इसरो से वैज्ञानिकों के इस्तीफों का मुद्दा संसदीय स्थायी समिति में गूंजा
सांसद बलवंत वानखड़े ने उठाए गंभीर सवाल

* प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को संस्थान में बनाए रखने को बताया जरूरी
अमरावती / बेंगलुरु/दि.26- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) से बड़ी संख्या में वैज्ञानिकों और तकनीकी कर्मचारियों के इस्तीफे तथा स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का मुद्दा अब संसदीय स्तर पर भी उठने लगा है. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विषयक विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समिति के अध्ययन दौरे के दौरान बेंगलुरु स्थित इसरो मुख्यालय ‘अंतरिक्ष भवन’ में आयोजित महत्वपूर्ण बैठक में अमरावती के सांसद बलवंत वानखड़े ने इस विषय पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए. बैठक में गगनयान मिशन, आदित्य-एल1 तथा इसरो की आगामी महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की गई. इस दौरान इसरो, मानव अंतरिक्ष उड़ान केंद्र (एचएसएफसी) तथा अंतरिक्ष विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ विस्तृत चर्चा हुई.
बैठक के दौरान सांसद वानखड़े ने मीडिया रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले कुछ महीनों में इसरो से 100 से अधिक तथा कुछ रिपोर्टों के अनुसार लगभग 120 वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों ने इस्तीफा दिया है या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली है. उन्होंने पूछा कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में विशेषज्ञों के संस्थान छोड़ने के पीछे क्या कारण हैं और इसका देश की महत्वपूर्ण अंतरिक्ष परियोजनाओं पर क्या प्रभाव पड़ सकता है. उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों से जानना चाहा कि वास्तविक रूप से कितने वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मचारी इसरो छोड़ चुके हैं, उनके जाने के प्रमुख कारण क्या हैं तथा इस स्थिति से निपटने के लिए केंद्र सरकार और अंतरिक्ष विभाग ने कौन-कौन से कदम उठाए हैं.
सांसद वानखड़े ने कहा कि मीडिया रिपोर्टों के अनुसार संस्था छोड़ने वाले कई वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ गगनयान, स्पाडेक्स, चंद्रयान-3 और एलवीएम-3 जैसी देश की रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर कार्य कर चुके हैं. ऐसे में यह केवल नौकरी बदलने का मामला नहीं है, बल्कि संस्थागत अनुभव, तकनीकी ज्ञान और भविष्य की अंतरिक्ष परियोजनाओं की निरंतरता से भी जुड़ा हुआ विषय है. उन्होंने कहा कि यदि अनुभवी वैज्ञानिक बड़ी संख्या में संस्थान छोड़ रहे हैं तो इसके दीर्घकालिक प्रभावों का गंभीरता से आकलन किया जाना चाहिए.
सांसद वानखड़े ने बैठक में यह भी मुद्दा उठाया कि वर्ष 2020 के बाद भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए अधिक खुला बनाया गया है. इसके परिणामस्वरूप देश में अंतरिक्ष तकनीक से जुड़े स्टार्टअप्स और निजी कंपनियों की संख्या तेजी से बढ़ी है. ऐसे में कुशल वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए इसरो तथा निजी क्षेत्र के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ना स्वाभाविक है. उन्होंने कहा कि केवल वेतन ही नहीं, बल्कि अनुसंधान की स्वतंत्रता, करियर में उन्नति के अवसर, निर्णय प्रक्रिया की गति, शोध के लिए उपलब्ध वातावरण और युवा वैज्ञानिकों को मिलने वाली जिम्मेदारियां भी प्रतिभाओं को संस्थान में बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण कारक हैं.
सांसद वानखड़े ने कहा कि एक ओर भारत गगनयान जैसे मानव अंतरिक्ष मिशन सहित कई महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रमों की तैयारी कर रहा है, वहीं दूसरी ओर अनुभवी वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को संस्थान में बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है. यदि मानव संसाधन का पलायन बढ़ रहा है तो इसके कारणों का गहन अध्ययन कर दीर्घकालिक समाधान तैयार किया जाना चाहिए. इसके साथ ही सांसद बलवंत वानखड़े ने कहा कि, इसरो केवल एक शोध संस्था नहीं, बल्कि भारत की वैज्ञानिक क्षमता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है. देश की महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष परियोजनाओं की सफलता के लिए अनुभवी वैज्ञानिकों के साथ-साथ नई पीढ़ी की प्रतिभाओं को भी संस्थान में बनाए रखना आवश्यक है. मानव संसाधन के पलायन के कारणों का गंभीर अध्ययन कर आवश्यक सुधार और दीर्घकालिक नीतिगत उपाय किए जाने चाहिए.





