उच्च शिक्षित पति बेरोजगारी का बहाना बनाकर गुजारा भत्ता देने से नहीं बच सकता
नागपुर हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

* पारिवारिक विवाद के कारण पत्नी विभक्त
नागपुर /दि.6- मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि, उच्च शिक्षित और शारीरिक रुप से सक्षम पति केवल बेरोजगारी का दावा कर पत्नी और बच्चे को गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता. अदालत में पति की याचिका खारिज करते हुए पारिवारिक न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा. यह फैसला न्यायमूर्ति महेंद्र नेरलीकर ने सुनाया.
मामले में पति नागपुर निवासी है और वह चार्टर्ड अकाउंटेंसी (सीए) तथा एमबीए की डिग्रीधारी है. पारिवारिक विवाद के चलते उसकी पत्नी अपनी चार वर्षीय बेटी के साथ अलग रह रही है. पारिवारिक न्यायालय ने पत्नी और बेटी के भरण-पोषण के लिए कुल 30 हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था. पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि उसकी अच्छी नौकरी चली गई है और वह फिलहाल बेरोजगार है, इसलिए इतनी राशि देना संभव नहीं है.
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने कहा कि पति शारीरिक रूप से स्वस्थ और उच्च शिक्षित है. ऐसे में यह मानना कठिन है कि बाजार में सीए जैसी योग्यता की मांग होने के बावजूद वह रोजगार प्राप्त नहीं कर सकता. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि पति ने अपनी वास्तविक आय और बैंक से लिए गए बड़े व्यक्तिगत कर्ज की जानकारी छिपाई है. कोर्ट ने कहा कि कोई भी बैंक किसी पूरी तरह बेरोजगार व्यक्ति को लाखों रुपये का पर्सनल लोन नहीं देता. इसलिए बेरोजगारी का दावा विश्वसनीय नहीं माना जा सकता. इन्हीं तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी और पत्नी तथा बेटी को 30 हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश बरकरार रखा.