सहकार कानून की नई धारा को बच्चू कडू की चुनौती

हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब, 22 सितंबर को होगी अगली सुनवाई

* महाराष्ट्र सहकारी संस्था अधिनियम की संशोधित धारा के खिलाफ नागपुर खंडपीठ में याचिका
नागपुर/दि.9- शिंदे गुटवाली शिवसेना के नेता एवं विधायक बच्चू कडू ने महाराष्ट्र सहकारी संस्था अधिनियम में हाल ही में किए गए संशोधन को मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ में चुनौती दी है. याचिका में अधिनियम की धारा 73 (अ) (अ) (अ) (3) में किए गए बदलाव की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि केवल अधिसूचना के आधार पर किए गए संस्थाओं के वर्गीकरण को कानून में अलग प्रावधान का आधार नहीं बनाया जा सकता. मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अनिल किलोर और रजनीश व्यास की खंडपीठ के समक्ष हुई. अदालत ने राज्य सरकार सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए राज्य के महाधिवक्ता को भी इस विषय पर अपना पक्ष स्पष्ट करने का निर्देश दिया है.
* क्या है विवाद का मूल मुद्दा?
महाराष्ट्र सहकारी संस्था अधिनियम की धारा 73 (अ) (अ) (अ) (3) निर्वाचित प्रबंधन समिति के कार्यकाल से संबंधित है. पहले यह व्यवस्था थी कि यदि समिति का कार्यकाल समाप्त हो जाए और चुनाव समिति की गलती के कारण लंबित न हो, तो नई समिति के गठन तक मौजूदा समिति कामकाज जारी रख सकती थी. लेकिन 15 अप्रैल 2026 को किए गए संशोधन के बाद यह सुविधा ‘टाइप-ए’ सहकारी संस्थाओं की प्रबंधन समितियों के लिए समाप्त कर दी गई. अब ऐसी संस्थाओं की समिति का कार्यकाल खत्म होने पर उसके पदाधिकारी नई समिति बनने तक पद पर बने नहीं रह सकेंगे.
* याचिका में क्या तर्क दिए गए?
याचिका में कहा गया है कि सहकारी संस्थाओं का ‘टाइप-ए’ वर्गीकरण 2014 की चुनाव संबंधी अधिसूचना के माध्यम से किया गया था, न कि विधायिका द्वारा बनाए गए किसी कानून के जरिए. ऐसे में केवल अधिसूचना में किए गए वर्गीकरण के आधार पर किसी विशेष श्रेणी की संस्थाओं के लिए अलग कानूनी व्यवस्था लागू करना संवैधानिक और विधिक दृष्टि से उचित है या नहीं, यह न्यायिक परीक्षण का विषय है. बच्चू कडू की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम. जी. भांगडे ने अदालत में पक्ष रखा और संशोधित प्रावधान को मनमाना बताते हुए इसे निरस्त करने की मांग की.
* 22 सितंबर को अगली सुनवाई
खंडपीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया है. मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है. इस सुनवाई में राज्य सरकार संशोधन के औचित्य और कानूनी आधार को लेकर अपना पक्ष रखेगी. सहकारी क्षेत्र में इस संशोधन को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसका सीधा प्रभाव अनेक सहकारी संस्थाओं की प्रबंधन समितियों के अधिकारों और उनके कार्यकाल पर पड़ सकता है. ऐसे में न्यायालय के अंतिम निर्णय पर सहकार क्षेत्र की नजरें टिकी हुई हैं.

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