6 सांसदों के विलय से शिंदे सेना हुई मजबूत

लोकसभा में संख्या 13 पहुंची, एनडीए में तीसरी सबसे बड़ी सहयोगी बनी शिवसेना

* भाजपा की बढ़ी रणनीतिक चुनौती, प्रभाव संतुलित रखने के लिए भाजपा नए समीकरणों पर कर रही विचार
मुंबई/दि.21– शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी मिलने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरण उभरने लगे हैं. इस घटनाक्रम के बाद लोकसभा में शिंदे सेना के सांसदों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है, जिससे वह भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की तीसरी सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी बन गई है. राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि शिंदे सेना की बढ़ी ताकत के बीच भाजपा अब उसके प्रभाव को संतुलित रखने के लिए नई रणनीति पर काम कर रही है.
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मानसून सत्र शुरू होने से दो दिन पहले ठाकरे गुट के छह सांसदों के समूह को शिंदे सेना में विलय की मंजूरी दी. इन सांसदों में धाराशिव के ओमराजे निंबालकर, शिर्डी के भाऊसाहेब वाकचौरे, हिंगोली के नागेश आष्टीकर, वाशिम के संजय देशमुख और उत्तर-पूर्व मुंबई के संजय दिना पाटिल सहित कुल छह सांसद शामिल हैं. इन सांसदों ने 22 जून को विकास कार्यों को कारण बताते हुए शिंदे सेना में प्रवेश किया था. इस पूरे अभियान को शिंदे सेना ने ‘ऑपरेशन टाइगर’ नाम दिया था. इस विलय के बाद लोकसभा में शिंदे सेना के सांसदों की संख्या 7 से बढ़कर 13 हो गई है.
बता दे कि, वर्तमान लोकसभा में भाजपा के 240 सांसद हैं, जबकि तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के 16 सांसद हैं. अब 13 सांसदों के साथ शिंदे सेना एनडीए की तीसरी सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी बन गई है. इससे केंद्र की राजनीति में भी एकनाथ शिंदे की भूमिका पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली मानी जा रही है. लोकसभा में महाराष्ट्र के संदर्भ में देखें तो शिंदे सेना अब 13 सांसदों के साथ कांग्रेस के बराबर राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है. दूसरी ओर भाजपा के पास महाराष्ट्र से केवल 9 सांसद हैं. ऐसे में शिंदे सेना का राजनीतिक महत्व बढ़ना स्वाभाविक माना जा रहा है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा महायुति में सबसे प्रभावशाली दल बन गई थी और एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री पद छोड़कर उपमुख्यमंत्री बनना पड़ा था. लेकिन अब लोकसभा में बढ़ी ताकत ने शिंदे सेना को फिर से राजनीतिक वजन दिलाया है. सूत्रों के अनुसार यदि केंद्र सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार होता है तो बढ़े हुए संख्याबल के आधार पर शिंदे सेना दो मंत्री पदों की मांग कर सकती है. पार्टी के सांसद और एकनाथ शिंदे के पुत्र डॉ. श्रीकांत शिंदे का नाम संभावित मंत्रियों की सूची में सबसे आगे बताया जा रहा है. इसके अलावा हाल ही में पार्टी में शामिल हुए कुछ वरिष्ठ सांसद भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह पाने की कोशिश कर सकते हैं. बढ़ी हुई संख्या का लाभ संसदीय समितियों और एनडीए की समन्वय प्रक्रिया में भी मिल सकता है.
राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक भाजपा शिंदे सेना की बढ़ती ताकत को ध्यान में रखते हुए अपने विकल्प खुले रखना चाहती है. इसी कारण भाजपा ने शरद पवार के नेतृत्व वाले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) गुट के साथ संवाद की संभावनाएं पूरी तरह बंद नहीं की हैं. शरद पवार गुट के पास लोकसभा में 8 सांसद हैं, जबकि उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाले गुट के पास 1 सांसद है. यदि दोनों गुट भविष्य में एक साथ आते हैं तो उनका संयुक्त संख्याबल 9 सांसदों का हो सकता है. हालांकि यह संख्या शिंदे सेना के 13 सांसदों से कम होगी, लेकिन भाजपा को एक अतिरिक्त मजबूत सहयोगी मिल सकता है.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा का उद्देश्य किसी सहयोगी दल को अत्यधिक प्रभावशाली होने से रोकते हुए गठबंधन में संतुलन बनाए रखना हो सकता है. हाल ही में राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद पवार गुट) के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात की थी. आधिकारिक तौर पर इसे विकास कार्यों और स्थानीय मुद्दों से जुड़ी बैठक बताया गया, लेकिन इसके बाद राजनीतिक गलियारों में नए समीकरणों की चर्चा तेज हो गई. हालांकि भाजपा और शिंदे सेना दोनों ही महायुति को मजबूत और एकजुट बताते रहे हैं.
इस राजनीतिक घटनाक्रम का कानूनी पक्ष भी महत्वपूर्ण है. उद्धव ठाकरे गुट ने सांसदों के विलय को न्यायालय में चुनौती देने का संकेत दिया है. ठाकरे गुट का तर्क है कि केवल संसदीय दल के सदस्यों के दूसरे दल में जाने से मूल राजनीतिक दल का विलय नहीं माना जा सकता. इसके लिए संगठनात्मक स्तर पर भी विलय आवश्यक होता है. ठाकरे गुट के नेता आदित्य ठाकरे ने भी इस फैसले पर नाराजगी जताते हुए कहा है कि वे इस मामले में कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे.
छह सांसदों के विलय के बाद एकनाथ शिंदे की शिवसेना न केवल महाराष्ट्र बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी अधिक प्रभावशाली स्थिति में पहुंच गई है. वहीं भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह अपने सबसे बड़े सहयोगी दलों के बीच संतुलन बनाए रखे. आने वाले महीनों में मंत्रिमंडल विस्तार, संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों और महाराष्ट्र की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच यह शक्ति संतुलन किस दिशा में जाता है, इस पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी.

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