सच्चा शिक्षक वही है जो जीवनभर विद्यार्थी बना रहे – डॉ. कुमार बोबडे
‘अध्यापन क्षमताओं का सशक्तीकरण-कार्यपद्धति’ कार्यशाला का आयोजन

अमरावती /दि.12 – अमरावती. बदलती शिक्षा व्यवस्था और आधुनिक शिक्षण पद्धतियों के अनुरूप अध्यापन के तरीकों में भी आवश्यक बदलाव करना समय की जरूरत है. शिक्षकों को आधुनिक अध्यापन कौशल आत्मसात कर स्वयं को निरंतर अद्यतन रखना चाहिए, क्योंकि ‘सच्चा शिक्षक वही है जो स्वयं भी सच्चा विद्यार्थी बना रहे.’ शिक्षक को जीवनभर सीखते रहना चाहिए, ऐसा प्रतिपादन जनसंवाद विभाग प्रमुख एवं वरिष्ठ पत्रकार डॉ. कुमार बोबडे ने किया.
श्री शिवाजी कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय की आईक्यूएसी एवं एचआरडीसी की ओर से ‘अध्यापन क्षमताओं का सशक्तीकरण : कार्यपद्धति’ विषय पर आयोजित कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर वे बोल रहे थे. महाविद्यालय के डॉ. पंजाबराव देशमुख सभागृह में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रभारी प्राचार्य प्रा. डॉ. महेंद्र मेटे ने की. प्रमुख अतिथि के रूप में डॉ. वनिता काले उपस्थित थीं. इस अवसर पर आईक्यूएसी समन्वयक डॉ. अपर्णा सरोदे तथा एचआरडीसी समन्वयक डॉ. शिवाजी कानफाडे प्रमुख रूप से उपस्थित रहे. कार्यक्रम की प्रस्तावना में एचआरडीसी समन्वयक प्रा. डॉ. शिवाजी कानफाडे ने कहा कि शिक्षा पद्धति में बड़े पैमाने पर बदलाव हुआ है और उसके अनुरूप अध्यापन पद्धति में भी परिवर्तन आवश्यक है. बदलते समय में विद्यार्थियों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए शिक्षकों को अपनी अध्यापन शैली में आवश्यक बदलाव करने चाहिए. इसी उद्देश्य से कार्यशाला का आयोजन किया गया है.
* अध्यापन केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रहे
उद्घाटन भाषण में डॉ. कुमार बोबडे ने कहा कि शिक्षकों को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें निरंतर अतिरिक्त एवं विविध विषयों का अध्ययन और वाचन करना चाहिए. आज के दौर में विद्यार्थियों को मित्रवत वातावरण में शिक्षा देना आवश्यक है. शिक्षक को कठिन से कठिन विषय भी विद्यार्थियों को सरल एवं सहज भाषा में समझाने की क्षमता विकसित करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि समय के साथ विद्यार्थियों की सीखने की शैली और आवश्यकताएं भी बदल रही हैं. ऐसे में शिक्षक यदि स्वयं को अपडेट रखेंगे, नई तकनीकों और अध्यापन पद्धतियों को अपनाएंगे, तभी वे विद्यार्थियों को प्रभावी ढंग से मार्गदर्शन दे सकेंगे.
* शिक्षक की भूमिका अब मार्गदर्शक की : डॉ. महेंद्र मेटे
कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रा. डॉ. महेंद्र मेटे ने शिक्षा के बदलते स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हुआ है. नई पीढ़ी को योग्य एवं सक्षम बनाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी शिक्षकों पर है. उन्होंने कहा कि विकसित देशों में विद्यार्थी बड़े पैमाने पर स्वयं अध्ययन करते हैं और शिक्षक की भूमिका मुख्य रूप से मार्गदर्शक की होती है. इसी दिशा में भारत में भी विद्यार्थियों में स्वयं अध्ययन की आदत विकसित करना आवश्यक है. इससे विद्यार्थियों में स्वतंत्र चिंतन, आत्मविश्वास और समस्या समाधान की क्षमता विकसित होगी.
* विविध अध्यापन तकनीकों का प्रभावी उपयोग जरूरी
कार्यशाला की मुख्य वक्ता डॉ. वनिता काले ने ‘शिक्षण कौशल एवं कक्षा प्रबंधन’ विषय पर मार्गदर्शन किया. उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को विषय-वस्तु का प्रभावी आकलन एवं समझ विकसित कराने के लिए शिक्षक विभिन्न अध्यापन पद्धतियों, तकनीकों, कौशलों और प्रतिमानों का उपयोग करते हैं. इन सभी का प्रभावी नियोजन एवं क्रियान्वयन ही वास्तविक अर्थों में कक्षा प्रबंधन है. ‘शिक्षक पढ़ाता है, तो वास्तव में वह क्या करता है?’ इस प्रश्न के माध्यम से उन्होंने अध्यापन प्रक्रिया का विश्लेषण किया और प्रभावी शिक्षण के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला. कार्यक्रम का संचालन डॉ. मनोज जोशी ने किया. अतिथियों का स्वागत डॉ. उमेश कडू एवं डॉ. सुवर्णा गाडगे ने किया, जबकि डॉ. अपर्णा सरोदे ने आभार व्यक्त किया. कार्यशाला में महाविद्यालय के सभी प्राध्यापक उपस्थित रहे.





