नगर रचना विभाग की बदहाली से मनपा की 18 करोड़ की आय अटकी
चार वर्षों से प्रभारी व्यवस्था के भरोसे चल रहा विभाग, 200 फाइलें लंबित

* अमरावती शहर के तमाम नागरिक, बिल्डर और व्यवसायी परेशान
* नए एडीटीपी शुभम वाकचौरे के सामने लंबित प्रकरणों का पहाड़
* राजस्व वसूली और व्यवस्था सुधारने की बड़ी चुनौती
अमरावती/दि.6- अमरावती महानगरपालिका के नगर रचना (टाउन प्लानिंग) विभाग की बदहाल कार्यप्रणाली अब सीधे मनपा की आर्थिक सेहत पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है. पिछले चार वर्षों से पूर्णकालिक सहायक संचालक नगर रचना (एडीटीपी) के बिना प्रभारी व्यवस्था के भरोसे चल रहे इस विभाग में न केवल 150 से 200 निर्माण संबंधी फाइलें लंबित पड़ी हैं, बल्कि विभाग से मिलने वाली लगभग 18 करोड़ रुपये की संभावित आय भी अधर में लटकी हुई है. पहले से आर्थिक संकट से जूझ रही मनपा के लिए यह राशि किसी संजीवनी से कम नहीं है, लेकिन विभागीय सुस्ती और प्रशासनिक ढिलाई के कारण करोड़ों रुपये का राजस्व अब तक मनपा की तिजोरी तक नहीं पहुंच पाया है.
सूत्रों के अनुसार भवन निर्माण अनुमति, विकास शुल्क, प्रीमियम, लेआउट मंजूरी, नक्शा स्वीकृति और अन्य नियोजन संबंधी प्रकरणों की बड़ी संख्या महीनों से लंबित है. इन प्रकरणों का निपटारा नहीं होने से जहां नागरिकों, बिल्डरों और आर्किटेक्ट्स को बार-बार मनपा के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, वहीं मनपा का राजस्व भी अटका हुआ है. निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि मंजूरी प्रक्रिया में हो रही देरी का असर सीधे निवेश, रोजगार और शहर के विकास पर पड़ रहा है.
* सप्ताह में केवल दो दिन चलता था विभाग का ’मुख्यालय’
नगर रचना विभाग का अतिरिक्त प्रभार बुलढाणा की पूर्णकालिक एडीटीपी वैशाली गाठे के पास था. बुलढाणा में जिम्मेदारियों के कारण उनका अमरावती कार्यालय में नियमित रूप से उपस्थित रहना संभव नहीं हो पा रहा था. बताया जाता है कि वे सप्ताह में केवल एक-दो दिन ही अमरावती आती थीं. परिणामस्वरूप महत्वपूर्ण निर्णय, तकनीकी मंजूरियां और राजस्व से जुड़े प्रस्ताव लंबे समय तक लंबित पड़े रहे.
विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होने के कारण कार्यप्रणाली भी प्रभावित हुई. आरोप है कि प्रभारी व्यवस्था के चलते जवाबदेही का अभाव रहा और अनेक फाइलें महीनों तक टेबलों पर धूल खाती रहीं.
* विकास कार्य अटके, मनपा को दोहरा नुकसान
नगर रचना विभाग शहर के विकास और मनपा के राजस्व का प्रमुख स्रोत माना जाता है. भवन निर्माण अनुमति और विकास शुल्क से होने वाली आय मनपा के लिए महत्वपूर्ण होती है. लेकिन वर्तमान स्थिति में विभाग की सुस्ती ने मनपा को दोहरा नुकसान पहुंचाया है. एक ओर शहर के विकास प्रकल्प प्रभावित हुए हैं, वहीं दूसरी ओर करोड़ों रुपये का राजस्व भी अटक गया है.
बता दे कि, मनपा पहले ही वित्तीय तंगी, बकाया भुगतानों और सीमित संसाधनों की चुनौती झेल रही है. ऐसे समय में 18 करोड़ रुपये की संभावित आय का अटक जाना प्रशासनिक अक्षमता का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है. यदि यह राशि समय पर प्राप्त होती तो शहर के बुनियादी ढांचे, स्वच्छता, सड़कों और अन्य विकास कार्यों को गति मिल सकती थी.
* जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर भी सवाल
शहर के विकास और मनपा की आय से सीधे जुड़े इस महत्वपूर्ण विभाग की स्थिति लंबे समय से चर्चा का विषय रही है. इसके बावजूद जनप्रतिनिधियों द्वारा इस मुद्दे को अपेक्षित गंभीरता से नहीं उठाए जाने को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं. नागरिकों और निर्माण व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि नगर रचना विभाग की अव्यवस्था कोई नई समस्या नहीं है, फिर भी इसे सुधारने के लिए ठोस और प्रभावी पहल दिखाई नहीं दी.
* नए एडीटीपी के सामने अग्निपरीक्षा
अंततः नगर रचना विभाग को नया पूर्णकालिक नेतृत्व मिल गया है. शुभम वाकचौरे ने सोमवार को सहायक संचालक नगर रचना के रूप में पदभार संभाल लिया. अब उनके सामने वर्षों से लंबित फाइलों का निपटारा, विभागीय अनुशासन बहाल करना, निर्माण अनुमति प्रक्रिया को गति देना और मनपा की अटकी हुई 18 करोड़ रुपये की आय को वसूल कर राजस्व बढ़ाना सबसे बड़ी चुनौती होगी. निर्माण क्षेत्र से जुड़े अभियंता, वास्तुविशारद, बिल्डर और नागरिकों को नए अधिकारी से बड़ी उम्मीदें हैं. सभी की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या नया नेतृत्व नगर रचना विभाग की सुस्त और अव्यवस्थित कार्यप्रणाली को बदलकर नागरिकों को राहत दिला पाएगा या फिर लंबित फाइलों और अटके राजस्व का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा.
* नए एडीटीपी शुभम वाकचौरे के सामने व्यवस्था सुधारने की बड़ी चुनौती
नगर रचना विभाग की मौजूदा स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं है, बल्कि यह शहर के विकास और मनपा की आर्थिक क्षमता से जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है. अब देखना यह होगा कि नया नेतृत्व इस विभाग को कितनी जल्दी पटरी पर ला पाता है.





