हभप ज्ञानेश्वर महाराज पातशे का निधन
शोकाकुल माहौल में हुआ अंतिम संस्कार

अमरावती/दि.7 – स्थानीय अंबा विहार स्थित ज्ञानदेवाश्रम (भामटी महाराज झोपडी) के मुख्य कर्ता-धर्ता गुरूवर्य हभप ज्ञानेश्वर महाराज पातशे का आज तडके अकस्मात निधन हो गया. वे 65 वर्ष की आयु के थे. हभप ज्ञानेश्वर महाराज पातशे के निधन का समाचार मिलते ही वारकरी सम्प्रदाय सहित सामाजिक व धार्मिक क्षेत्र में शोक की लहर व्याप्त हो गई तथा उनके अंतिम दर्शनों हेतु ज्ञानदेवाश्रम में लोगों की भीड उमडने लगी. जिसके उपरांत दोपहर 2 बजे ज्ञानदेवाश्रम से दिवंगत पातशे महाराज की अंतिम यात्रा निकाली गई तथा ज्ञानदेवाश्रम परिसर में ही उनके पार्थिव पर अग्निसंस्कार किये गए. अंतिम संस्कार वाले इसी स्थान पर आगे चलकर ह.भ.प. ज्ञानेश्वर महाराज पातशे की समाधि को साकार किया जाएगा. ऐसी जानकारी पातशे परिवार के पारिवारिक सुत्रों द्वारा दी गई.
हभप श्री ज्ञानेश्वर महाराज पातशे अपने पश्चात पत्नी ललीता, पुत्र डॉ. योगेश व पुत्र वधु डॉ. किरण पातशे तथा दो विवाहित पुत्रियों एड. करूणा काटोलकर व अनुराधा देशमुख सहित भरापूरा परिवार छोड गये है. उल्लेखनीय यह भी है कि अमरावती स्थित ज्ञानदेवाश्रम का सफलतापूर्वक संचालन करने के साथ ही हभप ज्ञानेश्वर महाराज पातशे द्बारा श्री क्षेत्र कौंडण्यपुर स्थित अंबिका मंदिर संस्थान के संचालन का जिम्मा भी संभाला जाता था.
मूलत: परतवाडा रोड पर मेघनाथपुर फाटे के पास स्थित निजामपुर गांव से वास्ता रखनेवाले हभप ज्ञानेश्वर महाराज पातशे का बाल्यकाल से ही जयराम बाबा उर्फ भामटी महाराज के आश्रम में अपने पिता के साथ आना जाना रहा. जिनकी दिव्यता को देखते हुए भामटी महाराज की पत्नी ने उन्हें गोद लेते हुए अपना दत्तक पुत्र बना लिया था. जिसके चलते ज्ञानेश्वर महाराज पातशे आगे चलकर जयराम बाबा की गति के उत्तराधिकारी बने और ज्ञानदेवाश्रम के संचालन का जिम्मा संभालने लगे.
* अपने गुरू की पुण्यतिथि वाले दिन ही हुआ निधन
विशेष उल्लेखनीय है कि आज 7 अगस्त को ही तिथि अनुसार जयराम बाबा उर्फ भामटी महाराज की पुण्यतिथि है. जिसके चलते ज्ञानदेवाश्रम में पुण्यतिथि महोत्सव की विगत दो दिनों से तैयारियां चल रही थी. परंतु इसी दौरान बीती रात हभप ज्ञानेश्वर महाराज पातशे की अचानक ही तबियत बिगडी और उन्हें शहर के एक निजी अस्पताल हेतु भर्ती कराया गया. जहां पर आज तडके करीब 4.30 बजे के आसपास पातशे महाराज ने अपनी अंतिम सांस ली. यानी जिस तिथि पर पातेश महाराज के गुरू जयराम बाबा उर्फ भामटी महाराज का देहावसान हुआ था. उसी तिथि पर पातशे महाराज ने भी इहलोक से विदा लेते हुए एक तरह से अपने गुरू के पदचिन्हों पर चलने का अनुसरण किया.





