उस रात उन मासूम बच्चों ने क्या कुछ सहा होगा?
डफरीन अग्निकांड के बाद उठ रहे हैं दर्दनाक सवाल, जवाब कल्पना से परे

* एसएनसीयू में तीन नवजातों की मौत के बाद पूरे शहर में आक्रोश
* परिजनों की आंखों में आंसू व आक्रोश, व्यवस्था पर सवाल के साथ ही इंसाफ की गुहार
अमरावती /दि.26– सोमवार तड़के डफरीन अस्पताल के विशेष नवजात शिशु देखभाल कक्ष (एसएनसीयू) में हुए भीषण अग्निकांड को लेकर अब केवल तकनीकी जांच ही नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से जुड़े कई सवाल भी सामने आ रहे हैं. जिस वार्ड में जीवन के लिए संघर्ष कर रहे नवजातों को विशेष देखभाल दी जाती है, वहीं तीन मासूमों की दर्दनाक मौत ने पूरे शहर को झकझोर दिया है. घटना के बाद हर किसी के मन में एक ही सवाल है कि, आखिर उस रात उन अबोध बच्चों ने क्या कुछ नहीं सहा होगा और वे किस तरह की तकलीफों से होकर गुजरे होंगे.
वे बच्चे, जो बोल नहीं सकते थे, अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं कर सकते थे, जो खुद को बचाने के लिए एक कदम भी नहीं बढ़ा सकते थे, वे उस भयावह क्षण में किस दर्द और असहायता से गुजरे होंगे, इसकी कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं. आज हर नागरिक जानना चाहता है कि उस रात वास्तव में क्या हुआ था. किस स्तर पर चूक हुई. क्या यह हादसा रोका जा सकता था और सबसे महत्वपूर्ण-क्या भविष्य में किसी अन्य परिवार को ऐसी त्रासदी का सामना नहीं करना पड़ेगा. तीन नवजातों की मौत के बाद अब यह केवल एक दुर्घटना की जांच का मामला नहीं रह गया है, बल्कि उन मासूम जिंदगियों के प्रति जवाबदेही तय करने की परीक्षा बन गया है, जो दुनिया को ठीक से देख भी नहीं पाए और हमेशा के लिए इस दुनिया से विदा हो गए.
* तापमान बढ़ता रहा, किसी को भनक क्यों नहीं लगी?
विशेषज्ञों के अनुसार वेंटिलेटर और अन्य जीवनरक्षक उपकरण अत्यंत संवेदनशील होते हैं. इनके तापमान, दबाव और तकनीकी स्थिति की लगातार निगरानी आवश्यक होती है. प्रारंभिक चर्चाओं में यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि किसी तकनीकी खराबी के कारण उपकरण में असामान्य स्थिति उत्पन्न हुई, जिसके बाद विस्फोट और आग लगने की घटना हुई. हालांकि हादसे के वास्तविक कारणों की आधिकारिक पुष्टि जांच रिपोर्ट के बाद ही होगी, लेकिन नागरिकों का सवाल है कि यदि किसी उपकरण में कोई तकनीकी समस्या विकसित हो रही थी, तो उसकी पहचान समय रहते क्यों नहीं हो सकी. एसएनसीयू जैसे अति संवेदनशील विभाग में ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारियों, तकनीकी स्टाफ और निगरानी व्यवस्था की भूमिका को लेकर भी प्रश्न उठ रहे हैं.
* विस्फोट तक क्या कर रहा था ड्यूटी स्टाफ?
घटना के बाद शहर में सबसे अधिक चर्चा इसी बात को लेकर है कि विस्फोट होने से पहले और आग फैलने तक वार्ड में मौजूद ड्यूटी स्टाफ की निगरानी व्यवस्था कैसी थी. नवजात शिशुओं के लिए बनाए गए इस विशेष विभाग में हर क्षण की निगरानी अपेक्षित होती है. ऐसे में यदि कोई उपकरण असामान्य रूप से गर्म हो रहा था या उसमें तकनीकी गड़बड़ी के संकेत मिल रहे थे, तो क्या उन्हें समय रहते पहचाना गया था. इन सवालों के जवाब अब जांच एजेंसियों को तलाशने होंगे.
* शवगृह के बाहर इंतजार और टूटते परिवार
हादसे के बाद सबसे मार्मिक दृश्य इरविन अस्पताल के शवगृह के बाहर देखने को मिला, जहां मृत नवजातों के परिजन घंटों तक अंतिम औपचारिकताओं का इंतजार करते रहे. एक ओर प्रशासनिक जांच की चर्चा थी, दूसरी ओर उन परिवारों का संसार बिखर चुका था, जिन्होंने कुछ ही दिन पहले अपने घर में नई जिंदगी का स्वागत किया था.
* बेटे को बचाने भेजा था, खोकर लौटे
हादसे में जान गंवाने वाले नवजातों में एक बच्चा प्रफुल्ल और गायत्री चोपड़े दंपति का था. परिवार के अनुसार प्रसूति के बाद बच्चे को बेहतर उपचार के लिए अमरावती भेजा गया था. लेकिन इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचे माता-पिता को अंततः अपने बच्चे का शव मिला. सबसे दर्दनाक तथ्य यह है कि बच्चे की मां स्वयं उपचाराधीन है और उसे अभी तक अपने नवजात को खो देने की पूरी जानकारी नहीं दी गई है.
* बारिश के बीच हुआ मासूम का अंतिम संस्कार
हादसे में जान गंवाने वाले अन्य नवजातों के परिवारों ने भी भारी मन से अंतिम संस्कार किया. किसी का बच्चा जन्म के कुछ ही दिनों बाद दुनिया छोड़ गया, तो किसी परिवार के सपने अस्पताल के एक वार्ड में हमेशा के लिए बुझ गए. एक परिवार को तो बारिश के बीच अपने नवजात का अंतिम संस्कार करना पड़ा. परिजनों का कहना था कि जिस बच्चे को गोद में खिलाने के सपने देखे थे, उसे कंधों पर विदा करना पड़ेगा, ऐसा कभी नहीं सोचा था.





