शीर्ष पदों पर प्रतिनिधित्व से पूरा समाज प्रगतिशील नहीं माना जा सकता

मराठा आरक्षण मामले में हाईकोर्ट में राज्य सरकार का पक्ष

मुंबई /दि.14- मराठा आरक्षण से जुड़ी याचिकाओं पर मुंबई हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार ने अहम दलील पेश की. सरकार ने कहा कि राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होने मात्र से पूरा समाज प्रगतिशील नहीं माना जा सकता. इसी तरह, केवल इस आधार पर कि मराठा समाज से मुख्यमंत्री, सांसद या विधायक बने हैं, यह नहीं कहा जा सकता कि पूरा मराठा समाज सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ चुका है.
हाईकोर्ट की पूर्णपीठ के समक्ष महाधिवक्ता मिलिंद साठे ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि किसी भी समाज को पिछड़ा घोषित करने के लिए उसके सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक हालात, सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व तथा उपलब्ध अवसरों का समग्र मूल्यांकन किया जाता है. सरकार ने यह भी कहा कि किसी समुदाय को पिछड़ा वर्ग में शामिल करना और आरक्षण देना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है. याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया कि महाराष्ट्र गठन के बाद लंबे समय तक अग्रणी माने जाने वाले मराठा समाज को 2008 के बाद अचानक पिछड़ा कैसे माना गया. इस पर सरकार ने जवाब दिया कि पहले के पिछड़ा वर्ग आयोगों ने मराठा समाज का वैज्ञानिक सर्वेक्षण नहीं किया था. बाद में न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सुनील शुक्रे की अध्यक्षता वाले आयोग ने 1.58 करोड़ से अधिक परिवारों का विस्तृत सर्वेक्षण कर सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति का अध्ययन किया, जिसके आधार पर मराठा समाज को आरक्षण देने का निर्णय लिया गया. सरकार ने यह भी अदालत के समक्ष रखा कि हैदराबाद और मध्य प्रदेश में मराठा समाज को पहले से आरक्षण का लाभ मिलता रहा है तथा विदर्भ और मराठवाड़ा के मराठा समाज के साथ राज्य गठन के बाद आरक्षण के मामले में अन्याय हुआ था. मामले की सुनवाई मुंबई हाई कोर्ट की विशेष पूर्णपीठ के समक्ष जारी है.

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