि बाघिन को अंततः टाइगर ट्रीटमेंट सेंटर (टीटीसी) ले जाना था, तो प्राथमिक उपचार के लिए स्कूल परिसर को क्यों चुना गया? क्या यह तत्काल परिस्थितियों में लिया गया आपातकालीन निर्णय था? क्या उस समय बाघिन को सीधे किसी विशेषज्ञ उपचार केंद्र तक ले जाना संभव नहीं था? क्या नजदीक कोई विशेषीकृत सुविधा उपलब्ध थी? इन सवालों को वन विभाग या रेस्क्यू टीम के खिलाफ आरोप के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.
बड़े मांसाहारी वन्यजीव का रेस्क्यू बेहद कठिन और जोखिमपूर्ण कार्य है. एक-एक निर्णय लेते समय वन्यजीव के साथ-साथ आम नागरिकों, रेस्क्यू टीम, वन अधिकारियों और पशु चिकित्सकों की सुरक्षा का भी ध्यान रखना पड़ता है. लेकिन जब दांव इतना बड़ा हो, तब हर निर्णय में पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी हो जाती है. * और फिर पिंकी ने आखिरी सांस ली…
आगे के उपचार के लिए पिंकी को नागपुर ले जाया जा रहा था. इसी दौरान उसकी मौत हो गई. जिस बाघिन की मौजूदगी ने कई गांवों में भय पैदा कर दिया था, वह अचानक इस दुनिया से चली गई. चार इंसानी परिवारों के लिए यह त्रासदी अपूरणीय है. किसी भी मुआवजे से अपने प्रियजन की कमी पूरी नहीं हो सकती. राज्य ने मृतकों के परिवारों को नियमानुसार मुआवजा दिया है तो यह जरूरी और उचित कदम है. लेकिन एक और सवाल है, जिसे हम आम तौर पर पूछते ही नहीं. * वन्यजीव की मौत की पारिस्थितिक कीमत क्या है?
मानव-वन्यजीव संघर्ष में हमारा आकलन आम तौर पर इंसानी जान, फसल और संपत्ति के नुकसान तक सीमित रहता है. लेकिन एक प्रजननक्षम उम्र की मादा बाघिन की मौत को क्या केवल आर्थिक मुआवजे की राशि में मापा जा सकता है? पिंकी सिर्फ एक बाघिन नहीं थी. वह एक पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा थी. एक शीर्ष शिकारी के रूप में उसकी भूमिका उस जंगल और उसके आसपास की जैविक व्यवस्था से जुड़ी थी. पहले से दबाव झेल रही वन्यजीव आबादी के लिए एक बाघ की मौत केवल एक संख्या नहीं है. मृत इंसान के परिवार को मुआवजा दिया जा सकता है, लेकिन किसी पारिस्थितिक तंत्र में खोए वन्यजीव की भूमिका वापस लाने के लिए कोई चेक नहीं लिखा जा सकता. शायद यही वह असहज सवाल है, जिस पर हमें अब गंभीरता से बात शुरू करनी होगी. * क्या हर प्रोटोकॉल का पालन हुआ?
इस पूरे घटनाक्रम में एक और सवाल की वस्तुनिष्ठ जांच जरूरी है. क्या राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की लागू मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) और अन्य निर्धारित प्रोटोकॉल का हर स्तर पर पालन किया गया? इसका जवाब सोशल मीडिया, राजनीतिक बयानों या एक-दूसरे के खिलाफ खड़े किए गए अलग-अलग दावों से नहीं मिलना चाहिए. जवाब रिकॉर्ड से मिलना चाहिए.
पिंकी की वास्तविक स्वास्थ्य स्थिति क्या थी? उसे कितनी मात्रा में ट्रैंक्विलाइजर दिया गया? बेहोश होने के बाद उसे किस प्रकार का उपचार मिला? उसे प्राथमिक उपचार के लिए मोर्शी क्यों ले जाया गया? क्या उस समय कोई विशेषीकृत टाइगर ट्रीटमेंट सेंटर उपलब्ध था? नागपुर ले जाते समय उसकी हालत कैसी थी? और अंततः उसकी मौत का चिकित्सकीय कारण क्या था? ये सवाल किसी संस्था को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं हैं. ये जवाबदेही के सवाल हैं. यदि हर प्रोटोकॉल का पालन हुआ है, तो स्वतंत्र और पारदर्शी स्पष्टीकरण से वन विभाग के प्रति जनता का भरोसा और मजबूत होगा. और यदि कहीं कोई चूक हुई है, तो उसे सामने लाकर उससे सीख लेना जरूरी होगा. दोनों ही परिस्थितियों में चुप्पी किसी के हित में नहीं है. * वन विभाग को ही खलनायक बना देना आसान है
ऐसी घटनाओं के बाद अक्सर सबसे आसान रास्ता होता है, किसी एक को दोषी ठहरा देना. और कई बार निशाना सीधे वन विभाग बन जाता है. लेकिन इसके साथ एक बड़ी और असहज सच्चाई को भी स्वीकार करना होगा. हम इंसानों ने लगातार वन्यजीवों के इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है. जंगलों के किनारों तक गांव पहुंचे हैं. जंगल से लगी जमीनों पर खेती बढ़ी है. सड़कें बनी हैं. आवासीय क्षेत्र बढ़े हैं. प्राकृतिक आवास छोटे-छोटे हिस्सों में बंटते गए हैं. जब कोई वन्यजीव हमारे द्वारा बदले गए भू-दृश्य में आ जाता है, तो हम उसे ‘वन्यजीवों की घुसपैठ’ कहते हैं. लेकिन बाघ के नजरिए से कहानी शायद बिल्कुल अलग हो. हो सकता है, वह अपने पुराने रास्ते पर ही चल रहा हो और हम उसके रास्ते में आ गए हों. * राजनीति और वन्यजीव संरक्षण का मेल खतरनाक हो सकता है
इस पूरे मामले का एक और पहलू नजरअंदाज नहीं किया जा सकता-लगातार बढ़ता राजनीतिक और सार्वजनिक दबाव. एक बड़े मांसाहारी वन्यजीव का रेस्क्यू अभियान अपने आप में बेहद कठिन होता है. उस पर राजनीतिक दबाव, जनता की बेचैनी, मीडिया का दबाव और अलग-अलग हितों का हस्तक्षेप स्थिति को और जटिल बना सकता है. बाघ का रेस्क्यू किसी राजनीतिक कार्यक्रम की तरह संचालित नहीं किया जा सकता. बाघ राजनीतिक मंशा नहीं समझता. वह चुनाव नहीं समझता. उसे यह भी नहीं पता कि उसके आसपास कैमरों और लोगों की भीड़ क्यों जमा है. रेस्क्यू के दौरान उसके लिए सिर्फ दो बातें मायने रखती हैं, सुरक्षा और जीवित रहने की संभावना. इसलिए हर निर्णय विशेषज्ञों के वैज्ञानिक आकलन पर आधारित होना चाहिए, न कि इस आधार पर कि कौन सबसे ऊंची आवाज में मांग कर रहा है. * बाघ रेस्क्यू का मेरा व्यक्तिगत अनुभव
कुछ वर्ष पहले मुझे मेलघाट में बाघ को पकड़ने और उसके पुनर्वास की एक कार्रवाई को करीब से देखने का अवसर मिला था. उस अनुभव ने यह समझाया कि बड़े मांसाहारी वन्यजीव का सफल रेस्क्यू असंभव नहीं है. लेकिन ऐसे अभियानों में सफलता और त्रासदी के बीच का अंतर कई बार बहुत छोटे-से निर्णय में छिपा होता है-और वह निर्णय अत्यधिक दबाव और जोखिम के बीच लेना पड़ता है. इसीलिए रेस्क्यू ऑपरेशन में विशेषज्ञता, तैयारी, चिकित्सा सुविधा और स्पष्ट प्रोटोकॉल बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं.
* पिंकी की मौत सिर्फ एक खबर बनकर न रह जाए
आज तत्काल भय खत्म हो गया है. धीरे-धीरे बैरिकेड हट जाएंगे. गांवों में सामान्य जिंदगी लौट आएगी. किसान फिर खेतों में जाएंगे. खबरों का सिलसिला आगे बढ़ जाएगा और पिंकी भारत के मानव-वन्यजीव संघर्ष की लंबी सूची में एक और नाम बनकर रह जाएगी. लेकिन अगर ऐसा ही हुआ, तो हमने इस घटना से कुछ नहीं सीखा. पिंकी की मौत हमें बड़े सवाल पूछने के लिए मजबूर करनी चाहिए. आखिर इंसानों और बड़े मांसाहारी वन्यजीवों के बीच टकराव लगातार क्यों बढ़ रहा है? क्या वन्यजीव कॉरिडोर पर्याप्त रूप से सुरक्षित हैं? क्या जंगलों के आसपास बसे गांवों और कृषि क्षेत्रों का नियोजन वन्यजीवों की आवाजाही को ध्यान में रखकर किया जा रहा है? क्या रेस्क्यू प्रोटोकॉल हर जगह एक समान और वैज्ञानिक तरीके से लागू किए जा रहे हैं? क्या किसी वन्यजीव को पकड़ने, स्थानांतरित करने या छोड़ने के फैसले पूरी तरह वैज्ञानिक आधार पर लिए जाते हैं? क्या हमारे पास पर्याप्त विशेषीकृत वन्यजीव उपचार केंद्र और प्रशिक्षित पशु चिकित्सा सुविधाएं हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया का दबाव पेशेवर वन्यजीव प्रबंधन के निर्णयों को प्रभावित कर रहा है? * संरक्षण रेस्क्यू से बहुत पहले शुरू होता है
वन्यजीव संरक्षण तब शुरू नहीं होता, जब कोई बाघ गांव में पहुंच जाता है और उसे पकड़ने के लिए रेस्क्यू टीम पहुंचती है. संरक्षण बहुत पहले शुरू हो जाता है-आवासों की रक्षा से, वन्यजीव कॉरिडोर सुरक्षित रखने से, जिम्मेदार भूमि उपयोग नियोजन से और वन्यजीवों के लिए आवश्यक प्राकृतिक स्थान का सम्मान करने से. चार परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है. उन्हें न्याय, सुरक्षा, सम्मान और उचित मुआवजे की जरूरत है. जिन किसानों के मवेशी मारे गए, उन्हें सहायता चाहिए. जिन गांवों के लोग भय में रहे, उन्हें सुरक्षा और भरोसा चाहिए और पिंकी को भी एक ऐसी रेस्क्यू कार्रवाई मिलनी चाहिए थी, जो उपलब्ध सर्वोत्तम वैज्ञानिक समझ, विशेषज्ञता और पशु चिकित्सा देखभाल से संचालित होती.
ये एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्य नहीं हैं. ये सभी हमारी एक ही सामूहिक जिम्मेदारी का हिस्सा हैं. पिंकी को बचाने की कोशिश के दौरान उसकी मौत हो गई. लेकिन उसकी मौत इस बातचीत का अंत नहीं होनी चाहिए. शायद यही बातचीत की शुरुआत होनी चाहिए. क्योंकि अगला बाघ पिंकी के बारे में कुछ नहीं जानता होगा. अगला गांव भी शायद यह नहीं जानता होगा कि यहां क्या हुआ था. और यदि हमने इस घटना से सबक नहीं लिया, तो संभव है कि किसी दिन हम फिर किसी ट्रैंक्विलाइज किए गए बाघ के सामने खड़े हों, चारों ओर कैमरे हों, भीड़ हो, राजनीतिक दबाव हो और हमारे सामने वही सवाल हों. लेकिन तब शायद सवाल पूछने में बहुत देर हो चुकी होगी, आखिर हम इस बार इससे बेहतर क्यों नहीं कर सके? – एड. प्रथमेश दिलीप तिवारी
वन एवं वन्यजीव अभ्यासक





