‘लोकल’ पालकमंत्री की मांग तेज, प्रवीण पोटे पाटिल के नाम की खुली पैरवी
डफरीन अग्निकांड के बाद अमरावती में छिड़ी नई राजनीतिक बहस

* कई समर्थकों ने सोशल मीडिया पर छेड़ा अभियान, बोले- जिले का नेतृत्व स्थानीय हाथों में होगा, तो बढ़ेगा विकास और प्रशासनिक जवाबदारी
अमरावती/दि.2 – डफरीन महिला अस्पताल में हुए दर्दनाक अग्निकांड और उसके बाद स्वास्थ्य व्यवस्था तथा प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर उठे सवालों के बीच अमरावती की राजनीति में एक नई बहस ने जोर पकड़ लिया है. जिले को स्थानीय पालकमंत्री दिए जाने की मांग एक बार फिर मुखर हो गई है. इस मांग के केंद्र में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री प्रवीण पोटे पाटिल का नाम सामने आया है, जिनके समर्थकों ने उन्हें अमरावती का पालकमंत्री बनाए जाने के लिए खुली पैरवी शुरू कर दी है.
बता दें कि वर्तमान में राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले के पास नागपुर और अमरावती दोनों जिलों का पालकमंत्री पद है. भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं और पोटे समर्थकों का कहना है कि बावनकुले दोनों जिलों की जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, लेकिन अमरावती जैसे महत्वपूर्ण और समस्याग्रस्त जिले को पूर्णकालिक ध्यान देने के लिए स्थानीय नेतृत्व की आवश्यकता महसूस की जा रही है. डफरीन अस्पताल अग्निकांड के बाद यह मांग और अधिक तेज हो गई है.
पोटे समर्थकों का कहना है कि डफरीन अस्पताल में हुई दुर्घटना ने प्रशासनिक निगरानी, जवाबदेही और सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली को लेकर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं. उनका तर्क है कि यदि जिले का पालकमंत्री स्थानीय हो, तो प्रशासन पर उसकी पकड़ अधिक मजबूत रहती है और किसी भी संकट की स्थिति में त्वरित हस्तक्षेप संभव हो पाता है. पोटे समर्थकों के अनुसार, अमरावती की समस्याएं केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सिंचाई, सड़क, रोजगार, शिक्षा, शहरी विकास और ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं से जुड़े अनेक मुद्दे वर्षों से लंबित हैं. ऐसे में जिले की परिस्थितियों को निकट से समझने वाला स्थानीय नेतृत्व विकास कार्यों को अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकता है.
* सोशल मीडिया पर छिड़ा अभियान
पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर अमरावती को स्थानीय पालकमंत्री चाहिए, अमरावती का नेतृत्व अमरावती के हाथों में और प्रवीण पोटे पाटिल को पालकमंत्री बनाओ जैसे संदेशों की भरमार दिखाई दे रही है. फेसबुक, व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर समर्थक लगातार पोस्ट साझा कर रहे हैं. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह अभियान केवल कुछ कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि भाजपा के एक बड़े वर्ग में भी स्थानीय नेतृत्व की मांग को लेकर सकारात्मक चर्चा चल रही है. हालांकि पार्टी की ओर से अब तक इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.
* वर्षों से बाहरी जिलों के नेताओं के पास रही जिम्मेदारी
ज्ञात रहे कि अमरावती में स्थानीय पालकमंत्री की मांग कोई नई नहीं है. जिले के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में लंबे समय से यह आवाज उठती रही है कि जिले का पालकमंत्री स्थानीय होना चाहिए. समर्थकों का कहना है कि जब किसी अन्य जिले का नेता पालकमंत्री होता है तो वह स्वाभाविक रूप से अपने मूल जिले पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है, जबकि स्थानीय समस्याओं के समाधान में अपेक्षित गति नहीं आ पाती. स्थानीय नेतृत्व के पक्षधर यह भी तर्क देते हैं कि अमरावती की सामाजिक, भौगोलिक और प्रशासनिक परिस्थितियां अन्य जिलों से भिन्न हैं. इसलिए जिले के विकास और प्रशासनिक समन्वय के लिए स्थानीय नेतृत्व अधिक प्रभावी साबित हो सकता है.
* पोटे का बढ़ता राजनीतिक कद बना चर्चा का विषय
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार हाल के महीनों में भाजपा ने विधायक प्रवीण पोटे पाटिल को जिस तरह महत्व दिया है, उससे उनके बढ़ते राजनीतिक कद का संकेत मिलता है. अमरावती स्थानीय स्वराज्य संस्था निर्वाचन क्षेत्र से उन्हें उम्मीदवार बनाए जाने को भी पार्टी नेतृत्व के विश्वास के रूप में देखा गया था. पूर्व मंत्री के रूप में पोटे का प्रशासनिक अनुभव, संगठन में उनकी सक्रियता और जिले में उनकी राजनीतिक पकड़ को देखते हुए समर्थक उन्हें पालकमंत्री पद के लिए उपयुक्त बता रहे हैं. उनका कहना है कि यदि उन्हें यह जिम्मेदारी मिलती है तो जिले के विकास को नई दिशा मिल सकती है.
* समर्थकों की सक्रियता से असहज हो सकता है नेतृत्व
हालांकि राजनीतिक जानकार इस पूरे घटनाक्रम को दूसरे नजरिए से भी देख रहे हैं. उनका मानना है कि पार्टी नेतृत्व द्वारा किसी नेता को कौन-सी जिम्मेदारी दी जाएगी, यह पूरी तरह संगठनात्मक और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है. ऐसे में समर्थकों द्वारा समय से पहले शुरू की गई सार्वजनिक लॉबिंग और सोशल मीडिया मुहिम पार्टी नेतृत्व को असहज भी कर सकती है. राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि भाजपा ने हाल ही में अमरावती की राजनीति में जो समीकरण तैयार किए हैं, समर्थकों की अत्यधिक उत्सुकता कहीं उन समीकरणों को प्रभावित न कर दे. कुछ वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि इस प्रकार की मांगें यदि संगठनात्मक मंचों पर उठाई जाएं तो अधिक प्रभावी होती हैं, जबकि सार्वजनिक अभियान कई बार उल्टा असर भी डाल सकते हैं.
* जनता की नजर विकास पर
इस पूरे राजनीतिक विमर्श के बीच आम जनता का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि पालकमंत्री स्थानीय हो या बाहरी, असली मुद्दा जिले का विकास और जनसमस्याओं का समाधान है. नागरिक संगठनों का कहना है कि स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना, डफरीन जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना, किसानों की समस्याओं का समाधान, रोजगार के अवसर बढ़ाना और बुनियादी सुविधाओं में सुधार ही किसी भी पालकमंत्री की प्राथमिकता होनी चाहिए. फिलहाल डफरीन अग्निकांड के बाद शुरू हुई यह बहस अमरावती की राजनीति का नया केंद्र बन गई है. एक ओर समर्थक प्रवीण पोटे पाटिल को पालकमंत्री बनाए जाने की मांग को जोर-शोर से उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे भाजपा के भीतर भविष्य के शक्ति-संतुलन और नेतृत्व की दिशा से जोड़कर देख रहे हैं. आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व इस विषय पर क्या निर्णय लेता है, इस पर जिले की राजनीतिक और सामाजिक हलकों की नजरें टिकी हुई हैं.





