तीन नवजातों की मौत ने खोली स्वास्थ्य व्यवस्था की परतें
डफरिन अग्निकांड : जिलेभर के अस्पतालों की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही पर उठ रहेे सवाल

अमरावती/दि.26– जिला महिला अस्पताल (डफरिन) के विशेष नवजात शिशु देखभाल कक्ष (एसएनसीयू) में तड़के हुए भीषण अग्निकांड में तीन नवजात शिशुओं की मौत ने पूरे महाराष्ट्र को झकझोर दिया है. वेंटिलेटर में हुए कथित विस्फोट के बाद फैली आग और जहरीले धुएं ने कुछ ही मिनटों में नवजात वार्ड को मौत के मुहाने पर पहुंचा दिया. हालांकि डॉक्टरों, नर्सों, अग्निशमन दल और अस्पताल कर्मियों की तत्परता से 36 बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, लेकिन तीन मासूमों की जान नहीं बच सकी. इस घटना ने केवल एक अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक जवाबदेही और अस्पतालों की वास्तविक स्थिति को कठघरे में खड़ा कर दिया है.
घटना के बाद जैसे-जैसे तथ्य सामने आ रहे हैं, वैसे-वैसे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि यह केवल एक तकनीकी दुर्घटना नहीं, बल्कि वर्षों से जमा होती जा रही प्रशासनिक लापरवाही, रिक्त पदों, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और निगरानी तंत्र की विफलता का परिणाम हो सकती है. यही कारण है कि अब जांच की मांग केवल आग लगने के कारणों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य प्रशासन की जवाबदेही तय करने की मांग जोर पकड़ रही है.
* आठ महीने से बिना पूर्णकालिक अधीक्षक के चल रहा था डफरिन अस्पताल
डफरिन अस्पताल में पिछले आठ महीनों से वैद्यकीय अधीक्षक का पद रिक्त पड़ा हुआ है. तत्कालीन अधीक्षक डॉ. विनोद पवार के जिला शल्य चिकित्सक (सीएस) पद पर पदोन्नत होने के बाद अस्पताल को नया पूर्णकालिक अधीक्षक नहीं मिल सका. स्थिति यह रही कि अस्पताल का अतिरिक्त प्रभार भी डॉ. पवार के पास ही रहा. स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि एक ऐसे अस्पताल में, जहां प्रतिदिन सैकड़ों मरीज और दर्जनों गंभीर नवजातों का उपचार होता है, वहां लंबे समय तक स्थायी नेतृत्व का अभाव प्रशासनिक कमजोरी को दर्शाता है. सवाल यह भी उठ रहा है कि स्वास्थ्य मंत्रालय, प्रधान सचिव और विभागीय वरिष्ठ अधिकारियों को इस स्थिति की जानकारी होने के बावजूद नियुक्ति क्यों नहीं की गई.
* वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की बैठकों का क्या लाभ?
स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी लगभग प्रतिदिन जिलों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से समीक्षा बैठकें करते हैं. स्वास्थ्य मंत्री भी समय-समय पर इन बैठकों में शामिल होते हैं. इसके बावजूद डफरिन अस्पताल में रिक्त पद, फायर ऑडिट की स्थिति, विद्युत सुरक्षा, उपकरणों के रखरखाव और आपदा प्रबंधन जैसी गंभीर कमियां कभी सामने क्यों नहीं आईं, यह सबसे बड़ा प्रश्न बन गया है. स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि समीक्षा बैठकें केवल आंकड़ों तक सीमित न रहकर वास्तविक निरीक्षण और जवाबदेही पर आधारित होतीं तो शायद यह हादसा रोका जा सकता था.
* वेंटिलेटर विस्फोट या सिस्टम फेलियर?
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार आग की शुरुआत एसएनसीयू में लगे वेंटिलेटर से हुई. घटना तड़के लगभग 3.30 बजे हुई, जब वार्ड में 39 नवजात भर्ती थे. कुछ ही सेकंड में धुएं ने पूरे कक्ष को अपनी चपेट में ले लिया. तीन बच्चों की मौत धुएं और आग की चपेट में आने से हुई, जबकि अन्य बच्चों को तत्काल बाहर निकालकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया. तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी चिकित्सा उपकरण में अचानक विस्फोट होना सामान्य घटना नहीं होती. इससे पहले तापमान बढ़ने, तकनीकी चेतावनी, वायरिंग में समस्या या अन्य संकेत मिल सकते हैं. ऐसे में उपकरणों के रखरखाव, निरीक्षण और इलेक्ट्रिकल ऑडिट को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.
* क्या फायर सेफ्टी सिस्टम भी फेल हुआ?
घटना के बाद परिजनों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान सामने आए हैं, जिनमें दावा किया गया कि आग लगने के दौरान अलार्म और स्प्रिंकलर सिस्टम प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाए. यदि यह तथ्य जांच में सही साबित होता है तो यह अस्पताल सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी विफलता मानी जाएगी. विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी आधुनिक अस्पताल में फायर अलार्म, स्मोक डिटेक्टर, स्प्रिंकलर सिस्टम और आपातकालीन निकास मार्ग सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच होते हैं. इनमें से किसी एक की भी विफलता गंभीर जनहानि का कारण बन सकती है.
* मौत के साए में भी चला साहसिक बचाव अभियान
आग और धुएं के बीच डॉक्टरों, नर्सों और अस्पताल कर्मचारियों ने असाधारण साहस का परिचय दिया. जिला शल्य चिकित्सक डॉ. विनोद पवार स्वयं घटनास्थल पर पहुंचे और धुएं से भरे वार्ड में प्रवेश कर बचाव कार्य में जुट गए. नर्सिंग स्टाफ और अन्य कर्मचारियों ने भी जान जोखिम में डालकर बच्चों को बाहर निकाला. इसी वजह से 39 में से 36 बच्चों को सुरक्षित बचाया जा सका. अमरावती महानगरपालिका के अग्निशमन दल ने भी त्वरित कार्रवाई की. सूचना मिलने के कुछ ही मिनटों में टीम अस्पताल पहुंची और राहत कार्य शुरू कर दिया.
* तीन मासूमों की मौत और परिवारों का अंतहीन दर्द
इस हादसे में जिन परिवारों ने अपने नवजात बच्चों को खोया, उनके लिए यह केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि जीवनभर का घाव बन गई है. अस्पताल परिसर में परिजनों का विलाप, बच्चों की तस्वीरें और न्याय की मांग ने पूरे शहर को भावुक कर दिया. एक परिवार की पीड़ा तब और बढ़ गई जब अचलपुर से इलाज के लिए अमरावती लाई गई बच्ची भी इस हादसे की भेंट चढ़ गई. परिजनों ने अस्पताल प्रशासन पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
* डफरिन के बाद अचलपुर अस्पताल की स्थिति ने बढ़ाई चिंता
डफरिन हादसे के बाद जब जिले के अन्य अस्पतालों की स्थिति सामने आई तो तस्वीर और भी चिंताजनक नजर आई. अचलपुर के महिला एवं बाल अस्पताल में नवजात विभाग तो है, लेकिन वहां वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं हैं. पूर्णकालिक बाल रोग विशेषज्ञ का पद भी नहीं भरा गया है. अस्पताल में केवल सीमित संसाधनों के आधार पर इलाज किया जाता है और गंभीर नवजातों को अमरावती रेफर कर दिया जाता है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि अमरावती जैसा बड़ा अस्पताल भी सुरक्षित नहीं रहा तो छोटे अस्पतालों की स्थिति कितनी कमजोर होगी.
* डेढ़ साल से नहीं हुआ कई अस्पतालों का फायर ऑडिट
हादसे के बाद सामने आया कि जिले के कई ग्रामीण और उपजिला अस्पतालों में पिछले एक से डेढ़ वर्ष से फायर ऑडिट नहीं हुआ है. जबकि राज्य सरकार हर वर्ष फायर सेफ्टी और इलेक्ट्रिकल सेफ्टी ऑडिट कराने के निर्देश जारी करती है. फायर ऑडिट में अग्निशमन यंत्रों की कार्यक्षमता, स्मोक डिटेक्टर, वायरिंग, आपातकालीन निकास मार्ग, पानी की उपलब्धता और सुरक्षा प्रणाली की जांच की जाती है. इसके अभाव में अस्पतालों की वास्तविक सुरक्षा स्थिति का पता ही नहीं चल पाता.
* प्रशिक्षण की कमी भी बनी चिंता का विषय
अनेक स्वास्थ्य कर्मचारियों ने स्वीकार किया है कि उन्हें नियमित रूप से अग्नि सुरक्षा और आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण नहीं मिलता. रात के समय किसी हादसे की स्थिति में प्रशिक्षित मानव संसाधन ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच होता है. ऐसे में प्रशिक्षण की कमी भविष्य में और बड़े जोखिम पैदा कर सकती है.
* केंद्र और राज्य सरकार हरकत में
घटना के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं तथा मृत बच्चों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये की सहायता देने की घोषणा की है. साथ ही घायलों के उपचार का पूरा खर्च सरकार द्वारा वहन किए जाने की बात कही गई है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी इस घटना का संज्ञान लेते हुए राज्य के स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ बैठक कर अस्पतालों में फायर सेफ्टी, इलेक्ट्रिकल सुरक्षा और मेडिकल उपकरणों के सुरक्षा ऑडिट को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए हैं.
* अब सवाल केवल डफरिन का नहीं, पूरे सिस्टम का है
डफरिन अस्पताल में तीन नवजातों की मौत ने महाराष्ट्र की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने कई असहज प्रश्न खड़े कर दिए हैं. क्या अस्पतालों में सुरक्षा ऑडिट केवल कागजों तक सीमित हैं? क्या रिक्त पदों और संसाधनों की कमी को प्रशासन ने सामान्य मान लिया है? क्या आधुनिक इमारतें और करोड़ों रुपये के उपकरण बिना प्रभावी निगरानी के सुरक्षित रह सकते हैं? इन सवालों के जवाब केवल जांच रिपोर्ट में नहीं, बल्कि आने वाले दिनों में सरकार और स्वास्थ्य विभाग द्वारा उठाए जाने वाले ठोस कदमों में छिपे हैं. क्योंकि तीन मासूमों की मौत केवल एक हादसा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की चेतावनी है, जो समय रहते नहीं जागी तो भविष्य में और भी बड़े हादसों का कारण बन सकती है.





