सूखे और चारा संकट से निपटने हाइड्रोपोनिक्स तकनीक अपनाएं
विभागीय आयुक्त नयना गुंडे और जिलाधिकारी आशिष येरेकर की पशुपालकों से अपील

महज 7 से 8 दिनों में तैयार होगा पौष्टिक हरा चारा
अमरावती/दि.17 – जिले में सूखे जैसी स्थिति और चारे की कमी को देखते हुए पशुपालकों को राहत देने के लिए प्रशासन ने हाइड्रोपोनिक्स (जलसंजीवनी) तकनीक अपनाने की अपील की है. इस आधुनिक तकनीक के माध्यम से बेहद कम पानी, कम खर्च और सीमित संसाधनों में पौष्टिक हरा चारा तैयार किया जा सकता है. विभागीय आयुक्त नयना गुंडे और जिलाधिकारी आशिष येरेकर ने जिले के पशुपालकों और किसानों से इस तकनीक का अधिकाधिक उपयोग करने का आह्वान किया है.
* विभागीय आयुक्त कार्यालय में चारा उत्पादन का प्रदर्शन
अमरावती तहसील के पशुसंवर्धन अधिकारियों की ओर से हाल ही में विभागीय आयुक्त कार्यालय में हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से तैयार किए गए मक्के के हरे चारे का प्रात्यक्षिक प्रस्तुत किया गया. इस दौरान जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सत्यम गांधी, पशुसंवर्धन विभाग के सह आयुक्त डॉ. येसू देव वंजारी, उपायुक्त डॉ. वल्लभ जोशी, सहायक आयुक्त डॉ. पंकज रवाले तथा दर्यापुर के सहायक आयुक्त डॉ. प्रतीक बोडके सहित अन्य अधिकारी उपस्थित थे.
* बिना मिट्टी के 7 से 8 दिनों में तैयार होगा हरा चारा
हाइड्रोपोनिक्स तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें मिट्टी के बिना ही पशुओं के लिए पौष्टिक हरा चारा तैयार किया जा सकता है. इस तकनीक के माध्यम से मक्के का चारा महज 7 से 8 दिनों में तैयार हो जाता है. यह चारा पशुओं के लिए पौष्टिक होने के साथ-साथ आसानी से पचने योग्य भी होता है. पारंपरिक चारा उत्पादन की तुलना में इस पद्धति में पानी की खपत काफी कम होती है. साथ ही, घर में उपलब्ध साधनों और सीमित जगह का उपयोग करके कम खर्च में यह व्यवस्था स्थापित की जा सकती है.
* पानी और चारे की कमी के दौरान पशुपालकों को मिलेगी राहत
जिले में सूखे जैसी स्थिति के कारण पशुओं के लिए हरे चारे और पानी की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन सकती है. ऐसे समय में हाइड्रोपोनिक्स तकनीक पशुपालकों के लिए उपयोगी विकल्प साबित हो सकती है. कम पानी और कम जगह में चारा तैयार होने से पारंपरिक खेती पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है. प्रशासन ने जिले के अधिक से अधिक किसानों और पशुपालकों से अपने खेतों तथा पशुशालाओं में इस आधुनिक तकनीक को अपनाने की अपील की है. अधिकारियों के अनुसार, सीमित संसाधनों में हरे चारे का उत्पादन बढ़ाकर पशुओं के पोषण और चारा संकट से निपटने में इस तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है.





