क्या पालकमंत्री के आदेशों को मेलघाट के अधिकारी मानेंगे?

सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी महीनों बाद भी नहीं मिली, नागरिकों में बढ़ रहा आक्रोश

* चिखलदरा नप और सार्वजनिक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल, जवाबदेही को लेकर प्रशासन कटघरे में
चिखलदरा /दि.19- एक ओर राज्य सरकार पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर मेलघाट क्षेत्र में कई सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली इन दावों पर प्रश्नचिह्न खड़े करती दिखाई दे रही है. हाल ही में अमरावती में आयोजित समीक्षा बैठक में जिले के पालकमंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने अधिकारियों को जनता और मीडिया के प्रति जवाबदेह रहने, शिकायतों का समयबद्ध निवारण करने तथा सूचना उपलब्ध कराने के स्पष्ट निर्देश दिए थे. लेकिन मेलघाट क्षेत्र की स्थिति कुछ और ही कहानी बयां कर रही है.
क्षेत्र के नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारियां महीनों बीत जाने के बाद भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं. विशेष रूप से चिखलदरा नगर परिषद तथा सार्वजनिक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) की कार्यशैली को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं. नागरिकों का कहना है कि सूचना उपलब्ध कराने में हो रही देरी न केवल कानून की भावना के विपरीत है, बल्कि प्रशासन की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करती है.
* करोड़ों की योजनाएं, फिर भी विकास पर सवाल
मेलघाट देश के सबसे संवेदनशील आदिवासी क्षेत्रों में गिना जाता है. यहां के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और मूलभूत सुविधाओं के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा समय-समय पर करोड़ों रुपये का विशेष अनुदान उपलब्ध कराया जाता रहा है. इसके बावजूद क्षेत्र के अनेक गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कई दशकों में कुछ क्षेत्रों में बदलाव जरूर दिखाई दिया है, लेकिन जिस स्तर का विकास होना चाहिए था, वह आज भी नहीं हो पाया है. इसके विपरीत विकास योजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़े कुछ अधिकारियों और मध्यस्थों की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है, जिससे लोगों के मन में शंकाएं पैदा हो रही हैं.
* जवाबदेही का आदेश, लेकिन अमल कहां?
पालकमंत्री बावनकुले ने हाल ही में स्पष्ट किया था कि कोई भी अधिकारी जनता या मीडिया के प्रश्नों की अनदेखी नहीं करेगा तथा हर विभाग को अपनी जवाबदेही तय करनी होगी. लेकिन मेलघाट में सूचना अधिकार के आवेदनों पर कार्रवाई की धीमी गति यह सवाल खड़ा कर रही है कि क्या यह आदेश वास्तव में जमीनी स्तर तक पहुंच पाए हैं?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि साधारण सूचना उपलब्ध कराने में महीनों का समय लग रहा है, तो आम लोगों की अन्य समस्याओं के समाधान की स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.
* जनता और मीडिया की निगाहें प्रशासन पर
सूचना के अधिकार के तहत जानकारी न मिलने के मामलों को लेकर अब नागरिकों और पत्रकारों में भी नाराजगी बढ़ रही है. लोगों का कहना है कि यदि शासन पारदर्शिता और सुशासन की बात करता है, तो सबसे पहले सरकारी विभागों को कानून के अनुसार समय पर जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए.
अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पालकमंत्री द्वारा अधिकारियों को दिए गए निर्देशों का मेलघाट में कितना प्रभाव दिखाई देता है. क्या संबंधित विभागों से जवाबदेही तय की जाएगी? क्या सूचना अधिकार के लंबित मामलों का निपटारा होगा? या फिर आदेश केवल बैठकों और कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे?
* जनता पूछ रही है जवाब
मेलघाट के नागरिकों का कहना है कि विकास योजनाओं पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपये का हिसाब और उनसे जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक होना चाहिए. यदि सूचना मांगने के बाद भी लोगों को जानकारी नहीं मिलती, तो पारदर्शी प्रशासन का दावा खोखला प्रतीत होता है.
ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शासन और जिला प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं तथा सूचना अधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए क्या कदम उठाते हैं. फिलहाल मेलघाट की जनता एक ही सवाल पूछ रही है- क्या पालकमंत्री के आदेश यहां भी लागू होंगे, या फिर अधिकारी अपनी मनमानी ही चलाते रहेंगे.

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