अब शायद मनमानी पर उतर आया है एफडीए!
सार्वजनिक हितों व सुविधाओं की अनदेखी कर की जा रही कार्रवाई

* अस्पतालों की मेस व कैंटीन को बनाया जा रहा निशाना
* पीडीएमसी के बाद संत अच्युत महाराज हार्ट हॉस्पीटल की मेस पर कार्रवाई
* इससे पहले विद्यापीठ की कैंटीन पर भी लगाया जा चुका ताला
* तीनों स्थानों पर बाहरगांव से मरिजों व उनके परिजनों तथा विद्यार्थियों का आना-जाना
* मेस व कैंटीन बंद रहने से संबंधितों को हो रही जबरदस्त परेशानी
* सीधे कार्रवाई कर सील करने की बजाए नोटीस देकर समझाईश व मोहलत देना होता ज्यादा बेहतर
* अखबारों में अपने नाम व फोटो सहित खबर छपवाने की ललक के चलते बढ रही मनमानी
* अब भी कई उपाहार गृहों, होटलों, बीयर बार व परमिट रूम के किचन एफडीए की निगाहों से दूर
* कुछ बडे उपाहार गृहों व होटलों पर एफडीए की ‘विशेष कृपादृष्टि’ रहने की भी खबर
अमरावती/दि.15- जब से तेज तर्रार प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर पहचान हासिल रखनेवाले तुकाराम मुंढे ने अन्न व औषधी प्रशासन यानी एफडीए के आयुक्त का पदभार संभाला है. तब से राज्य के अन्य जिलों की तरह अमरावती जिले में भी एफडीए विभाग के सभी अधिकारी अपने पांवों में ‘चकरी’ बांधकर काम पर लग गए है. हैरत और कमाल की बात यह भी है कि, एफडीए के इन्ही अधिकारियों द्वारा अभी कुछ माह पहले तक अपने पास मनुष्यबल की कमी रहने का रोना रोया जाता था और अब अचानक ही उसी मनुष्यबल के सहारे एक के बाद एक धडाधड कार्रवाईयां की जा रही है. ताकि अपने मुखिया की ‘गुडबुक’ में अपना नाम दर्ज कराया जा सके. लेकिन ऐसा करने के चक्कर में एफडीए के स्थानीय अधिकारियों द्वारा कई न कई अनियंत्रित होकर कुछ हद तक मनमानी भी की जा रही है. जिसका ताजा उदाहरण एफडीए के अधिकारियों द्वारा हाल ही में संगाबा अमरावती विद्यापीठ, पीडीएमसी अस्पताल तथा संत अच्युत महाराज हार्ट हॉस्पीटल परिसर स्थित कैंटीन व मेस पर की गई कार्रवाईयों को कहा जा सकता है. इन कार्रवाईयों के तहत इन तीनों स्थानों की कैंटीन व मेस को नियमों का हवाला देते हुए पूरी तरह से सील यानी बंद ही करा दिया गया. जबकि सीधे ऐसी कडी कार्रवाई करने की बजाए तीनों अस्पतालों के प्रबंधन तथा मेस व कैंटीन के संचालकों को नोटीस जारी कर वहां रहनेवाले त्रृटियों को दूर करने तथा साफ सफाई से संबंधित स्थिति में सुधार करने को लेकर थोडी मोहलत भी दी जा सकती थी.
ध्यान दिला दें कि, जहां एक ओर संत गाडगेबाबा अमरावती विद्यापीठ में अमरावती संभाग के पांचों जिलों के तहसील व ग्रामीण क्षेत्रों से छात्र-छात्राओं का आना-जाना लगा रहता है. वहीं दूसरी ओर डॉ. पंजाबराव देशमुख स्मृति मेडिकल कॉलेज व अस्पताल यानी पीडीएमसी अस्पताल तथा शहर से करीब 10 किमी की दूरी पर मार्डी रोड स्थित संत अच्युत महाराज हार्ट हॉस्पीटल में अमरावती शहर व जिले सहित अन्य जिलों के मरीजों व उनके परिजनों का आना-जाना लगा रहता है. ऐसे में कुल मिलाकर इन तीनों ही स्थानों पर आने वाले लोगों के लिए संबंधित परिसर में चाय-पानी, नाश्ते व भोजन के लिए मेस व कैंटीन की व्यवस्था का रहना बेहद आवश्यक है. विशेषकर विद्यापीठ व संत अच्युत महाराज हार्ट हॉस्पीटल शहर से काफी दूरी पर है और वहां आसपास खाने-पीने के इंतजाम हेतु अन्य कोई व्यवस्था नहीं है. लगभग यहीं स्थिती पीडीएमसी अस्पताल में आनेवाले मरीजों व उनके परिजनों के साथ भी होती है, क्योंकि पीडीएमसी अस्पताल भी मुख्य शहर से थोडी दूर पंचवटी चौक से आगे नागपुर रोड पर स्थित है और अस्पताल का परिसर इतना अधिक विस्तीर्ण है कि, वहां से केवल खाने-पीने की चिजों को इंतजाम करने हेतु पंचवटी चौक की ओर आने तक मरीजों के परिजनों को करीबन एक-डेढ किमी की दूरी तय करनी पडती है. ऐसे में दोेनों अस्पतालों में बाहर से आनेवाले मरीजों व उनके परिजनों तथा विद्यापीठ में बाहर से आनेवाले छात्र-छात्राओं के लिए वहां स्थित मेस व कैंटीन को ही खाने-पीने के इंतजाम का सबसे बडा सहारा कहा जा सकता है.
बहुत हद तक संभव है कि, अधिक लाभ कमाने की स्वभावगत लालसा के चलते तीनों स्थानों के कैंटीन संचालकों द्वारा खाने-पीने की वस्तुओं के निर्माण में गुणवत्ता के साथ कुछ हद तक समझौता किया जाता हो, परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि, एफडीए द्वारा इन तीनों स्थानों की मेस व कैंटीन को सीधे बंद ही करा दिया जाए, क्योंकि ऐसा करने के चलते उन तीनों स्थानों पर बाहरगांव से आनेवाले लोगों को खाने-पीने की वस्तुएं उपलब्ध होने में दिक्कतें पैदा हो सकती हैं. ऐसे में शायद यह ज्यादा बेहतर रहता कि, एफडीए के स्थानीय अधिकारियों द्वारा उन तीनों मेस व कैंटीन का नियमों के आधार पर निरीक्षण व मूल्यांकन किया जाता तथा उन स्थानों पर जो भी त्रृटियां व कमियां दिखाई दी, उन्हें दूर करने अथवा सुधार करने के लिए नियमानुसार नोटीस जारी कर उन कैंटीन व मेस संचालकों को कुछ निर्धारित मोहलत दी जाती. साथ ही यदि कुछ मोहलत के पूरी होने के बावजूद स्थिति में कोई सुधार दिखाई नहीं देता, तब कोई दंडात्मक कार्रवाई की जाती. परंतु उन तीनों स्थानों पर स्थित मेस व कैंटीन को सीधे सील लगाकर बंद करवा देना किसी भी लिहाज से समर्थनीय कार्रवाई नहीं है.
यहां यह भी विशेष उल्लेखनीय है कि, अमरावती शहर सहित जिले में कई ऐसे बडे उपाहार गृहों, मिष्ठान्न भंडार, रेस्टॉरेंट व होटल सहित परमिट रूम व बीयर बार हैं, जिनके किचन यानी रसोईघर की ओर झांकने की पुर्सत एफडीए के स्थानीय अधिकारियों को अब तक शायद नहीं मिली है. ऐसी आस्थापनाओं को रसोईघर का यदि एफडीए के अधिकारियों द्वारा मुआयना भर कर लिया जाए, तो शायद उन्हें यह महसूस होगा कि, उन्होंने अब तक जिन तीन स्थानों की मेस व कैंटीन को बंद करवाया है, वे शायद तुलनात्मक रूप से ज्यादा साफ सुथरे थे. ऐसे में अब यह आशंका बलवती हो रही है कि, कुछ बडे निजी आस्थापना धारकों पर एफडीए के स्थानीय अधिकारियों की ‘विशेष कृपादृष्टि’ बनी हुई है. वहीं जिन सार्वजनिक न्यास वाले स्थानोें की मेस व कैंटीन से कोई ‘लेना-देना’ नहीं होनेवाला, उन स्थानों की मेस व कैंटीन को कार्रवाई का निशाना बनाते हुए अखबारों में अपने नाम व फोटो के साथ खबरें प्रकाशित की जा रही है. ताकि इस ‘छपास’ के जरिए खुद को अपने ‘बॉस’ यानी तुकाराम मुंढे की नजरों में चढाया जा सके.
ऐसा नहीं है कि, मुंंढे के आयुक्त बनने के उपरांत अमरावती में एफडीए ने किसी निजी आस्थापना के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. लेकिन ऐसे जिन होटलों व रेस्टॉरेंट पर कार्रवाई करते हुए उन्हें सील किया गया. वे शहर में स्थित अन्य कई मिष्ठान्न गृहों, रेस्टॉरेंट व होटलों की तुलना में अपेक्षाकृत तौर पर काफी छोटे थे. ऐसे में इस स्थिति को देखते हुए एफडीए के स्थानीय अधिकारियों द्वारा कार्रवाई को लेकर किया जा रहा पक्षपात व भेदभाव साफतौर पर दिखाई देता है. ध्यान यह भी दिलाया जा सकता है कि, शहर के कई बीयर बार व परमिट रूम के साथ किचन की सुविधा भी जुडी हुई हैै. जहां पर देर रात शराब पीने के लिए पहुंचने वाले लोगों को चकना व स्नॅक्स सहित भोजन के नाम पर क्या परोसा जाता है और उसकी गुणवत्ता क्या होती है, इसका शायद एफडीए के स्थानीय अधिकारियों को दूर-दूर तक कोई अंदेशा भी नहीं है, क्योंकि आज तक शहर सहित जिले के किसी भी परमीट रूम या बियर बार के किचन पर एफडीए की कार्रवाई होने की कोई जानकारी सामने नहीं आयी है.
* सडक किनारे हाथठेलों पर बिकनेवाले खाद्य पदार्थों की क्वॉलिटी का क्या?
यहां पर इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया जा सकता है कि, आज अमरावती शहर सहित तहसील मुख्यालयवाले शहरों में शायद ही ऐसा कोई चौक-चौराहा होगा, जहां पर सुबह अथवा शाम के वक्त चाय-नाश्ते की अस्थायी दुकानें अथवा हाथठेले नहीं लगते होंगे. हैरत और कमाल की बात यह है कि, बिना कोई फूड सेफ्टी लायसेंस लिए व्यवसाय करनेवाले ऐसे फुटकर विक्रेताओं द्वारा बेचे जानेवाले खाद्य पदार्थों की क्वॉलिटी को एफडीए द्वारा कभी भी नहीं जांचा जाता. बल्कि एफडीए की ओर से मिलनेवाला लायसेंस प्राप्त कर और अपना पंजियन कराकर खाद्यपेय बिक्री का व्यवसाय करनेवाले लोग ही एफडीए की कार्रवाईयों का निशाना बनते है. इसे भी अपने आप में एक अजब काम का तरीका और इंसाफ कहा जा सकता है. यानि कुल मिलाकर मामला यह है कि, नियमित रूप से आयकर अदा करनेवाले व्यक्ति द्वारा यदि गलती से कम टैक्स जमा कराया गया, तो उसके यहां इनकम टैक्स का छापा पड जाता है और उसके बैंक खाते व खाता बही सील हो जाता है. वहीं वैध अवैध मार्ग से लाखों-करोडों रूपये का व्यवहार करनेवाला कोई व्यक्ती यदि करदाता के तौर पर खुद को पंजिकृत ही नहीं कराता और कर सहित पूरी रकम डकार देता है, तो भी उस पर आयकर विभाग की कोई नजर नहीं पडती. ऐसे में कहा जा सकता है कि, डकैती करना जायज है, लेकिन चोरी करना गुनाह है.





