क्योंकि अब सवाल हर बेटी का है…

मरावती के रविनगर चौक पर 17 वर्षीय कॉलेज छात्रा की दिनदहाड़े हुई निर्मम हत्या ने शहर को भीतर तक झकझोर दिया है. एक बेटी घर से कॉलेज जाने के लिए निकली थी. उसके सामने जिंदगी का लंबा रास्ता था, सपने थे, परिवार की उम्मीदें थीं. लेकिन रास्ते में ही उसकी जिंदगी चाकू के वारों से खत्म कर दी गई. आरोपी की गिरफ्तारी हो चुकी है, पुलिस जांच आगे बढ़ रही है और कानून अपना काम करेगा. लेकिन क्या इस घटना के साथ हमारी जिम्मेदारी भी खत्म हो जाएगी, शायद नहीं. क्योंकि इस हत्याकांड में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि हत्यारा कौन था. वह सवाल तो पुलिस और न्याय व्यवस्था तय करेगी. असली सवाल यह है कि एक समाज के रूप में हम उस मानसिकता को कब पहचानेंगे, जो किसी लड़की को अपनी इच्छा के मुताबिक जीने का अधिकार देने के बजाय उसके जीवन, उसकी पसंद और उसकी स्वतंत्रता पर अपना अधिकार समझने लगती है और इससे भी बड़ा सवाल, क्या हम हर ऐसी घटना के बाद केवल आक्रोश व्यक्त करके, मोमबत्तियां जलाकर और कठोर सजा की मांग करके अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं?
गतरोज जानलेवा हमले की शिकार हुई 17 वर्षीय कॉलेज छात्रा किसी अपराध की ओर नहीं, अपने भविष्य की ओर जा रही थी. वह बीएससी प्रथम वर्ष की छात्रा थी. घर से निकली, मोपेड पर बैठी और कॉलेज की ओर बढ़ी. रविनगर चौक के पास कथित रूप से उसका रास्ता रोका गया और उस पर चाकू से हमला कर दिया गया. दिनदहाड़े, सार्वजनिक स्थान पर, लोगों की मौजूदगी में एक किशोरी पर लगातार वार होते रहे. यह दृश्य केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है. यह उस सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है, जिसके बीच हमारी बेटियां रोज स्कूल और कॉलेज जाती हैं. यह हत्या इसलिए भी भयावह है क्योंकि इसमें सार्वजनिक स्थान पर हिंसा की निर्भीकता दिखाई देती है. अपराधी को यह भरोसा कैसे हुआ कि वह दिन के उजाले में ऐसी वारदात को अंजाम दे सकता है. यह प्रश्न पुलिस से पूछा जाना चाहिए. प्रशासन से पूछा जाना चाहिए. लेकिन समाज से भी पूछा जाना चाहिए.
इस मामले का सबसे गंभीर पहलू हत्या से पहले की कथित गतिविधियां हैं. जांच में सामने आया है कि तीन युवक पीडिता के छोटे भाई के स्कूल पहुंचे थे और उसकी बहन का लोकेशन जानने का प्रयास किया था. यदि जांच में यह तथ्य प्रमाणित होता है कि उक्त नाबालिग छात्रा की तलाश के लिए पहले उसके भाई से जानकारी जुटाई गई थी, तो यह घटनाक्रम बेहद गंभीर हो जाता है, क्योंकि तब यह सवाल उठेगा कि क्या किसी की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी? क्या उसकी लोकेशन जानबूझकर हासिल की गई? क्या हत्या से पहले घटनाक्रम की तैयारी की गई थी? स्कूल प्रशासन ने संदिग्ध युवकों को परिसर से बाहर किया, यह एक महत्वपूर्ण मानवीय सतर्कता थी. लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सामाजिक प्रश्न भी पैदा होता है. क्या ऐसी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी तत्काल पुलिस को दी गई थी, यदि नहीं, तो क्यों नहीं और यदि दी गई थी, तो उसके बाद क्या कार्रवाई हुई? इन सवालों के जवाब केवल इस एक हत्याकांड के लिए नहीं, बल्कि भविष्य की अनेक संभावित घटनाओं को रोकने के लिए भी जरूरी हैं.
महिलाओं की सुरक्षा की चर्चा होते ही हमारी व्यवस्था अक्सर लड़कियों को सलाह देने लगती है कि, अंधेरा होने से पहले घर लौटो. अकेले मत जाओ. फोन साथ रखो. सुनसान रास्ते से मत निकलो. किसी अनजान व्यक्ति से बात मत करो. अपनी लोकेशन शेयर मत करो. ये सावधानियां अपनी जगह उपयोगी हो सकती हैं. लेकिन क्या पूरा बोझ लड़की पर ही डाल देना समाधान है. क्यों नहीं पूछा जाता कि लड़कों को क्या सिखाया जा रहा है. उन्हें यह क्यों नहीं सिखाया जाता कि, किसी लड़की का फोन न उठाना उसका अधिकार है. किसी लड़की का रिश्ता ठुकराना उसका अधिकार है. किसी लड़की का दोस्ती खत्म करना उसका अधिकार है. किसी लड़की का अपनी जिंदगी के बारे में फैसला लेना उसका अधिकार है और सबसे महत्वपूर्ण किसी लड़की की ‘न’ का सम्मान करना पुरुषत्व की हार नहीं, सभ्यता की पहचान है.
इस घटना का एक और पहलू बेहद बेचैन करने वाला है. हमले के बाद उक्त नाबालिग छात्रा सड़क पर घायल पड़ी थी. लोग वहां से गुजर रहे थे. कुछ समय तक सहायता नहीं मिली. अंततः ऑटो चालक विनय काले और उनके मित्र राहुल इंगोले ने आगे बढ़कर घायल छात्रा को अस्पताल पहुंचाया. यहां समाज के सामने दो तस्वीरें खड़ी होती हैं. एक ओर दो लोग हैं, जिन्होंने बिना यह सोचे कि मामला क्या है, कौन आरोपी है या पुलिस क्या करेगी, घायल लड़की को अस्पताल पहुंचाना अपना कर्तव्य समझा. दूसरी ओर वे लोग हैं जो सामने से गुजरते रहे. हमें इस अंतर पर गंभीरता से विचार करना होगा. आज सड़क पर कोई घायल है. कल वह हमारा अपना व्यक्ति भी हो सकता है. मोबाइल निकालकर वीडियो बनाना आसान है, लेकिन घायल को अस्पताल पहुंचाने के लिए हाथ बढ़ाना असली नागरिकता है. हमारा समाज तब मजबूत होगा, जब तमाशबीनों की संख्या घटेगी और मदद के लिए आगे आने वालों की संख्या बढ़ेगी.
इस मामले में राजापेठ पुलिस द्वारा लगभग 10 घंटे के भीतर आरोपी को गोंदिया से गिरफ्तार करना निश्चित रूप से जांच की दृष्टि से महत्वपूर्ण उपलब्धि है. लेकिन गिरफ्तारी न्याय की मंजिल नहीं, केवल शुरुआत है. अब पुलिस के सामने कई प्रश्न हैं कि, हत्या का वास्तविक कारण क्या था, क्या हत्या पूर्व नियोजित थी, स्कूल तक पहुंचने वाले तीन युवकों की भूमिका क्या थी, क्या आरोपी को किसी ने जानकारी या मदद उपलब्ध कराई, पीडिता की लोकेशन किस तरह हासिल की गई, आरोपी के साथ और कौन लोग संपर्क में थे, घटना से पहले उक्त छात्रा को धमकी या पीछा किए जाने की कोई जानकारी थी, उपलब्ध मोबाइल, फॉरेंसिक और डिजिटल साक्ष्य क्या बताते हैं, क्या घटना को रोकने का कोई अवसर पहले मौजूद था. इन सभी प्रश्नों के उत्तर निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच से सामने आने चाहिए.
किसी भी आरोपी को केवल जनभावना के दबाव में दोषी घोषित करना न्याय नहीं है, लेकिन आरोपी के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों की निष्पक्ष और तेजी से जांच न करना भी न्याय के साथ अन्याय होगा. घटना के बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चलाने और कठोरतम सजा की मांग स्वाभाविक है. लेकिन केवल सजा कठोर होने से अपराध खत्म नहीं होते. निश्चित और त्वरित न्याय, प्रभावी पुलिसिंग और अपराध होने से पहले उसकी रोकथाम, ये तीनों उतने ही महत्वपूर्ण हैं. यदि जांच कमजोर रही, साक्ष्य सुरक्षित नहीं रहे, गवाहों की सुरक्षा नहीं हुई या अभियोजन प्रभावी नहीं रहा, तो कठोर कानून भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएगा. इसलिए इस मामले में पुलिस को न केवल आरोपी तक पहुंचने की तेजी दिखानी होगी, बल्कि अदालत में टिक सकने वाली मजबूत जांच भी करनी होगी.
आज किसी व्यक्ति की लोकेशन जानना पहले की तुलना में बेहद आसान हो गया है. सोशल मीडिया पोस्ट, लाइव लोकेशन, फोटो, स्टेटस, साझा मित्र और डिजिटल गतिविधियां किसी व्यक्ति की दिनचर्या के बारे में बहुत कुछ बता सकती हैं. इसलिए डिजिटल सुरक्षा अब केवल तकनीकी विषय नहीं रह गई है. बच्चों और युवाओं को यह समझाना होगा कि, अपनी लाइव लोकेशन अनावश्यक रूप से साझा न करें. संदिग्ध व्यक्ति के लगातार संदेशों या फोन कॉल को हल्के में न लें. धमकी या पीछा किए जाने की स्थिति में स्क्रीनशॉट और अन्य साक्ष्य सुरक्षित रखें. परिवार और भरोसेमंद लोगों को जानकारी दें. जरूरत पड़ने पर पुलिस या संबंधित हेल्पलाइन से संपर्क करें. कई बार बेटियां या बेटे परेशानियों से गुजरते रहते हैं, लेकिन घर में उन्हें यह भरोसा नहीं होता कि वे अपनी समस्या खुलकर बता सकेंगे. यहीं परिवार की भूमिका शुरू होती है. बेटी यदि कहती है कि कोई उसका पीछा कर रहा है, तो उसे यह कहकर चुप न कराया जाए कि ‘तुमने जरूर कुछ किया होगा.’ बेटा यदि किसी लड़की के इंकार से परेशान है, तो उसे यह समझाया जाए कि असहमति स्वीकार करना जीवन का हिस्सा है. परिवार में संवाद अपराध की पहली रोकथाम बन सकता है. बच्चों को केवल अच्छे अंक और करियर की शिक्षा नहीं, बल्कि संबंधों में सम्मान, असहमति, भावनात्मक नियंत्रण और कानून की समझ भी दी जानी चाहिए.
गतरोज घटित हत्याकांड के बाद जनप्रतिनिधियों ने कठोर कार्रवाई की मांग की है. यह जरूरी है. लेकिन जनता अब केवल बयान नहीं, परिणाम चाहती है. हर ऐसी घटना के बाद कुछ दिन तक सुरक्षा की चर्चा होती है. पुलिस गश्त बढ़ती है. बयान आते हैं. फिर धीरे-धीरे सब सामान्य हो जाता है. यही चक्र तोड़ना होगा. अमरावती जैसे शहर में स्कूल-कॉलेज मार्गों, प्रमुख चौकों और छात्राओं की आवाजाही वाले क्षेत्रों का सुरक्षा ऑडिट किया जा सकता है. खराब या अनुपयोगी सीसीटीवी कैमरों की पहचान की जा सकती है. अंधेरे स्थानों पर प्रकाश व्यवस्था सुधारी जा सकती है. संवेदनशील क्षेत्रों में पुलिस गश्त बढ़ाई जा सकती है. शिकायतों की निगरानी के लिए स्थानीय स्तर पर समन्वय व्यवस्था बनाई जा सकती है. घटना के बाद कार्रवाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है, अगली घटना होने से पहले व्यवस्था का जाग जाना.
गतरोज जानलेवा हमले का शिकार हुई नाबालिग छात्रा को न्याय तभी मिलेगा, जब उसकी मौत बदलाव की शुरुआत बने. किसी भी हत्या के बाद समाज कुछ समय तक दुखी रहता है. फिर अगली खबर आने पर पुरानी घटना पीछे छूट जाती है. लेकिन इस बार कहानी ऐसी नहीं होनी चाहिए. उस नाबालिग छात्रा की मौत को केवल एक और अपराध की खबर बनाकर भूल जाना उसके साथ दूसरा अन्याय होगा. उसकी मौत हमें यह सिखाए कि, पीछा करना प्रेम नहीं है. धमकी देना अधिकार नहीं है. ‘न’ को न मानना प्रेम नहीं है. किसी की लोकेशन उसकी अनुमति के बिना तलाशना सामान्य व्यवहार नहीं है. हिंसा किसी भावनात्मक विवाद का समाधान नहीं है और अपराध देखकर चुप रह जाना भी सामाजिक जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं है.
आज वह 17 वर्षीय नाबालिग छात्रा हमारे बीच नहीं है. उसकी मां की गोद खाली है. पिता की आंखों के सामने बेटी की याद है. छोटे भाई के सामने वह घटना है जिसे वह शायद जीवनभर भूल नहीं पाएगा. लेकिन अमरावती की हर बेटी को कल फिर उसी सड़क से गुजरना है. उसे स्कूल जाना है. कॉलेज जाना है. नौकरी पर जाना है. बाजार जाना है. अपने सपनों का पीछा करना है. उसे डरकर नहीं, स्वतंत्र होकर जीना है. इसलिए इस हत्याकांड का सबसे बड़ा सबक यही होना चाहिए कि हम बेटियों को सुरक्षा के नाम पर कैद करने के बजाय समाज की मानसिकता और व्यवस्था को सुरक्षित बनाएं. इस हत्याकांड पर आक्रोश जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है आत्ममंथन. क्योंकि सवाल यह नहीं कि उक्त पीडिता को न्याय कब मिलेगा. सवाल यह भी है, क्या हम ऐसा समाज बना पाएंगे, जहां अगली बार किसी बच्ची को ऐसे मामलों में को न्याय की जरूरत ही न पड़े. यही उक्त नाबालिग की मौत के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. क्योंकि अब सवाल केवल उस अकेली छात्रा का नहीं, हर बेटी का है.

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