एक सप्ताह में तीन हत्याओं से दहला अमरावती

एकतरफा प्रेम, वर्चस्व की जंग और मासूम हाथों में ‘चाइना चाकू’!

* बढ़ते अपराध ने बढ़ाई नागरिकों की चिंता
* मामूली विवाद से हत्या तक पहुंच रहे मामले
* नाबालिगों की बढ़ती संलिप्तता सबसे बड़ी चिंता
* इस वर्ष अब तक 34 हत्याएं
* 30 मामलों में ‘चाइना चाकू’ के इस्तेमाल का दावा
अमरावती/दि.7- अमरावती शहर में पिछले कुछ दिनों से लगातार सामने आ रही हत्या की घटनाओं ने नागरिकों की चिंता बढ़ा दी है. एकतरफा प्रेम, वर्चस्व की लड़ाई, शराब, पुरानी रंजिश और मामूली विवाद जैसे कारणों से इंसानी जान लेना जैसे बेहद आसान होता जा रहा है. सबसे गंभीर पहलू यह है कि इन घटनाओं में नाबालिगों की संलिप्तता भी सामने आ रही है. कोमल उम्र और हाथों में किताबों की जगह चाकू पहुंचने की घटनाएं समाज और पुलिस-प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं. 30 अगस्त से 5 सितंबर के महज सात दिनों में अमरावती शहर में हत्या की तीन सनसनीखेज घटनाएं सामने आईं. एक के बाद एक हुई इन वारदातों से शहर में कानून-व्यवस्था और नागरिक सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं. हालात ऐसे हैं कि अब आम नागरिकों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि, क्या अमरावती वास्तव में सुरक्षित है?
* एक सप्ताह, तीन हत्याएं और तीन अलग-अलग वजहें
बता दे कि, 30 अगस्त को बडनेरा में शराब के अड्डे पर 24 वर्षीय युवक की हत्या कर दी गई थी. इस घटना का खून अभी सूखा भी नहीं था कि 3 सितंबर को रविनगर पुल के पास करीब साढ़े 17 वर्षीय युवती की एकतरफा प्रेम के चलते गला रेतकर निर्मम हत्या कर दी गई. इस घटना से शहर में आक्रोश और चिंता का माहौल बना हुआ था. सामाजिक स्तर पर घटना को लेकर चर्चा और मंथन चल ही रहा था कि 5 सितंबर की शिक्षक दिवस की रात कपिलवस्तुनगर में पुराने विवाद के चलते एक 17 वर्ष 9 माह के विधि-संघर्षित बालक ने 20 वर्षीय युवक विशाल उर्फ छोटू राजेश मनोहर की मांडी पर चाकू से वार कर उसकी हत्या कर दी. तीनों घटनाओं की पृष्ठभूमि अलग-अलग है, लेकिन एक बात समान है, विवाद बढ़ने पर हिंसा और हिंसा के बाद हत्या.
* मामूली धक्का, पुरानी रंजिश और जिंदगी खत्म
कभी शराब के पैसों को लेकर विवाद होता है, कभी किसी से धक्का लगने जैसी मामूली बात पर कहासुनी होती है तो कहीं एकतरफा प्रेम अस्वीकार होने पर हिंसा का रास्ता अपनाया जाता है. देखते ही देखते बात गाली-गलौज से मारपीट और फिर हत्या तक पहुंच जाती है. कपिलवस्तुनगर की ताजा घटना इसका चिंताजनक उदाहरण है. करीब 15 दिन पहले हुए विवाद का बदला लेने के लिए नाबालिग ने जन्मदिन की पार्टी को ही हत्या का मंच बना दिया. वह घर से चाकू लेकर आया और भीड़ के बीच विशाल पर हमला कर दिया.
* इस वर्ष 34 हत्याएं, पिछले साल 28
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 1 जनवरी से 5 सितंबर तक अमरावती में हत्या की 34 घटनाएं सामने आ चुकी हैं. पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 28 था. यानी हत्या की घटनाओं में बढ़ोतरी दर्ज हुई है. लेकिन आंकड़ों से भी ज्यादा चिंताजनक स्थिति इन अपराधों के स्वरूप को लेकर है. हत्या जैसे गंभीर अपराधों में नाबालिगों की संलिप्तता सामने आना समाज के लिए खतरे की घंटी है.
* मासूम हाथों में चाकू कैसे पहुंच रहा?
स्कूल जाने की उम्र में बच्चों और किशोरों के हाथों में चाकू जैसे घातक हथियार पहुंचना कई सवाल खड़े करता है. विशेष रूप से बाजार और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर आसानी से उपलब्ध होने वाले कथित ‘चाइना चाकू’ को लेकर भी चिंता जताई जा रही है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस वर्ष सामने आई 34 हत्या की घटनाओं में से 30 मामलों में चाइना चाकू का इस्तेमाल हुआ. यदि यह आंकड़ा जांच में पुष्ट होता है, तो यह स्थिति हथियारों की आसान उपलब्धता पर गंभीर सवाल खड़े करती है. बताया जा रहा है कि प्रतिबंध के बावजूद ऐसे चाकू ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं. ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अपराधी चाकू लेकर घूम रहे हैं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि प्रतिबंधित या घातक हथियार उन तक पहुंच कैसे रहे हैं?
हत्या या अन्य गंभीर अपराधों में पकड़े गए नाबालिगों के मामले में भी प्रभावी पुनर्वास और निगरानी की जरूरत महसूस की जा रही है. बाल सुधारगृह से बाहर आने के बाद कुछ मामलों में नाबालिग फिर अपराध की दुनिया में लौटते दिखाई देते हैं. इससे यह सवाल उठता है कि सिर्फ पकड़ना और सुधारगृह भेज देना पर्याप्त है या अपराध की मानसिकता को बदलने के लिए दीर्घकालीन प्रयास भी जरूरी हैं? परिवार, स्कूल, समाज, पुलिस और बाल न्याय व्यवस्था-सभी स्तरों पर समन्वित प्रयास के बिना इस समस्या का समाधान मुश्किल नजर आता है.
* तड़ीपार और एमपीडीए कार्रवाई के बावजूद सवाल कायम
अपराधियों के खिलाफ तड़ीपार और एमपीडीए जैसी कड़ी कार्रवाई की जाती है. इसके बावजूद यदि शहर में हत्या, चाकूबाजी और वर्चस्व की घटनाएं लगातार सामने आती रहें, तो कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है. अपराधी तत्वों पर कार्रवाई के साथ-साथ हथियारों की उपलब्धता रोकना, नाबालिगों को अपराध की ओर धकेलने वाले समूहों पर नजर रखना और संवेदनशील इलाकों में पुलिस की प्रभावी मौजूदगी सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है.
* ‘वर्चस्व’ के लिए जान लेने की मानसिकता
अमरावती में सामने आई घटनाएं सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं हैं, बल्कि समाज में बढ़ रही हिंसक मानसिकता की ओर भी संकेत करती हैं. मामूली विवाद में पीछे हटना कमजोरी समझा जाना, सामने वाले पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए हथियार निकाल लेना और छोटी बात का बदला लेने के लिए जान तक ले लेना बेहद चिंताजनक प्रवृत्ति है. एकतरफा प्रेम के मामलों में भी अस्वीकार को स्वीकार न कर पाना और प्रेम को अधिकार समझने की मानसिकता युवाओं को हिंसा की ओर धकेल रही है.
* अब सिर्फ पुलिस नहीं, पूरे समाज को सोचना होगा
लगातार हो रही हत्याओं को केवल पुलिस की जिम्मेदारी मानकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता. अपराध पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस की सक्रियता के साथ परिवारों की भूमिका, स्कूलों में व्यवहार संबंधी मार्गदर्शन, युवाओं पर निगरानी, सोशल मीडिया के प्रभाव की समीक्षा और घातक हथियारों की उपलब्धता पर प्रभावी नियंत्रण जरूरी है. सबसे अहम बात यह कि बच्चों और किशोरों के हाथों में चाकू पहुंचने से पहले उनके भीतर पनप रहे गुस्से, हिंसा और बदले की मानसिकता को पहचानना होगा. क्योंकि आज यदि मामूली विवाद पर चाकू निकल रहा है, तो कल वही चाकू किसी और परिवार का चिराग बुझा सकता है.
अमरावती में लगातार सामने आ रही हत्या और चाकूबाजी की घटनाएं एक गंभीर चेतावनी हैं. सवाल सिर्फ यह नहीं कि अगली हत्या कब और कहां होगी-सवाल यह है कि उससे पहले व्यवस्था और समाज जागेगा या नहीं?

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