अमरावती में धूमधाम से मना पोला पर्व, सजे-धजे ‘सर्जा-राजा’ ने लूटी वाहवाही
किसानों ने बैलों को सजाकर की पूजा-अर्चना, बैलों की घटती संख्या के बावजूद कायम है पारंपरिक उत्साह

अमरावती/दि.10– किसान और उसके सखा बैल के आत्मीय रिश्ते का प्रतीक पोला पर्व अमरावती शहर सहित पूरे जिले में आज गुरुवार 10 सितंबर को बडी धूमधाम और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया. पोला पर्व निमित्त सभी किसानों ने अपने बैलों को स्नान कराकर आकर्षक ढंग से सजाया. उनके सींगों पर रंग-बिरंगी सजावट की गई और गले में घंटियां, हार तथा अन्य श्रृंगार सामग्री पहनाकर विधिवत पूजा-अर्चना की गई. ग्रामीण क्षेत्रों के साथ शहर में भी पोला को लेकर उत्साह का माहौल रहा.
दिनभर सजे-धजे बैलों की शोभा देखते ही बन रही थी. किसानों ने अपने ‘सर्जा-राजा’ को सजाकर घर के आंगन में पूजा की और सुख-समृद्धि की कामना की. वहीं कई स्थानों पर शाम के वक्त पारंपरिक तरीके से बैलों को एकत्र कर पोला उत्सव मनाया गया. बच्चों और महिलाओं में भी पर्व को लेकर खासा उत्साह दिखाई दिया. जिसके तहत अमरावती शहर में श्री शिवाजी कृषी महाविद्यालय के प्रांगण तथा नेहरू मैदान परिसर में पोला उत्सव का आयोजन हुआ. जबकि तहसील एवं ग्रामीण क्षेत्रों में जगह-जगह पर बैल पोला की धूम दिखाई दी.
* किसान और बैल के रिश्ते का पर्व
बता देंं कि, पोला केवल बैलों की पूजा का पर्व नहीं, बल्कि किसान और पशुधन के बीच सदियों पुराने रिश्ते का उत्सव है. खेती के काम में सालभर किसान का साथ देने वाले बैलों के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए इस दिन उन्हें आराम दिया जाता है और विशेष रूप से उनकी पूजा की जाती है. पहले नांगरणी, बखरनी, बुआई से लेकर कृषि उपज की ढुलाई तक खेती के लगभग सभी काम बैलों के माध्यम से होते थे. इसलिए ग्रामीण जीवन में पोला का विशेष महत्व रहा है. आधुनिक कृषि यंत्रों के बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद किसानों की अपने ‘सर्जा-राजा’ के प्रति आस्था और भावनात्मक जुड़ाव आज भी कायम है.
* पांच वर्षों में 1,928 बैल हुए कम
पोला के उत्साह के बीच जिले में घटती बैलों की संख्या बदलती कृषि संस्कृति की ओर भी ध्यान खींचती है. 20 वीं पशुगणना में जिले में 41,428 बैल दर्ज किए गए थे, जबकि 21 वीं पशुगणना में यह संख्या घटकर करीब 39,500 रह गई है. यानी पांच वर्षों में जिले में लगभग 1,928 बैलों की कमी हुई है. खेती में ट्रैक्टर, पावर टिलर और आधुनिक कृषि उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल को इसका प्रमुख कारण माना जा रहा है. इसके अलावा चारे की बढ़ती कीमत और बैल जोड़ी के रखरखाव का खर्च छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए लगातार चुनौती बन रहा है. ऐसे में कई किसान जरूरत के समय ट्रैक्टर किराए पर लेकर कृषि कार्य पूरा करने लगे हैं.
* छोटे खेतों में आज भी बैल जोड़ी उपयोगी
यंत्रीकरण के बावजूद जिले के कई ग्रामीण और कोरडवाहू क्षेत्रों में बैल जोड़ी की उपयोगिता बनी हुई है. छोटे भूखंडों, बागायती खेती और ऐसे दुर्गम क्षेत्रों में जहां बड़े कृषि यंत्र आसानी से नहीं पहुंच पाते, वहां बैल आज भी किसानों के लिए उपयोगी साबित होते हैं. इसी वजह से बैलों की संख्या में कमी आने के बावजूद ग्रामीण कृषि संस्कृति में उनका महत्व पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है.
* परंपरा से जुड़ा रहा उत्सव
पोला पर्व के अवसर पर किसानों ने अपने बैलों को रंग-बिरंगे कपड़ों, गले की घंटियों और आकर्षक आभूषणों से सजाया. सुबह से ही बैलों को नहलाने और सजाने का सिलसिला शुरू हो गया था. इसके बाद विधिवत पूजा-अर्चना कर उन्हें विशेष आहार खिलाया गया. अमरावती शहर और जिले के विभिन्न हिस्सों में दिनभर पोला की चहल-पहल रही. बदलते समय और खेती में बढ़ते यंत्रीकरण के बावजूद पोला ने एक बार फिर यह साबित किया कि किसान के जीवन में ‘सर्जा-राजा’ के प्रति सम्मान और प्रेम आज भी उतना ही गहरा है.





