बच्चू कडू के शिवसेना प्रवेश से कितना बदलेगा विदर्भ और प्रदेश का राजकारण!

महायुति के घटक दलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण

* बहुत अनपेक्षित नहीं माना जा रहा कडू का धनुष्यबाण उठाना
अमरावती/दि.30 – अमरावती ने जब भी दिये हैं अफलातून लीडर दिये है. वे जिले से लेकर राज्यस्तर पर प्रभाव और चर्चा के केंद्र में रहे हैं. ऐसे ही लीडर्स में भाउसाहब देशमुख से लेकर सुदाम देशमुख, प्रतिभाताई पाटिल, आर. एस. गवई के नाम लिये जा सकते है. अतिरंजना न मानते हुए बच्चू कडू भी ऐसी श्रेणी में है, जिनका नाम और चर्चा पूरे प्रदेश में होती रही है. ऐसे बच्चू कडू के शिवसेना प्रवेश से पश्चिम विदर्भ सहित प्रदेश की राजनीति में परिवर्तन की संभावना राजनीतिक जानकार देख रहे हैं. वहीं अधिकांश का मानना है कि, कडू का शिवसेना में प्रवेश निश्चित ही बहुत अनपेक्षित नहीं माना जा सकता. साथ ही इस पर भी काफी कुछ निर्भर रहेगा कि, महायुति के घटक दल एकनाथ शिंदे के नये सहकारी का किस अंदाज में स्वागत और सहकार्य करते हैं.
बच्चू कडू 30 वर्षों से राजनीति में है. पहला विधानसभा चुनाव लडने के साथ उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस नेत्री को नाको चने चबवा दिये थे. हालांकि उस इलेक्शन में कडू को सफलता नहीं मिली थी. तथापि नये युवा नेता के उदय के रुप में उनकी चर्चा शुरु हो गई थी. उस समय बच्चू कडू शिवसैनिक थे. उन्होंने इसके बाद विधानसभा के 4 सफल चुनाव लडे. अपना प्रहार जनशक्ति पक्ष बनाया और उसे जनसमस्याओं, मुद्दे को मुखर करते हुए गोंदिया से लेकर मुंबई तक मजबूत किया.
कडू ने महाविकास आघाडी की सरकार में राज्य मंत्री पद प्राप्त किया और अकोला के पालकमंत्री के रुप में भी काम किया. जिससे बेशक उनका प्रहार संगठन और कार्यकर्ताओं का बेस अकोला में बढा. अपने आंदोलनों के लिए जाने जाते बच्चू कडू ने विदर्भ के सभी जिले में संगठन मजबूत किया है. उसी प्रकार एकनाथ शिंदे के बगावत के समय उन्होंने भरपूर साथ दिया और वे शिंदे के साथ गुवाहाटी भी गये. फलस्वरुप शिंदे के साथ उनके मधुरतम संबंध बने. शिंदे के खास उदय सामंत के साथ भी बच्चू कडू की अच्छी पटरी बैठी. मनोज जरांगे सहित विभिन्न आंदोलनों में बच्चू कडू ने मध्यस्थता की भूमिका निभाई तो उनके आंदोलन में उदय सामंत मध्यस्थ बनकर आये थे.
बच्चू कडू ने अनेक अवसरों पर अपनी जनता के बीच पकड को सिद्ध किया था. सामान्य लोगों के लिए आंदोलन करने और उच्चाधिकारियों से लड-भिड जाने की उनकी शैली भी उनकी लोकप्रियता को बढाती गई. ऐसे ही लोकप्रिय लीडर की आज एकनाथ शिंदे की शिवसेना को विदर्भ में आवश्यकता थी. विदर्भ में शिवसेना के संजय राठोड कृपाल तुमाने, भावना गवली सहित अनेक लीडर्स है. फिर भी अमरावती डिविजन मुख्यालय रहते पश्चिम विदर्भ में धनुष्यबाण का बल बढाने आवश्यक जननेता की एकनाथ शिंदे की खोज बच्चू कडू पर आकर टीकी. विधान परिषद के चुनाव का मौका साधकर एकनाथ शिंदे ने बच्चू कडू को आफर दी. कडू ने भी ऑफर का स्वीकार किया.
राजनीति के जानकार मान रहे हैं कि, कडू का शिवसेना में प्रवेश बहुत अनपेक्षित नहीं है, तो मूल शिवसेना से प्रहार होते हुए उनका शिवसेना शिंदे गट में प्रवेश के साथ एक सर्कल पूर्ण हो जाने की बात हो रही है. उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने भी कडू का पार्टी में स्वागत करते हुए तारीफों के पुल बांधे. ऐसे में सियासी समीक्षक यह भी कह रहे हैं कि, बच्चू कडू की शिवसेना में सक्रियता को पहले तो वर्तमान शिवसैनिक और उसके साथ ही महायुति के घटक दल किस अंदाज में देखते और लेते है, इस पर भी काफी कुछ निर्भर है. स्वयं शिवसेना में ही अमरावती जिले और आसपास के कई प्रमुख नामों ने पिछले कुछ अरसे में प्रवेश किया है. धनुष्यबाण उठाया है. अमरावती जिले की बात करें, तो प्रीति बंड से शुरुआत होकर जगदीश गुप्ता जैसे खांटी लीडर शिवसेना में आये है. उनका स्वागत करते हुए पद दिये गये. कडू की शिवसेना में एन्ट्री उस हिसाब से सबसे बडी कही जा रही है.
राजनीति के जानकारों से अमरावती मंडल ने चर्चा की, तो यह जरुर कहा गया कि, कडू का शिवसेना में आना बडी घटना है. बडा डेवलपमेंट है. राज्य की राजनीति पर इसका असर होना है. अब यह प्रभाव कितना और कैसा होता है, यह देखने वाली बात होगी. प्रहार जनशक्ति पक्ष के कडू के अपने समर्थक अपने लीडर के निर्णय को शिरोधार्य कर रहे हैं. वहीं जानकार यह भी मान रहे हैं कि, कडू के अगले कदम ही उनकी सियासत के प्रभाव को तय करेंगे.

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