अगर डफरिन अस्पताल हमें सौंपा गया होता, तो तीन मासूमों की जान बच सकती थी
अमरावती जीएमसी के डीन डॉ. नंदकिशोर राऊत का बड़ा दावा

* मेडिकल कॉलेज और सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के बीच पुराना विवाद फिर आया सामने
अमरावती/दि.26– डफरिन अस्पताल के एसएनसीयू (स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट) में हुए भीषण अग्निकांड और तीन नवजात शिशुओं की मौत के बाद अब इस त्रासदी को लेकर प्रशासनिक और विभागीय स्तर पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है. इसी बीच अमरावती शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय के अधिष्ठाता (डीन) डॉ. नंदकिशोर राऊत ने एक ऐसा दावा किया है, जिसने पूरे स्वास्थ्य प्रशासन में हलचल मचा दी है. अमरावती जीएमसी के डीन डॉ. राऊत का कहना है कि यदि पूर्व निर्धारित समझौते के अनुसार जिला महिला अस्पताल (डफरीन) और सुपर स्पेशालिटी अस्पताल का नियंत्रण समय रहते शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय को सौंप दिया गया होता, तो वहां उच्च गुणवत्ता वाले चिकित्सा उपकरण और बेहतर तकनीकी निगरानी व्यवस्था स्थापित की जा सकती थी. उनके अनुसार ऐसी स्थिति में संभवतः यह हादसा टल जाता और तीन मासूम बच्चों की जान बचाई जा सकती थी. यह बयान केवल एक प्रशासनिक टिप्पणी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सीधा सवाल माना जा रहा है.
कहा जा सकता है कि, डफरीन अग्निकांड के बाद अब मेडिकल एजुकेशन विभाग और सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के बीच वर्षों से चला आ रहा अधिकार क्षेत्र का विवाद फिर चर्चा में आ गया है. जानकारी के अनुसार, अमरावती में शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय की स्थापना के समय एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ था. इसके तहत मेडिकल कॉलेज की स्वयं की इमारत और संपूर्ण व्यवस्था विकसित होने तक सात वर्षों के लिए कुछ प्रमुख सरकारी अस्पतालों को कॉलेज से संबद्ध करने का निर्णय लिया गया था. इस करार के अनुसार जिला सामान्य अस्पताल (इरविन), जिला महिला अस्पताल (डफरीन) तथा विभागीय संदर्भ सेवा अस्पताल (सुपर स्पेशालिटी अस्पताल) को मेडिकल कॉलेज के शैक्षणिक और चिकित्सीय कार्यों से जोड़ा जाना था. लेकिन डॉ. राऊत के अनुसार वास्तविकता में केवल इरविन अस्पताल का ही नियंत्रण मेडिकल कॉलेज को मिला, जबकि डफरिन और सुपर स्पेशालिटी अस्पताल आज भी सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के नियंत्रण में ही बने हुए हैं.
* सात साल के करार का पालन क्यों नहीं हुआ?
डीन डॉ. राऊत का दावा है कि मूल समझौते में तीनों अस्पतालों को मेडिकल कॉलेज से जोड़ने की स्पष्ट व्यवस्था थी. लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी डफरिन और सुपर स्पेशालिटी अस्पताल का हस्तांतरण नहीं किया गया. स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि यदि यह दावा सही है तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि विभागीय समन्वय की गंभीर विफलता भी माना जा सकता है. अब सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसा कौन-सा कारण था जिसके चलते वर्षों से लंबित इस प्रक्रिया को पूरा नहीं किया गया.
* प्रस्ताव भेजा गया, लेकिन फाइलें अटक गईं
अमरावती जीएमसी के डीन डॉ. राऊत के अनुसार इरविन अस्पताल में बढ़ते मरीजों के दबाव और मेडिकल कॉलेज की आवश्यकताओं को देखते हुए उन्होंने डफरीन और सुपर स्पेशालिटी अस्पताल को मेडिकल कॉलेज के अधीन लाने के लिए नया प्रस्ताव तैयार कराया था. यह प्रस्ताव सभी औपचारिकताओं के साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग को भेजा गया था. लेकिन विभागीय स्तर पर यह फाइल आगे नहीं बढ़ सकी और आज तक अंतिम मंजूरी नहीं मिल पाई. डॉ. राऊत का कहना है कि यदि उस समय निर्णय लिया गया होता तो डफरिन अस्पताल में तकनीकी और प्रशासनिक नियंत्रण अधिक प्रभावी होता तथा चिकित्सा उपकरणों की खरीद और रखरखाव भी बेहतर स्तर पर किया जा सकता था.
* वेंटिलेटर की गुणवत्ता पर भी उठाए सवाल
डफरीन हादसे के केंद्र में जिस वेंटिलेटर को माना जा रहा है, उसकी गुणवत्ता को लेकर भी डॉ. राऊत ने अप्रत्यक्ष रूप से प्रश्न उठाए हैं. उन्होंने कहा कि यदि अस्पताल मेडिकल कॉलेज के नियंत्रण में होता तो उपकरणों की खरीद गुणवत्ता और तकनीकी मानकों को ध्यान में रखकर की जाती. साथ ही उनकी नियमित निगरानी और मेंटेनेंस की प्रक्रिया भी अधिक सख्त होती. हालांकि हादसे के वास्तविक कारणों की जांच अभी जारी है और अंतिम रिपोर्ट आना बाकी है, लेकिन डॉ. राऊत के बयान ने उपकरणों की खरीद प्रक्रिया और गुणवत्ता नियंत्रण को लेकर नई बहस छेड़ दी है.
* सेवानिवृत्ति से पहले करेंगे ‘पोलखोल’?
डॉ. नंदकिशोर राऊत का एक और बयान चर्चा का विषय बना हुआ है. उन्होंने कहा है कि वे कुछ ही दिनों में शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त होने वाले हैं और उससे पहले अमरावती में एक विस्तृत पत्रकार परिषद आयोजित कर मेडिकल एजुकेशन विभाग और सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के बीच वर्षों से चल रही विसंगतियों तथा प्रशासनिक अड़चनों को सार्वजनिक करेंगे. उनके इस बयान को स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर खुली चुनौती के रूप में देखा जा रहा है. चिकित्सा और प्रशासनिक हलकों में इस घोषणा के बाद व्यापक चर्चा शुरू हो गई है. डॉ. राऊत के दावे ने इस पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है. अब सभी की निगाहें न केवल जांच रिपोर्ट पर, बल्कि उन विभागीय फाइलों और निर्णयों पर भी टिकी हैं, जिनके बारे में दावा किया जा रहा है कि यदि वे समय पर पूरे हो गए होते तो शायद तीन मासूमों की जिंदगी बचाई जा सकती थी.





