स्व-परिवर्तन महान् अनुष्ठान – साध्वी स्नेहाशाश्रीजी
विशुद्ध वर्षावास: बाह्य नमन से ’हृदय की विशालता’ की ओर

अमरावती/दि.31-चातुर्मास केवल काल-परिवर्तन या स्थान-स्थिरता का पर्व नहीं है, बल्कि यह स्व-परिवर्तन और भाव-विशुद्धि का महान् अनुष्ठान है. पूज्य साध्वीजी स्नेहाशाश्रीजी के मुखारविंद से निकली यह जिनवाणी हमें बाह्य आडंबरों से खींचकर सीधे आत्मा के प्रांगण में खड़ा कर देती है.
साध्वीजी ने आगे बताया कि जब साधक नदी, मगरमच्छ, समुद्र और आकाश की ओर देखता है, तो संसार की हर वस्तु अपने से बड़े का पता बताती है. लेकिन अंतिम सत्य यह है कि इस पूरी सृष्टि में सबसे विशाल वस्तु मनुष्य का हृदय है.
आकाश की भी एक सीमा हो सकती है, लेकिन जिस हृदय में समता, करुणा और क्षमा का भाव आ जाए, वह अनंत हो जाता है. यदि हृदय में परमात्मा का प्रकाश नहीं जगा, यदि मन में दूसरों के प्रति संकीर्णता और कषाय बने रहे, तो बड़े से बड़े सागर या आकाश को किया गया प्रणाम भी अधूरा ही रहेगा. भक्ति तब तक फलदाई नहीं होती, जब तक भक्त का हृदय विशाल न हो जाए.
आगे साध्वीजी बताती है कि विशुद्ध वर्षावास का वास्तविक अर्थ क्या है वर्षा ऋतु में बाहर जल की धारा बरसती है, जो धरती की धूल धोती है. ठीक उसी प्रकार चातुर्मास में जिनवाणी की धारा बहती है, जिसका एकमात्र उद्देश्य हमारे मन की कलुषता और अशुद्ध भावों को धोना है: ये कैसे कर सकते है तो आहार संयम से भाव-संयम: उपवास और रस-त्याग का बाह्य नियम केवल शरीर को तपाने के लिए नहीं, बल्कि जीभ और इंद्रियों के माध्यम से मन में उठने वाले अशुद्ध भावों को शांत करने के लिए है. जैसा शुद्ध आहार और संयम होगा, वैसा ही विशुद्ध मन होगा.
अंदर झांकने का समय: चातुर्मास हमें सिखाता है कि दूसरों की गलतियों को देखने के बजाय अपने हृदय को टटोलो. कहाँ-कहाँ राग, द्वेष, अभिमान और स्वार्थ की परतें जमी हैं, उन्हें हटाना ही सच्चा चातुर्मास है.
* जैन दर्शन कहता है – आत्मा ही परमात्मा है
परमात्मा कहीं बाहर किसी आकाश में नहीं, बल्कि हमारे विशुद्ध हृदय में ही विराजमान हैं. जब वर्षावास के इन चार महीनों में हम अपने हृदय को कषायों से मुक्त कर उदार, क्षमाशील और निर्मल बनाते हैं, तब बाह्य भक्ति की आवश्यकता ही नहीं रहती; हमारा प्रत्येक क्षण, प्रत्येक स्वास स्वयं भक्ति बन जाता है. इस ’विशुद्ध वर्षावास’ में हम केवल बाह्य तप-जप तक सीमित न रहें. अपने हृदय के द्वार खोलें, उसे आकाश से भी बड़ा और समुद्र से भी गहरा बनाएं. जब हृदय शुद्ध और विशाल होगा, तभी उसमें बैठा परमात्मा प्रकट होगा और यही चातुर्मास की सच्ची सार्थकता होगी.अपने संकुचित मन को बड़ा बनाकर हर बात को मन से लगाने की आदत का त्याग करें, क्योंकि व्यर्थ बातों को पकड़े रखना जिनवाणी के विपरीत है. जब हृदय निर्मल और विशाल होगा, तभी उसमें परमात्मा प्रकट होंगे और यही इस विशुद्ध वर्षावास की सच्ची सार्थकता होगी.





