मजीप्रा निर्मित जलसंकट ने खोली सिस्टम की पोल

पाइपलाइन फूटी, शहर प्यासा रहा और अफसर मनुहार में व्यस्त!

अमरावती/दि.11- अमरावती-मोर्शी जलसंकट ने एक बार फिर सरकारी तंत्र की नाकामी को नंगा कर दिया है. करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद नागरिक बूंद-बूंद पानी के लिए भटकते रहे, जबकि जिम्मेदार विभाग कागजी दावों और बैठकों में उलझा रहा. सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह जलसंकट प्राकृतिक था या फिर पूरी तरह प्रशासन निर्मित.
बता दे कि अमृत-2 योजना के तहत मोर्शी-अमरावती नई पाइपलाइन डालने का काम शुरू होने का दावा किया गया था. यदि वास्तव में काम शुरू हुआ, तो फिर वह बीच में कहां अटक गया? जनता जानना चाहती है कि विकास के नाम पर घोषणाएं हुईं, निधि आई, टेंडर हुए, लेकिन जमीन पर काम की गति आखिर इतनी सुस्त क्यों रही? यदि नई पाइपलाइन समय पर तैयार होती, तो क्या शहर को इस अपमानजनक जलसंकट का सामना करना पड़ता? सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जलसंकट विकराल होने के बाद भी प्रशासन निर्णायक कार्रवाई करने की बजाय आंदोलनकारी ठेकेदारों की मनुहार करता रहा. सवाल यह उठता है कि जब जिलाधिकारी को आपातकालीन परिस्थितियों में विशेष अधिकार प्राप्त हैं, तब मजीप्रा अधिकारियों को आखिर ठेकेदारों के सामने हाथ जोड़ने की नौबत क्यों आई? इस मनुहार और समझाइश में कितने घंटे और कितने दिन बर्बाद हुए और उस दौरान हजारों परिवारों ने बिना पानी के कैसे दिन काटे, इसका जवाब कौन देगा?
ध्यान देनेवाली बात यह हैं कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ. इससे पहले भी कई बार पाइपलाइन फूटने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं. हर बार वही घिसा-पिटा तरीक, पाइपलाइन फूटी, पानी बंद हुआ, मरम्मत हुई, फोटो खिंचे और मामला खत्म. आखिर यह कब तक चलेगा. क्या आज भी मरम्मत पुराने जुगाड़ू तरीकों से ही हो रही है, या फिर आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है. यदि तकनीक मौजूद है, तो बार-बार पाइपलाइन क्यों फूट रही है?
एक और गंभीर प्रश्न यह है कि पाइपलाइन फूटने की घटनाओं की रिपोर्ट शासन तक पहुंचती भी है या नहीं? यदि जाती है, तो किस रूप में? क्या केवल खानापूर्ति के लिए रिपोर्ट भेजी जाती है या जिम्मेदारी तय होती है? कितने लाख लीटर पानी बह गया, कितने घंटे सप्लाई बंद रही, कितना आर्थिक नुकसान हुआ और इसके लिए जिम्मेदार कौन था क्या यह सब कहीं दर्ज होता है?
इस जलसंकट ने पानी के व्यापार को भी अचानक चमका दिया. संकट के दिनों में पानी के कैन की मांग कई गुना बढ़ गई. बोतलबंद पानी की बिक्री में उछाल आया. जिन नागरिकों के घरों में नल सूख गए, उन्हें मजबूरी में महंगा पानी खरीदना पड़ा. सवाल यह है कि क्या प्रशासन ने इस दौरान निजी विक्रेताओं पर कोई नियंत्रण रखा, या फिर जनता की मजबूरी कुछ लोगों के लिए कमाई का जरिया बन गई. मुख्य अभियंता आखिर इस पूरे मामले को किस नजर से देख रहे हैं. क्या यह केवल तकनीकी खराबी है या फिर विभागीय लापरवाही का परिणाम. यदि पाइपलाइन बार-बार फूट रही है, तो क्या संपूर्ण जलप्रणाली का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाएगा और यदि कराया गया, तो उसकी रिपोर्ट जनता के सामने रखी जाएगी या हमेशा की तरह फाइलों में दफन कर दी जाएगी?
सबसे बड़ी विफलता मजीप्रा का जनता से संवाद न करना है. शहर प्यास से तड़पता रहा, लेकिन नागरिकों को यह तक नहीं बताया गया कि पानी कब आएगा, मरम्मत कितनी देर चलेगी और वैकल्पिक व्यवस्था क्या है. आखिर जनता को अंधेरे में क्यों रखा गया? क्या प्रशासन को डर था कि सच सामने आया, तो जवाब देना मुश्किल हो जाएगा. इस पूरे प्रकरण में जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है. चुनाव के समय पानी का मुद्दा उठाने वाले नेता संकट के दिनों में आखिर गायब क्यों हो जाते हैं. जनता जब पानी के लिए भटक रही थी, तब कितने जनप्रतिनिधि सड़कों पर उतरकर जवाब मांग रहे थे.
अमरावती जिले में जलस्रोतों की कमी नहीं है, फिर भी शहर प्यासा है. इसका मतलब साफ है कि संकट पानी का नहीं, व्यवस्था की नीयत और नियोजन का है. जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, पारदर्शिता नहीं आएगी और जनता को सच नहीं बताया जाएगा, तब तक हर गर्मी में यही मजीप्रा निर्मित जलसंकट शहर की नियति बना रहेगा.

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