अमरावती विधान परिषद का चुनाव लडने की जिद छोडी

सुप्रीम कोर्ट नहीं जायेंगे विप्लव बाजोरिया

* हाईकोर्ट के कडे फैसले के मद्देनजर अब आगे नहीं बढने का लिया निर्णय
* नामांकन अपात्रता को लेकर जिला प्रशासन के फैसले को हाईकोर्ट ने जस का तस रखा था कायम
अमरावती/दि.5 – विधान परिषद की सीट के लिए अमरावती के स्थानीय स्वायत्त निकाय निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लडने के लिए जबर्दस्त ढंग से इच्छुक रहनेवाले पूर्व विधायक विप्लव बाजोरिया ने अब आखिरकार अपनी जिद को छोड देने का निर्णय लिया है तथा अपने नामांकन आवेदन को खारिज किए जाने के संदर्भ मेें अमरावती को जिला प्रशासन की ओर से दिए गये फैसले को मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ द्बारा बेहद कडाई के साथ जस का तस कायम रखे जाने के बाद विप्लव बाजोरिया ने अब आगे इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जाने का फैसला भी त्याग दिया था. जिसके चलते माना जा रहा है कि अमरावती विधान परिषद सीट के चुनाव में अब विप्लव बाजोरिया की दावेदारी व चुनौती पूरी तरह से खत्म हो गई है.
बता दें कि हिंगोली-परभणी विधान परिषद सीट से पूर्व विधायक रहनेवाले तथा शिंदे गुट वाली शिवसेना के वास्ता रखनेवाले विप्लव बाजोरिया ने इस बार अमरावती निकाय निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद के चुनाव हेतु निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर अपना नामांकन प्रस्तुत किया था. जिनके नामांकन और शपथ पत्र के त्रृटिपूर्ण एवं आधा-अधूरा रहने को लेकर प्रतिस्पर्धी प्रत्याशियों द्बारा जिला निर्वाचन अधिकारी के समक्ष आपत्ति उठाते हुए आक्षेप दर्ज कराया गया था. उसके उपरांत जिला निर्वाचन अधिकारी व जिलाधीश आशीष येरेकर ने 3 जून को नामांकनों की पडताल के समय संबंधित पक्षों को साथ बिठाकर मामले की सुनवाई की थी और आपत्ति उठानेवाले प्रत्याशियों से आक्षेपों में तथ्य रहने की बात साबित होने के बाद जिलाधीश येरेकर ने विप्लव बाजोरिया के नामांकन आवेदन को तकनीकी आधार पर खारिज करते हुए उन्हें विधान परिषद का चुनाव लडने से अपात्र घोषित किया था.
अपना नामांकन आवेदन अमरावती के जिला निर्वाचन विभाग द्बारा खारिज किए जाते ही पूर्व विधायक विप्लव बाजोरिया ने अपने पिता व पूर्व विधायक गोपीकिसन बाजोरिया के साथ नागपुर पहुंचकर हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी तथा अमरावती के जिला निर्वाचन विभाग के फैसले को चुनौती भी दी थी. जहां पर दोनों पक्षों का युक्तिवाद सुनने के बाद न्या कुंभलकर की अदालत ने अमरावती के जिला निर्वाचन अधिकारी व जिलाधीश आशीष येरेकर के फैसले को पूरी तरह से सही माना और जिलाधीश येरेकर के फैसले को बेहद कडाई के साथ जस का तस कायम रखने का फैसला सुनाया. जिसके चलते बाजोरिया पिता-पुत्र को नागपुर हाईकोर्ट से कोई राहत नहीं मिली. ऐसे में उम्मीद जताई जा रही थी कि बाजोरिया पिता-पुत्र द्बारा संभवत: हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जायेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. क्योंकि बाजोरिया ने इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कोई याचिका दायर नहीं की.
राजनीतिक एवं विधिज्ञ सूत्रों के मुताबिक अमरावती के जिला निर्वाचन अधिकारी के निर्णय को हाईकोर्ट द्बारा जस का तस कायम रखते हुए जिस तरह की कडी टिप्पणियां की गई. उन्हें देखते हुए बाजोरिया को सुप्रीम कोर्ट से भी कोई राहत मिलने की विशेष उम्मीदें नहीं थी. संभवत: इस बात को समझते हुए बाजोरिया ने फिलहाल अपने कदम पीछे खींच लेने में ही अपनी भलाई समझी और सुप्रीमकोर्ट में गुहार नहीं लगाई. हालांकि यदि बाजोरिया द्बारा सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई भी जाती तो जब तक उनकी याचिका पर सुनवाई चलती. तब तक अमरावती में विधान परिषद के चुनाव की प्रक्रिया भी चलती रहती. क्योंकि ऐसे मामलों में अदालत द्बारा निर्वाचन प्रक्रिया पर स्थिगिती नहीं लगाई जाती है. संभवत: इन्ही तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए बाजोरिया ने हाईकोर्ट में हुई अपनी हार के बाद मैदान से पूरी तरह हट जाने और कानूनी लडाई का मैदान भी छोड देने का निर्णय लिया.

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