उड़ान 2026 की, व्यवस्था कागजों के जमाने की!
मुंबई-अमरावती हवाई सेवा में डिजिटल सिस्टम के दावे की खुली पोल

* बोर्डिंग पास के लिए कागजों में नाम खोजने से लेकर बारिश में छाता न मिलने तक यात्रियों की शिकायतें
अमरावती /दि.15- अमरावती के बेलोरा एयरपोर्ट से मुंबई के लिए उड़ान शुरू होना निश्चित रूप से विदर्भ के इस शहर के लिए बड़ी उपलब्धि है. वर्षों से हवाई कनेक्टिविटी का इंतजार कर रहे अमरावतीकरों को आखिर विमान मिला, लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या सिर्फ विमान मिल जाने को ही हवाई सेवा कहा जा सकता है? मुंबई-अमरावती उड़ान संचालित करने वाली अलायंस एयर की कथित यात्री व्यवस्था को लेकर यात्रियों में नाराजगी बढ़ रही है. यात्रियों का कहना है कि एक ओर देश डिजिटल इंडिया, ऑनलाइन टिकट और मोबाइल बोर्डिंग पास के दौर में पहुंच चुका है, वहीं दूसरी ओर इस उड़ान की कुछ प्रक्रियाएं ऐसी दिखाई देती हैं, मानो व्यवस्था अब भी फाइलों और कागजों के भरोसे चल रही हो. सबसे बड़ा सवाल यही है, अमरावती से मुंबई उड़ान 2026 में चल रही है या यात्री व्यवस्था अभी भी पुराने जमाने में अटकी हुई है?
* बोर्डिंग पास चाहिए तो शुरू होता है ‘कागजी खोज अभियान’
मुंबई एयरपोर्ट पर बोर्डिंग प्रक्रिया को लेकर यात्रियों की शिकायत सबसे गंभीर है. यात्रियों के अनुसार, बोर्डिंग पास जारी करने के लिए आधुनिक डिजिटल सिस्टम की बजाय कागजों के पुलिंदों में यात्री का नाम तलाशा जाता है. नाम मिल गया तो आगे की प्रक्रिया शुरू, नाम खोजने में समय लगा तो यात्री इंतजार करता रहे. यात्रियों का दावा है कि इस पूरी प्रक्रिया में एक से डेढ़ घंटे तक का समय लग जाता है. सवाल यह है कि जब टिकट ऑनलाइन बुक हो सकता है, यात्रा का पूरा रिकॉर्ड डिजिटल माध्यम से उपलब्ध हो सकता है और मोबाइल फोन में बोर्डिंग पास दिखाया जा सकता है, तब एयरपोर्ट पर यात्री का नाम कागजों में तलाशने की नौबत क्यों आनी चाहिए?
* एक कर्मचारी के भरोसे पूरा ‘वन-वुमन शो’!
यात्रियों के मुताबिक मुंबई एयरपोर्ट पर एक ही कर्मचारी बोर्डिंग पास जारी करने से लेकर यात्रियों को विमान में उनकी सीट तक पहुंचाने और सीट बताने तक की जिम्मेदारी संभालती दिखाई देती है. यानी एक कर्मचारी के सामने कई जिम्मेदारियां और यात्रियों की पूरी कतार उसके भरोसे. बोर्डिंग पास बनाइए, यात्रियों को संभालिए, विमान में भेजिए और फिर सीट तक पहुंचाइए, अगर पूरी यात्री व्यवस्था ही एक कर्मचारी के कंधे पर टिकी है तो बाकी व्यवस्था आखिर कहां है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यात्रियों से हवाई सेवा के लिए पूरा किराया लिया जाता है. उन्हें सिर्फ विमान में जगह नहीं, बल्कि व्यवस्थित और सम्मानजनक यात्री अनुभव मिलना भी अपेक्षित है.
* बारिश में छाता भी यात्री खुद लाए!
हवाई यात्रा को सुविधा और आराम का प्रतीक माना जाता है. लेकिन यात्रियों की शिकायतों के अनुसार मुंबई में बारिश के दौरान विमान तक पहुंचने के दौरान भी पर्याप्त यात्री सुविधा उपलब्ध नहीं रहती. बस से उतरने के बाद बारिश हो तो यात्री खुद ही उससे बचने का इंतजाम करे और भीगते हुए विमान तक पहुंचे. यानी टिकट एयरलाइन का, विमान एयरलाइन का, यात्रा एयरलाइन की, लेकिन बारिश से बचने का इंतजाम यात्री का! इसे यात्री सुविधा कहा जाए या मानसून की अतिरिक्त परीक्षा, यह सवाल अब यात्रियों के बीच चर्चा का विषय है.
* विमान के भीतर ‘विंटेज’ अनुभव!
यात्रियों की नाराजगी केवल ग्राउंड हैंडलिंग तक सीमित नहीं है. विमान के भीतर की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. यात्रियों के मुताबिक सीटों की हालत और विमान का पुराना इंटीरियर आधुनिक हवाई यात्रा की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता. सीटों की खराब स्थिति, सीमित जगह और पैर फैलाने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं होने की शिकायतें सामने आ रही हैं. हवाई टिकट की कीमत चुकाने के बाद यात्री जब विमान में बैठता है तो स्वाभाविक रूप से वह आराम और सुविधा की उम्मीद करता है. लेकिन यदि सीट पर बैठते ही पहला सवाल यह हो कि ‘इतनी कम जगह में सफर कैसे पूरा होगा?’, तो सेवा की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
* ‘अलायंस एयर’ या ‘डिब्बा एयरलाइंस’?
यात्रियों की नाराजगी अब व्यंग्य का रूप लेने लगी है. कुछ यात्रियों की शिकायतों और चर्चाओं में एयरलाइन की व्यवस्था को लेकर ‘डिब्बा एयरलाइंस’ जैसी टिप्पणी भी सामने आ रही है. यह टिप्पणी केवल विमान की हालत पर कटाक्ष नहीं है, बल्कि उस पूरे अनुभव पर सवाल है जो यात्री टिकट खरीदने के बाद झेलता है. तो फिर सवाल उठता है, यात्री ने आखिर खरीदा क्या है, हवाई यात्रा या सिर्फ हवाई टिकट?
* शिवशाही बस से तुलना क्यों होने लगी?
विडंबना यह है कि जिस सेवा को सड़क परिवहन की तुलना में तेज, आधुनिक और सुविधाजनक होना चाहिए, उसकी तुलना अब कुछ यात्री एसटी की शिवशाही बस सेवा से करने लगे हैं. बेलोरा एयरपोर्ट से मुंबई की उड़ान अमरावती के लिए कनेक्टिविटी का महत्वपूर्ण माध्यम है. इसलिए इसकी कमियां केवल किसी एक यात्री की व्यक्तिगत असुविधा नहीं मानी जा सकतीं. यह सेवा शहर और पूरे क्षेत्र की हवाई कनेक्टिविटी की विश्वसनीयता से जुड़ी है.
* 13 सितंबर की रद्द उड़ान ने बढ़ाई नाराजगी
13 सितंबर को कम दृश्यता के कारण अमरावती की उड़ान रद्द होने की घटना ने यात्रियों की नाराजगी और बढ़ा दी. मौसम संबंधी परिस्थितियों में उड़ान रद्द होना विमानन व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यात्रियों का कहना है कि असली समस्या केवल उड़ान रद्द होने की नहीं है. उनके अनुसार, उड़ान रद्द होना एक घटना है, जबकि अव्यवस्थित यात्री सेवा रोजमर्रा की समस्या बन सकती है. यात्रियों को उड़ान के समय की जानकारी, व्यवस्थित बोर्डिंग, डिजिटल सुविधा, पर्याप्त ग्राउंड स्टाफ, मौसम के दौरान बुनियादी सुविधाएं और विमान के भीतर साफ-सुथरा व आरामदायक वातावरण चाहिए.
* अमरावती को ‘उड़ान’ चाहिए, दिखावा नहीं
अमरावतीकरों ने हवाई सेवा के लिए लंबा इंतजार किया है. बेलोरा एयरपोर्ट शुरू होने के बाद शहर को मुंबई से जोड़ने वाली उड़ान उम्मीद की नई किरण बनी है. लेकिन इस उपलब्धि को टिकाऊ बनाने के लिए सिर्फ विमान उड़ाना पर्याप्त नहीं होगा. अमरावती को ऐसी हवाई सेवा चाहिए जिसमें टिकट डिजिटल हो तो बोर्डिंग भी डिजिटल हो, कर्मचारी पर्याप्त हों, यात्री सुविधा वास्तविक हो और विमान देखकर यात्री को अपनी यात्रा पर पछतावा न हो. एयरलाइन के लिए यह समय शिकायतों को हल्के में लेने का नहीं, बल्कि पूरी यात्री व्यवस्था की समीक्षा करने का है. क्योंकि अमरावती के यात्री अब सिर्फ यह नहीं पूछ रहे कि मुंबई की उड़ान है या नहीं? वे पूछ रहे हैं कि, ‘उड़ान तो मिल गई साहब, अब हवाई सेवा भी मिलेगी या नहीं?’





