भक्तों के उद्धार के लिए मंगरुल दस्तगीर में प्रकट हुईं मंगलामाता
मंगल दोष निवारण के लिए विदर्भ का जागृत शक्तिपीठ

माहुर की मां रेणुका से जुड़ी है करीब 200 साल पुरानी मान्यता
धामणगांव रेलवे/दि.16 – अमरावती जिले के धामणगांव रेलवे तहसील अंतर्गत मंगरुल दस्तगीर स्थित मंगलामाता उपशक्ति पीठ देशभर के लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है. मान्यता है कि करीब 200 वर्ष पहले माहुर की मां रेणुका एक वृद्ध भक्त की पुकार पर इस पवित्र भूमि में प्रकट हुई थीं. मंगल दोष के निवारण और विवाह में आने वाली बाधाओं से मुक्ति की कामना लेकर श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है और भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है.
मंगरुल दस्तगीर की धार्मिक पहचान केवल मंगलामाता मंदिर तक सीमित नहीं है. यह गांव संत परंपरा, ऐतिहासिक मंदिरों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख पदाधिकारियों के साथ अपने जुड़ाव के लिए भी जाना जाता है. संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर, जिन्हें गुरुजी के नाम से जाना जाता है, का जन्म इसी गांव में वर्ष 1942 में हुआ था. वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भी 24 फरवरी 2024 को यहां पहुंचकर मंगलामाता के दर्शन और पूजा-अर्चना की थी.
* माहुर की मां रेणुका भक्त की पुकार पर दौड़ी चली आईं
मंगलामाता मंदिर की स्थापना से जुड़ी मान्यता करीब दो शताब्दी पुरानी है. कहा जाता है कि गांव का एक वृद्ध भक्त बीमारी के कारण माहुर गढ़ पर मां रेणुका के दर्शन करने नहीं जा सका. माता के दर्शन की तीव्र इच्छा से उसने भावपूर्ण प्रार्थना की. मान्यता है कि भक्त की पुकार सुनकर मां रेणुका ने उसके गांव आने का वचन दिया. स्थानीय धार्मिक परंपरा के मुताबिक एक संत की पूजा से संबंधित देवी का मुखौटा गांव में ही रह गया था. इसके बाद चैत्र शुद्ध चतुर्दशी के दिन माता के साक्षात प्रकट होने की मान्यता प्रचलित हुई. तभी से यहां मां की पूजा-अर्चना और मन्नत मांगने की परंपरा चली आ रही है. आज भी श्रद्धालु माता के चरणों में नारियल और ओटी अर्पित कर अपनी मनोकामनाएं व्यक्त करते हैं. भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना पर माता अपने भक्तों को आशीर्वाद देती हैं.
* गुफा में विराजमान हैं सिंदूर से सजी चतुर्भुजी मंगलामाता
मंगरुल दस्तगीर गांव को स्थानीय स्तर पर बारा मुंडा का पुराना गांव भी कहा जाता है. गांव से लगभग एक किलोमीटर पश्चिम दिशा में पूर्वाभिमुख मंगलामाता का मंदिर स्थित है. बताया जाता है कि जिस स्थान पर आज मंदिर है, वहां पहले घना जंगल था. स्थानीय मान्यता के अनुसार, देवी ने पुजारी को दर्शन देकर इसी स्थान पर मंदिर निर्माण करने का निर्देश दिया था. मंदिर की गुफा में सिंदूर से सजी चतुर्भुजी देवी की प्रतिमा विराजमान है. श्रद्धालु उन्हें अपनी कुलस्वामिनी मानकर पूजा करते हैं. माता के दर्शन के लिए विदर्भ के विभिन्न जिलों से श्रद्धालु पहुंचते हैं. विशेष रूप से विवाह में बाधाओं, संतान सुख, पारिवारिक समस्याओं और खेती-बाड़ी से संबंधित परेशानियों के समाधान की कामना से भक्त यहां पूजा-अर्चना करते हैं.
* मंगल दोष निवारण के लिए विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं में मंगलामाता को मंगल ग्रह की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है. देवी भागवत में वर्णित मंगलचंडी की आराधना से भी इस परंपरा को जोड़ा जाता है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माता की पूजा से मंगल दोष से संबंधित परेशानियों और विवाह में आने वाली बाधाओं के निवारण के लिए आशीर्वाद प्राप्त होता है. विदर्भ के अनेक परिवार मंगलामाता को अपनी कुलदेवी मानते हैं. विवाह संबंध तय होने पर शुभ कार्य की शुरुआत माता के दर्शन से करने और विवाह का पहला निमंत्रण पत्र उनके चरणों में अर्पित करने की परंपरा भी प्रचलित है. इसी धार्मिक आस्था के कारण इस मंदिर को विदर्भ के प्रमुख शक्तिपीठों में विशेष स्थान प्राप्त है. श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए यहां सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना भी करते हैं.
* गोलवलकर गुरुजी का जन्मस्थान, डॉ. मोहन भागवत ने भी किए दर्शन
मंगरुल दस्तगीर गांव का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास से भी विशेष संबंध है. संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर का जन्म वर्ष 1942 में इसी गांव में हुआ था. इसके अतिरिक्त, संघ के वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 24 फरवरी 2024 को मंगलामाता मंदिर में दर्शन कर पूजा-अर्चना की थी. धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक जुड़ाव के कारण यह स्थान क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है.
* संतों की तपोभूमि, प्राचीन मंदिरों की समृद्ध विरासत
मंगरुल दस्तगीर की भूमि संत लहानुजी महाराज और संत गणपति महाराज की स्मृतियों से भी जुड़ी बताई जाती है. गांव में प्राचीन मारुति मंदिर, बालाजी मंदिर और गणपति मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र हैं. गांव का दत्त मंदिर भी अपनी स्थापत्य शैली के लिए विशेष रूप से जाना जाता है. बताया जाता है कि गोविंदराव पाकोड़े ने करीब 60 वर्ष पहले एक लाख रुपये की लागत से इस मंदिर का निर्माण कराया था. राजस्थान के पीले नक्काशीदार पत्थरों से निर्मित इस मंदिर की वास्तुकला आकर्षण का केंद्र है. इसके अलावा, संन्यास ग्रहण करने के बाद स्वामी शीलानंद सरस्वती ने भी ध्यान-साधना के लिए इसी स्थान को चुना था. इससे गांव की धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा का महत्व और बढ़ जाता है. वर्ष 2000 में मंगलामाता मंदिर के नवीनीकरण के दौरान कौंडण्यपुर के शंकराचार्य भगवत महाराज द्वारा कहे गए वाक्य ‘बाल वत्थी ये मी आत पहते’ को भी मंदिर की परंपरा से जोड़ा जाता है. इसका भावार्थ है-‘लौट आओ बच्चे, मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं.’ यह वाक्य मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं के भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है.
* नवरात्रि में अखंड ज्योत, दुर्गा सप्तशती पाठ और महाप्रसाद
मंगलामाता मंदिर में मंगलवार, शुक्रवार और नवरात्रि के अवसर पर विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. इनमें अखंड ज्योत, दुर्गा सप्तशती का पाठ, विशेष पूजा-अर्चना और महाप्रसाद वितरण शामिल हैं. नवरात्रि के दिनों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मंदिर परिसर में धार्मिक वातावरण बना रहता है और भक्त अपनी कुलदेवी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पूजा-अर्चना करते हैं. मंगरुल दस्तगीर का पिनकोड 444711 है. मुंबई-हावड़ा रेलवे मार्ग पर स्थित धामणगांव रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी लगभग 8 से 10 किलोमीटर बताई जाती है. गांव अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान के लिए भी जाना जाता है.
* मंदिर प्रबंधन संभाल रहा धार्मिक परंपराओं की जिम्मेदारी
मंगलामाता मंदिर की व्यवस्था के लिए एक प्रबंधन समिति कार्यरत है. इसमें अध्यक्ष प्रभाकर खानजोड़े, उपाध्यक्ष दिवाकर देशपांडे, सचिव रवींद्र देशपांडे, सहसचिव प्रशांत शेटे और कोषाध्यक्ष राजेश सोनी शामिल हैं. ट्रस्टी के रूप में जुगलकिशोर मुंदड़ा, प्रदीप फडणवीस और शरदचंद्र देशपांडे मंदिर की व्यवस्थाओं से जुड़े हैं. मुख्य पुजारी मोहन देव, प्रबंधक विवेक देव, भूषण पिंपले, सुदाम जम्भूरे और प्रचार प्रमुख वैभव पोतदार भी मंदिर के विभिन्न कार्यों में सहयोग करते हैं.
* आस्था, इतिहास और परंपरा का संगम
मंगरुल दस्तगीर का मंगलामाता उपशक्ति पीठ करीब 200 वर्षों की धार्मिक मान्यता, संत परंपरा और ऐतिहासिक विरासत का संगम है. माहुर की मां रेणुका से जुड़ी कथा इस मंदिर की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है. नवरात्रि के दौरान यहां उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इस स्थान के धार्मिक महत्व को दर्शाती है. मंगलामाता के प्रति अटूट श्रद्धा ने इस मंदिर को विदर्भ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशिष्ट स्थान दिलाया है.





