अब तक पुलिस की निगाहों से कैसे बचा रहा बापट चौक का वाईन सेंटर?

बापट चौक का ‘खुला बार’ आखिर वर्षों तक किसके संरक्षण में चलता रहा?

* सिटी कोतवाली से चंद कदम की दूरी पर चल रहा था खुले में शराबखोरी का अड्डा
* वाईन सेंटर को केवल शराब बेचने का लाइसेंस, लेकिन पास में बैठकर शराब पीने, पानी, चखना और घंटों जमावड़े की पूरी व्यवस्था
* अब तक आबकारी विभाग भी कर रहा था अनदेखी, दो दिन पहले हुए हत्याकांड ने खोल दी पूरे खेल की पोल
* पुलिस और आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल, ‘अंदरबट्टे’ में जमकर ‘मखाने’ बंटने की जबरदस्त चर्चा
* अब पुलिस खुले में शराब पीने वालों के खिलाफ जल्द ही मोर्चा खोलने का कर रही दावा
* शराब पीने हेतु जगह उपलब्ध करानेवाले वाईन शॉप के खिलाफ कार्रवाई को लेकर आबकारी विभाग से की जाएगी सिफारिश
अमरावती/दि.4 – बापट चौक स्थित वाईन सेंटर के समीप दो दिन पूर्व हुए सनसनीखेज हत्याकांड ने केवल एक आपराधिक घटना को उजागर नहीं किया है, बल्कि शहर के बीचोंबीच वर्षों से खुलेआम चल रहे उस कथित तंत्र को भी बेनकाब कर दिया है, जिसे देखने के बावजूद जिम्मेदार विभागों ने मानो आंखें मूंद रखी थीं. अब सबसे बड़ा सवाल यही पूछा जा रहा है कि आखिर सिटी कोतवाली पुलिस थाने से महज कुछ कदम की दूरी पर चल रहे इस पूरे खेल पर पुलिस और आबकारी विभाग की नजर क्यों नहीं गई, या फिर जानबूझकर नजरअंदाज किया गया? घटना के बाद से क्षेत्र में चर्चा का एक ही विषय है कि जिस स्थान पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग शराब खरीदकर खुलेआम बैठकर पीते थे, जहां पीने वालों के लिए बैठने की व्यवस्था थी, जहां पानी और चखने की सुविधा तक उपलब्ध थी, वह सब कुछ आखिर वर्षों तक बिना किसी प्रशासनिक कार्रवाई के कैसे चलता रहा? स्थानीय नागरिकों का कहना है कि दो दिन पहले हुई हत्या ने उस व्यवस्था को उजागर कर दिया है, जिसकी जानकारी क्षेत्र के लगभग हर व्यक्ति को थी. लोगों के अनुसार शाम ढलते ही वाईन सेंटर के आसपास शराब पीने वालों का जमावड़ा लगना आम बात थी. कई बार वहां विवाद, गाली-गलौज और झगड़े जैसी घटनाएं भी होती थीं, लेकिन व्यवस्था जस की तस बनी रही. अब जब हत्या जैसी गंभीर घटना सामने आई है तो प्रशासन सक्रिय दिखाई दे रहा है, लेकिन नागरिक सवाल पूछ रहे हैं कि क्या कार्रवाई के लिए हमेशा किसी बड़ी वारदात का इंतजार करना जरूरी है?
बता दे कि, आबकारी नियमों के अनुसार सामान्य वाईन शॉप को केवल शराब बेचने की अनुमति होती है. ग्राहकों को बैठाकर शराब पिलाने अथवा सेवन के लिए स्थान उपलब्ध कराने के लिए अलग प्रकार की अनुमति और लाइसेंस की आवश्यकता होती है. बापट चौक के मामले में स्थानीय लोगों का आरोप है कि यहां वर्षों से शराब बिक्री के साथ-साथ शराब सेवन की भी व्यवस्था उपलब्ध थी. स्थिति यह थी कि शराब खरीदने वाला व्यक्ति कुछ ही कदम दूर जाकर आराम से बैठ सकता था, पानी पी सकता था, चखना मंगा सकता था और घंटों तक वहीं समय बिता सकता था. यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि लाइसेंस की मूल भावना के खिलाफ भी माना जा सकता है.
* झुनका-भाकर केंद्र बना था शराबियों का ठिकाना?
हत्याकांड के बाद सबसे अधिक चर्चा लालाजी झुनका-भाकर केंद्र को लेकर हो रही है. स्थानीय लोगों का दावा है कि यह स्थान केवल भोजनालय भर नहीं रह गया था, बल्कि शराब खरीदकर आने वालों के लिए एक सुविधाजनक ठिकाना बन चुका था. बताया जाता है कि यहां बैठने की व्यवस्था, पीने के पानी की सुविधा और चखने की उपलब्धता के कारण बड़ी संख्या में शराब सेवन करने वाले लोग यहां पहुंचते थे. घटना के बाद से इस केंद्र पर ताला लटका हुआ है, जिसने लोगों के संदेह और भी बढ़ा दिए हैं. नागरिकों का कहना है कि यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप था तो फिर घटना के बाद अचानक गतिविधियां बंद क्यों हो गईं?
* पुलिस थाना पास, फिर भी नहीं दिखा ‘खुला राज’?
इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि संबंधित क्षेत्र शहर के अत्यंत संवेदनशील और व्यस्त इलाके में स्थित है. सिटी कोतवाली पुलिस थाना भी वहां से बेहद कम दूरी पर है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि प्रतिदिन होने वाली गतिविधियां, शराब पीने वालों की भीड़, देर रात तक लगने वाले जमावड़े और होने वाले विवाद पुलिस की नजर में कभी आए ही नहीं, या फिर उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया? स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि आम नागरिकों को यह सब दिखाई दे रहा था तो संबंधित विभागों को क्यों नहीं दिखाई दिया? * आबकारी विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में
मामले में आबकारी विभाग की भूमिका को लेकर भी तीखे सवाल उठ रहे हैं. शराब बिक्री केंद्रों की निगरानी और लाइसेंस की शर्तों का पालन सुनिश्चित करना विभाग की जिम्मेदारी मानी जाती है. नागरिक पूछ रहे हैं कि यदि वर्षों से कथित रूप से शराब सेवन के लिए स्थान उपलब्ध कराया जा रहा था, तो विभागीय निरीक्षणों में यह बात कभी सामने क्यों नहीं आई? क्या निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित थे या फिर कहीं न कहीं निगरानी तंत्र ही विफल साबित हुआ?
* वर्षों तक चलता रहा खेल, किसी ने नहीं पूछा सवाल
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि यह व्यवस्था कोई नई नहीं थी. लंबे समय से यहां शाम होते ही शराबियों का जमावड़ा लगना सामान्य दृश्य बन चुका था. आसपास के दुकानदारों और रहवासियों को इससे परेशानी भी होती थी, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकाला गया. कई लोगों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई होती तो क्षेत्र की छवि खराब नहीं होती और संभवतः ऐसी गंभीर घटनाओं की नौबत भी नहीं आती.
* अब कार्रवाई के दावे, लेकिन जनता पूछ रही-अब तक क्या कर रहे थे?
हत्याकांड के बाद पुलिस प्रशासन ने खुले में शराब पीने वालों के खिलाफ अभियान चलाने और सार्वजनिक स्थानों पर शराब सेवन रोकने की बात कही है. साथ ही उन वाईन शॉप्स के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश करने की भी तैयारी बताई जा रही है, जिनके आसपास शराब पीने की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाती है. लेकिन नागरिकों का सवाल है कि यदि यह सब पहले से चल रहा था तो कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई? क्या प्रशासन को इस गतिविधि की जानकारी नहीं थी या फिर जानकारी होने के बावजूद कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया?
* जवाबदेही तय होगी या मामला ठंडा पड़ जाएगा?
हत्याकांड के बाद फिलहाल क्षेत्र में सन्नाटा जरूर है, लेकिन इससे कई बड़े प्रश्न खड़े हो गए हैं. यदि जांच में यह सामने आता है कि वाईन सेंटर के आसपास नियमों के विपरीत शराब सेवन की व्यवस्था उपलब्ध कराई जा रही थी, तो केवल लाइसेंसधारक ही नहीं बल्कि निगरानी की जिम्मेदारी निभाने वाले विभागों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए. शहर में अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि केवल प्रतीकात्मक कार्रवाई से काम नहीं चलेगा. यह भी जांच होनी चाहिए कि वर्षों तक चल रही कथित अनियमितताओं की जानकारी किसे थी, किसने कार्रवाई नहीं की और किन कारणों से व्यवस्था को पनपने दिया गया. बापट चौक का यह मामला अब केवल एक हत्याकांड की जांच तक सीमित नहीं रह गया है. यह पुलिस निगरानी, आबकारी नियंत्रण, लाइसेंस व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही की भी परीक्षा बन चुका है. आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच केवल घटना तक सीमित रहती है या फिर उन सवालों के जवाब भी तलाशे जाते हैं जो वर्षों से शहर के बीचोंबीच खड़े थे, लेकिन जिन पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.

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