अपने ही कर्मियों के लिए असंवेदनशील बना स्वास्थ्य महकमा

कैंसर पीडित स्वास्थ्य सेवक को आनन-फानन में कर डाला टर्मीनेट

* चार साल से कोमा में पडे वैद्यकीय अधिकारी का सर्टिफिकेट जारी करने में टालमटोल
* दोनों परिवार 4-5 वर्षो से भगवान भरोसे, आर्थिक तंगी व भूखमरी का शिकार
* पार्षद दिनेश बुब तक पहुचे दोनों मामले, विधायक बच्चू कडू को कराया गया अवगत
अमरावती/दि.5 – जन सामान्यों के स्वास्थ्य को लेकर पूरी संवेदनशीलता के साथ काम करने की जिम्मेदारी रहनेवाला स्वास्थ्य महकमा खुद अपने ही अधिकारियों व कर्मचारियों के प्रति किस हद तक असंवेदनशील है. इसके दो उदाहरण आज उस समय सामने आए. जब स्वास्थ्य महकमें से वास्ता रखनेवाले दो लोगों के दिल दहला देनेवाले मामले मनपा पार्षद दिनेश बुब के पास पहुंचे. दोनों कहानियों को सुनकर खुद दिनेश बुब भी भीतर तक हिल गये और उन्होंने दोनों प्रकरणों से विधायक बच्चू कडू को तुरंत ही अवगत कराते हुए मुलाकात हेतु समय मांगा.
सामने आयी दो कहानियों में से पहली कहानी नागपुर जिला परिषद के स्वास्थ्य विभाग में विगत 14 वर्षो से स्वास्थ्य सेवक के तौर पर कार्यरत रहे अभिजीत बनकर की है. मूलत: अमरावती से वास्ता रखनेवाले अभिजीत बनकर को वर्ष 2022 में मुंह का कैंसर रहने की जानकारी सामने आयी थी. जिसके बाद से लेकर अब तक अभिजीत बनकर की 28 बार लाईट थेरेपी व 12 बार किमो थेरेपी हो चुकी है. अभिजीत बनकर ने अपनी बीमारी और उसे लेकर चल रहे इलाज की जानकारी वर्ष 2022 में ही अपने महकमे को दे दी थी. लेकिन इसकी अनदेखी करते हुए नागपुर जिला परिषद ने एक वर्ष बाद आनन-फानन में एक आदेश जारी करते हुए अभिजीत बनकर को सेवा से सीधे निष्कासित ही कर दिया. तब से लेकर अब तक अभिजीत बनकर अपने खुद के खर्च पर अपना इलाज करवा रहे है. साथ ही उनके पास अपना व अपने परिवार का उदरनिर्वाह करने हेतु आय का कोई अन्य स्त्रोत भी नहीं है. जिसके चलते बनकर परिवार आर्थिक तंगी व भूखमरी का शिकार है.
वहीं दूसरी कहानी इर्विन अस्पताल में समाज कार्य वैद्यकीय अधिकारी के तौर पर कार्यरत रहे अजय हत्तेसिंह सोलंकी की है. 21 मई 2023 को अजय सोलंकी एक सडक हादसे का शिकार हुए थे. जिन्हें इलाज के लिए इर्विन अस्पताल में भर्ती कराया गया था और तब से लेकर अब तक यानी करीब 3 वर्षो से अजय सोलंकी कोमा में है. इस दौरान अजय सोलंकी के परिवार को उनका केवल आधा वेतन भी मिल रहा है. क्योंकि इर्विन अस्पताल का प्रबंधन अब तक यह प्रमाणपत्र नहीं दे पाया है कि अजय सोलंकी कोमा में है. हैरत और आश्चर्य की बात है कि इर्विन अस्पताल में कार्यरत रहनेवाला व्यक्ति इर्विन अस्पताल में ही इलाज हेतु भर्ती है और तीन वर्षो से कोमा में है. लेकिन इस बात की पुष्टि खुद इर्विन अस्पताल मात्र एक प्रमाणपत्र जारी कर अब तक नहीं कर पाया है. इसके चलते सोलंकी का परिवार तीन वर्षो से आधे वेतन पर गुजर बसर कर रहा है. इस कहानी का दुखदायी पहलू यह भी है कि अजय सोलंकी के बडे भाई की कुछ समय पहले मौत हो गई थी. जिसकी बेटी का पालन पोषण अजय सोलंकी ही कर रहे थे और अब अजय सोलंकी भी तीन वर्षो से कोमा में पडे हैं. जिसके चलते अजय सोलंकी की मां सहायता की गुहार लेकर दर-दर भटकने पर मजबूर है.
उक्त दोनों कहानियों के जरिए सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग का असंवेदनशील चेहरा व चरित्र उजागर हुए है और इन दोनों कहानियों के जरिए यह भी समझा जा सकता है कि जो महकमा खुद अपने अधिकारियों व कर्मचारियों के प्रति इस हद तक असंवेदनशील रह सकता है, उससे जन सामान्यों के लिए क्या ही अपेक्षा व उम्मीद रखी जा सकती है.

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