जिसकी शुरूआत मोह से होती है, उसका अंत युध्द से
प.पू. हरिरायजी महोदयश्री का वचनामृत

चतुर्थ दिवस – श्री परमानंद दासजी
अमरावती /दि.5- पं.पू. गोस्वामी श्री पुरूषोत्तमलालजी के आशीर्वाद से आयोजित अष्टसखा चरित्रामृत महोत्सव के चतुर्थ दिवस पर प.पु. 108 श्री हरिरायजी महोदयश्री ने हरिचंद मंगलम में वचनामृत व परमानंददासजी के जीवन चरित्र का वर्णन किया. इससे पूर्व आज के महाप्रसाद उत्सव मनोरथी गो.बा. कृष्णदासभाई विठ्ठलदासजी सराफ परिवार व श्री नवीनकुमार कोठारी महु तथा श्री अशोककुमार मोड परिवार एवं दीप्ति आशीष देवकिसनजी मुंदडा परिवार के साथ उत्सव मनोरथी श्री कांतिलालभाई भगवानजीभाई सेठ परिवार व गो. वा. मंगलजीभाई जीवनभाई पोपट परिवार के सदस्यों व्दारा आचार्यपीठ पर विराजित प.पू. गोस्वामी 108 श्री हरिरायजी महोदयश्री का पारिवारीक स्वागत किया गया.
आचार्य श्री बल्लआचार्यजी की छबि व पोथीजी के पूजन व माल्यार्पण उपरान्त आज की कथा का प्रारंभ हुआ. विगत दिनों के कथा प्रसंग का पुन:आलोकन डॉ. घनश्याम बोहती ने करवाया. मंच संचालन में दीपाली करवा ने सहयोग किया. कल गौचारण लीला मनोरथ में आगे गाय पाछे गाय इतगाय उतरगाय गोविंद को गायन में ‘बसबोई भावे’ के प्रसंग के साथ गौमाता की महिमा का बखान हुआ. क्रम को आगे बढाते हुए प.पू. जे.जे. ने कहा श्रीवल्लभाचार्यजी के 2 घर थे. चरणात आगे आपने कहा कि रास के दर्शन बहूत दुर्लभ है. ब्रम्हा आदि देवताओं को भी ध्वनि से अंदाज लगाना पडता था कि रास कहाँ हो रहा है. अंदाज से ही पुष्पवर्षा करते थे.
‘भाग्य की कही न जाए यशोदा तेरे’
परमानंद जस गाए –
जितने भी रत्न है किसी ना किसी वस्तु के प्रतीक है. गोकुल में यमुनाजी में स्नान नहीं करना चाहिए किंतु मथुराजी में वर्ष में एक दिन भाईदूज के दिन स्नान की अनुमति है. दोनों जगह भाव का अंतर है. मातृभाव से स्नान की अनुमति है. आगे बताया कि, जिसकी शुरूआत मोह से होती है, उसका अंत युध्द से होता है. परमानंददासजी ने वल्लभाचार्य जी से कहा कि गाय के सिंग पर राई का दाना टिककर रह जाए उतने समय प्रभु का नाम ले ले तो उध्दार हो जाए.
परमानंददासजी ने ऐसा पर गाया कि 3 दिन तक सभी मंत्रमुग्ध हो गए. ठाकुरजी की सेवा भी भूल गए.
‘हरि तेरी लीला की सुध आवे
कमल नयन मनमोहन मूरत
मन मन चित्र बनावे’
मधुरवाणी बोलने से रोग नहीं होता, ताप नहीं होता. कम बोलने से वाणी की शक्ति इकठ्ठा होती है. वाणी का प्रभाव बढता है.
‘सुप-वृंदावन -चंद्रसरोवर पर
नाम- गिरीराजी- तरेटी में
गुण- यमुनाजी के तट पर
तीन दिनों में तीन जगह रास की.’
‘आज दधि मीठो मदनगोपाल’
बासुंदी के हाथों से दही खिलाने के अवसर पर गाया पद, मदनगोपाल शब्द का जहां जहां वर्णन होता है वहां वहां युगल जोडी का तात्पर्य है. परमानंदासजी ने 51000 पदों की रचना की. प्रभु की व्यवस्था पर संशय नहीं करना चाहिए. दूरदृष्टि रखकर व्यवस्था की होती है.
‘आए मेरे नंद नंदन के प्यारे माथा तिलक मनोहर बानों त्रिभुवन के उजियारे,
अपने शरीर से एक पल के लिए भी कंठी नहीं हटानी चाहिए. विष्णु द्रोही कहलाते हैं. जिस तरह सिंदुर अखंड सौभाग्य की निशानी है. मिश्री अखंड मायुर्थ प्रेम की निशानी है. प्रभु को मिश्री का भोग अधिक प्यारा होता है.
* पवित्रा बनाने की विधि
360 दिनो के 360 धागे लपेटे और 24 घंटो के 24 फुंदे बनाना इस तरह पवित्रा बनता है. एक बार एक वैष्णव ने पूछा प्रभु से उपर भी कोई है क्यों तो उसी समय प्रकट हो गए कहने लगे मुझसे भी उपर मेरी ध्वजा है.
जिसका एक एक रोम कृष्ण रसका पान करती है. वह है गोपी. ऐसी है गोपी की व्याख्या जब दर्शन खुले हो तो वैष्णव आपस में जयश्रीकृष्ण नहीं करना चाहिए. प्रभु के सामने किसी अन्य को प्रभु नहीं मानना चाहिए.
नारद जी ने नंद महोत्सव का दही लक्ष्मीजी ने चखाया तो उन्हें अमृतसा प्रतीत हुआ. यह है नंद महोत्सव की महिमा.
* नंद घरे आनंद भयो
याने ब्रम्हानंद को भी जो आनंद दे वह पूर्णानंद. नंद महोत्सव मनाया गया. हेरी हे री रे भैया, आज नंदराय के आनंद भयो. नाचत गोपी करत फुलाहल मंगलचार कियो. बडी संख्या में वैष्णव बंधु-भगिनी की अत्यंत उत्साहपूर्ण उपस्थिति रविवार संध्या रही. कथा महोत्सव के अब मात्र तीन दिन शेष है. जबकि श्रोता वैष्णवों को लग रहा है कि, कथा अभी और कुछ दिन चलना चाहिए, इतना रसभरा विवेचन पूज्य हरिराय महोदय श्री कर रहे हैं.
(प्रस्तुति – श्याम दम्माणी नीलेश)





