बच्चा ‘संपत्ति’ नहीं, जिसे लापरवाही से दूसरे हाथ में सौंपा जाए

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने पिता की कस्टडी याचिका खारिज की, कहा

नागपुर/दि.13– बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने कहा है कि, नाबालिग कस्टडी के मामलों में बच्चा कोई संपत्ति नहीं है, जिसे मनमाने ढंग से एक हाथ से दूसरे हाथ में सौंप दिया जाए. ऐसे मामलों का निर्णय मानवीय आधार पर अत्यंत संवेदनशिलता के साथ किया जाना आवश्यक है. कोर्ट ने कहा कि, ऐसे मामलों में केवल ‘अधिकार’ नहीं, बल्कि बच्चों का ‘कल्याण’ सर्वोपरी है. कोर्ट ने यह टिप्पणी एक पिता द्वारा अपनी 8 वर्षीय बेटी की कस्टडी के लिए दायर ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ याचिका पर सुनवाई के दौरान कही. इसके साथ ही न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फालके और न्यायमूर्ति निवेदिता मेहता की पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया.
दरअसल याचिकाकर्ता का विवाह वर्ष 2017 में हुआ था. 2018 में बेटी का जन्म हुआ. लेकिन वैवाहिक विवाद के कारण पत्नी अपने मायके छिंदवाडा, मध्य प्रदेश रहने लगी, जहां 2020 में उसकी मृत्यु हो गई. तब से बच्ची अपने नाना-नानी और मामा के पास रह रही है. पिता ने आरोप लगाया कि, उसे बच्ची से मिलने नहीं दिया जा रहा और उसकी कस्टडी ‘अवैध’ है. कोर्ट ने गौर किया कि, पत्नी की मौत के बाद पिता ने तीन साल तक बच्ची की कस्टडी के लिए कोई कानूनी कदम नहीं उठाया. जब जनवरी 2022 में स्थानीय अदालत ने पिता को बच्ची के लिए ‘भरण-पोषण’ देने का आदेश दिया, उसके बाद ही उसने कस्टडी के लिए हाईकोर्ट का रुख किया.

* पिता को मिलने का अधिकार
कोर्ट ने कस्टडी नहीं दी, लेकिन पिता-पुत्री के संबंधों को पहचानते हुए मिलने का अधिकार प्रदान किया. अदालत ने निर्देश दिया कि, नाना-नानी को हर 15 दिन में एक बार छिंदवाडा के सौंसर स्थित तहसील कानूनी सेवा प्राधिकरण के कार्यालय में सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच पिता को बच्ची से मिलने देना होगा. इस मुलाकात निगरानी संबंधित सचिव द्वारा की जाएगी, ताकि बच्ची अपने पिता को पहचान सके.

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