स्कूल खुले, लेकिन बच्चों की सुरक्षा भगवान भरोसे!
परिवहन नियमों की उड़ रही धज्जियां, हजारों विद्यार्थियों की जान जोखिम में

* स्कूल बसों में क्षमता से अधिक बच्चे, सड़कों पर खड़े वाहन बढा रहे खतरा
* आश्रम शालाओं के पहले दिन निःशुल्क गणवेशों का भी नहीं हुआ वितरण, पुराने कपडों में ही पहुंचे बच्चे
अमरावती/दि.30- जिले में आज 30 जून से नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत होने जा रही है. लाखों अभिभावकों और हजारों विद्यार्थियों के लिए यह उत्साह का अवसर है, लेकिन इसके साथ ही एक गंभीर और चिंताजनक सवाल फिर सामने खड़ा हो गया है, क्या जिले के विद्यार्थी वास्तव में सुरक्षित हैं? स्कूल खुलने से पहले ही विद्यार्थियों की सुरक्षित परिवहन व्यवस्था और आश्रमशालाओं में मूलभूत सुविधाओं की स्थिति ने शिक्षा व्यवस्था की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
बता दे कि शासन ने विद्यार्थियों की सुरक्षित आवाजाही के लिए सख्त नियम बनाए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन नियमों का पालन कराने वाला कोई दिखाई नहीं देता. स्कूल बसें, वैन और ऑटो रिक्शा आज भी मनमानी ढंग से चल रहे हैं. क्षमता से अधिक बच्चों को ठूंस-ठूंसकर बैठाना, सुरक्षा मानकों की अनदेखी करना और नियमों को कागजों तक सीमित रखना आम बात बन चुकी है.
* स्कूल बस या चलता-फिरता खतरा?
शहर की कई निजी और अंग्रेजी माध्यम की शालाएं पहले ही शुरू हो चुकी हैं. विद्यार्थियों को लाने-ले जाने के लिए स्कूल बस, वैन और ऑटो रिक्शा का उपयोग किया जा रहा है. लेकिन इन वाहनों की वास्तविक स्थिति किसी से छिपी नहीं है. नियमों के अनुसार स्कूल वाहनों में निर्धारित संख्या से अधिक विद्यार्थियों को बैठाने की अनुमति नहीं है. लड़कियों की सुरक्षा के लिए महिला सहायिका तथा अन्य विद्यार्थियों के लिए प्रशिक्षित सहायक रखना अनिवार्य है. लेकिन अधिकांश स्कूल वैन और निजी परिवहन वाहनों में यह व्यवस्था दिखाई नहीं देती. ऐसे में किसी भी दुर्घटना की स्थिति में सबसे अधिक खतरा उन्हीं बच्चों को होता है, जिनकी सुरक्षा के लिए निर्धारित व्यवस्थाएं मौजूद नहीं होतीं. इसके बावजूद प्रशासन और स्कूल प्रबंधन की उदासीनता लगातार बनी हुई है.
* सड़क किनारे खड़ी स्कूल बसें, हर दिन हादसे को न्यौता
विद्यार्थियों के परिवहन से जुड़ा एक और गंभीर मुद्दा स्कूल वाहनों की पार्किंग व्यवस्था है. गृह एवं शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार विद्यार्थियों को लेने-छोड़ने वाले वाहन मुख्य यातायात मार्ग से कम से कम 100 मीटर दूर खड़े किए जाने चाहिए. लेकिन अमरावती शहर में वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है. अधिकांश स्कूल बसें और वैन व्यस्त सड़कों, चौराहों और फुटपाथों के पास खड़ी दिखाई देती हैं. इससे यातायात बाधित होता है और बच्चों के सड़क पार करते समय दुर्घटना की आशंका कई गुना बढ़ जाती है.
* पालकों पर महंगाई की दोहरी मार
एक ओर सुरक्षा व्यवस्था अधूरी है, तो दूसरी ओर अभिभावकों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ने वाला है. पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि के कारण इस वर्ष स्कूल बस और वैन संचालकों द्वारा परिवहन शुल्क में 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी किए जाने की संभावना जताई जा रही है. अभिभावकों का कहना है कि वे पहले से ही शिक्षा, पुस्तकें, यूनिफॉर्म और अन्य खर्चों से परेशान हैं. अब परिवहन शुल्क बढ़ने से मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट और बिगड़ जाएगा. सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अभिभावक हजारों रुपये शुल्क दे रहे हैं, तो बदले में उन्हें सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण परिवहन सुविधा क्यों नहीं मिल रही?
* बड़ा सवाल: हादसे का इंतजार क्यों?
हर वर्ष स्कूल खुलने के साथ विद्यार्थियों की सुरक्षा को लेकर बैठकें, निर्देश और दावे किए जाते हैं. लेकिन कुछ ही दिनों में सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आता है. क्षमता से अधिक बच्चों से भरे वाहन, बिना सहायिकाओं की वैन, अव्यवस्थित पार्किंग और अधूरी सुरक्षा व्यवस्था बच्चों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रही है. शिक्षा विशेषज्ञों और पालकों का कहना है कि प्रशासन को केवल कागजी आदेश जारी करने के बजाय व्यापक अभियान चलाकर स्कूल बसों, वैनों और ऑटो रिक्शाओं की विशेष जांच करनी चाहिए. साथ ही नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन संचालकों और स्कूल प्रबंधन पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए. क्योंकि सवाल केवल परिवहन का नहीं, बल्कि हजारों बच्चों की जिंदगी और भविष्य का है.
* आश्रमशालाओं में फिर गणवेश का संकट
– हजारों बच्चे पहले दिन बिना यूनिफॉर्म के पहुंचे स्कूल
जहां एक ओर निजी स्कूलों में परिवहन व्यवस्था सवालों के घेरे में है, वहीं आदिवासी विकास विभाग की आश्रमशालाओं में गणवेश वितरण का मुद्दा फिर विवाद का विषय बन गया है. अमरावती अपर आयुक्तालय के अंतर्गत 82 शासकीय और 127 अनुदानित आश्रमशालाएं संचालित हैं. इन संस्थानों में हजारों आदिवासी विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं. विभाग ने दावा किया है कि पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए पाठ्यपुस्तकों की व्यवस्था कर दी गई है और पुस्तकें समय पर उपलब्ध होंगी. लेकिन गणवेश का संकट अब भी बरकरार है.
ज्ञात रहे कि पिछले शैक्षणिक वर्ष में विद्यार्थियों को पहला गणवेश फरवरी महीने में मिला था, जबकि दूसरा गणवेश पूरे वर्ष नहीं मिला. इस वर्ष भी गणवेश वितरण को लेकर शासन स्तर पर निर्णय लंबित है. परिणामस्वरूप हजारों विद्यार्थी नए शैक्षणिक सत्र के पहले दिन बिना गणवेश के स्कूल पहुंचने को मजबूर होंगे. अमरावती अपर आयुक्तालय के अंतर्गत संचालित शासकीय, अनुदानित आश्रमशालाओं, एकलव्य पब्लिक स्कूलों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में 50 हजार से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं. ऐसे में विद्यार्थियों की सुरक्षा, परिवहन व्यवस्था और मूलभूत सुविधाओं को लेकर प्रशासन की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है.





