अमरावती विधान परिषद के चुनाव में एक और निर्णायक मोड
बाजोरिया को नागपुर हाईकोर्ट से भी नहीं मिली राहत

* याचिका खारिज, जिला निर्वाचन अधिकारी के फैसले पर न्यायिक मुहर
* चुनावी मुकाबले की तस्वीर हुई और भी अधिक स्पष्ट
अमरावती/नागपुर/ दि. 3 – अमरावती स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र के विधान परिषद चुनाव में गुरुवार को एक और महत्वपूर्ण एवं निर्णायक घटनाक्रम सामने आया. जिला निर्वाचन निर्णय अधिकारी एवं जिलाधिकारी आशीष येरेकर द्वारा निर्दलीय उम्मीदवार विप्लव गोपीकिशन बाजोरिया का नामांकन पत्र निरस्त किए जाने के खिलाफ दायर याचिका को नागपुर स्थित मुंबई उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने खारिज कर दिया. न्यायालय के इस फैसले के साथ ही बाजोरिया की चुनावी दावेदारी को बड़ा झटका लगा है और निर्वाचन अधिकारी द्वारा पारित आदेश को कानूनी समर्थन प्राप्त हो गया है.
बता दें कि राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जा रहे इस मामले पर पूरे जिले की नजरें टिकी हुई थीं. नामांकन निरस्त होने के बाद बाजोरिया समर्थकों को न्यायालय से राहत मिलने की उम्मीद थी, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले ने उन उम्मीदों पर विराम लगा दिया. अब अमरावती स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन का मुकाबला शेष उम्मीदवारों के बीच और अधिक स्पष्ट हो गया है.
उल्लेखनीय है कि गत रोज नामांकन पत्रों की जांच के दौरान विप्लव बाजोरिया के नामांकन के खिलाफ कई आपत्तियां दर्ज की गई थीं. सुनवाई के बाद जिला निर्वाचन अधिकारी ने यह निष्कर्ष निकाला था कि उम्मीदवार द्वारा प्रस्तुत शपथपत्र (फॉर्म-26) निर्धारित प्रारूप के अनुरूप नहीं है तथा आवश्यक जानकारी मूल फॉर्म में दर्ज करने के बजाय परिशिष्टों के माध्यम से प्रस्तुत की गई है. इसी आधार पर उनका नामांकन पत्र खारिज कर दिया गया था. निर्वाचन अधिकारी के इस निर्णय को चुनौती देते हुए विप्लव बाजोरिया ने नागपुर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी. उनकी ओर से एड. रेणुका शिरपुरकर ने पक्ष रखते हुए न्यायालय से निर्वाचन अधिकारी का आदेश रद्द करने और नामांकन को वैध घोषित करने की मांग की. याचिका में कहा गया था कि उम्मीदवार द्वारा सभी आवश्यक जानकारियां उपलब्ध कराई गई थीं और यदि कोई त्रुटि थी भी, तो वह केवल तकनीकी प्रकृति की थी. ऐसे में केवल तकनीकी आधार पर किसी उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से वंचित करना उचित नहीं माना जा सकता.
इस मामले की गंभीरता और संभावित प्रभाव को देखते हुए चुनाव मैदान में मौजूद अन्य चार प्रत्याशियों में से तीन प्रत्याशियों, भाजपा उम्मीदवार एवं पूर्व मंत्री प्रवीण पोटे, कांग्रेस उम्मीदवार हर्षजीत देशमुख तथा निर्दलीय उम्मीदवार प्रशांत महल्ले ने पहले ही हाईकोर्ट में कैवेट दाखिल कर दी थी. इसके कारण न्यायालय ने किसी भी पक्ष में आदेश देने से पहले सभी संबंधित पक्षों को सुनने की प्रक्रिया अपनाई. इससे यह सुनिश्चित हुआ कि याचिका पर सुनवाई के दौरान सभी उम्मीदवारों का पक्ष न्यायालय के समक्ष रखा जा सके.
* दोनों पक्षों में हुआ विस्तृत युक्तिवाद
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता और प्रतिवादी पक्षों के अधिवक्ताओं के बीच विस्तृत कानूनी बहस हुई. बाजोरिया की ओर से यह तर्क दिया गया कि नामांकन पत्र में ऐसी कोई गंभीर कमी नहीं थी, जिसे नामांकन निरस्त करने का आधार बनाया जा सके. वहीं दूसरी ओर प्रतिवादी पक्ष ने निर्वाचन अधिकारी के आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि चुनावी प्रक्रिया में निर्धारित प्रारूप और कानूनी प्रावधानों का पालन अनिवार्य है. यदि उम्मीदवार निर्धारित फॉर्म में जानकारी देने में विफल रहता है, तो निर्वाचन अधिकारी को कानून के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार है. न्यायालय के समक्ष निर्वाचन अधिकारी के आदेश, चुनाव नियमों, शपथपत्र की प्रकृति तथा संबंधित कानूनी प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा हुई.
* न्यायालय ने निर्वाचन अधिकारी का निर्णय माना उचित
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति प्रफुल्ल कुंभलकर ने जिला निर्वाचन अधिकारी के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. न्यायालय ने माना कि निर्वाचन अधिकारी ने उपलब्ध रिकॉर्ड, प्रस्तुत दस्तावेजों और लागू नियमों के आधार पर निर्णय लिया है.इसके साथ ही न्यायालय ने बाजोरिया की याचिका खारिज कर दी. इस फैसले के बाद निर्वाचन अधिकारी द्वारा पारित नामांकन निरस्तीकरण का आदेश प्रभावी बना हुआ है.
कानूनी जानकारों के अनुसार हाईकोर्ट द्वारा हस्तक्षेप से इनकार किया जाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि निर्वाचन अधिकारी का निर्णय प्रथम दृष्टया नियमों और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप पाया गया.
* वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने संभाली पैरवी
भाजपा प्रत्याशी एवं पूर्व मंत्री प्रवीण पोटे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एड. सुनील मनोहर ने प्रभावी पैरवी की. उनके साथ एड. प्रशांत देशपांडे, एड. चंद्रकांत डोरले, एड. संदीप गुप्ता, एड. रोहित उपाध्याय तथा एड. सुमित शर्मा ने सहयोग किया. वहीं कांग्रेस प्रत्याशी हर्षजीत देशमुख की ओर से एड. भांगडे तथा निर्दलीय उम्मीदवार प्रशांत महल्ले की ओर से एड. ऋषिकेश मार्डीकर ने अपना पक्ष रखा. सभी पक्षों की ओर से चुनावी कानूनों और न्यायालयीन निर्णयों के आधार पर तर्क प्रस्तुत किए गए.
* चुनावी राजनीति में बढ़ी हलचल
हाईकोर्ट के फैसले के बाद अमरावती की राजनीतिक फिजा और अधिक गर्म हो गई है. स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन को लेकर पिछले कुछ दिनों से जो कानूनी और राजनीतिक घटनाक्रम चल रहे थे, उनमें यह फैसला सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बाजोरिया के चुनावी मैदान से बाहर होने और हाईकोर्ट से भी राहत नहीं मिलने के बाद चुनावी मुकाबले की दिशा काफी हद तक स्पष्ट हो गई है. इससे विभिन्न राजनीतिक दलों की रणनीतियों पर भी प्रभाव पड़ सकता है.
* अब आगे क्या?
हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद अब राजनीतिक और कानूनी हलकों में यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या बाजोरिया पक्ष इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाएगा अथवा नहीं. हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है. फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि जिला निर्वाचन अधिकारी के फैसले पर हाईकोर्ट की मुहर लगने से अमरावती स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन में चुनावी तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है.





