बेटियों ने निभाया पुत्र धर्म, मां की अर्थी को दिया कंधा और चिता को दी मुखाग्नि
डॉक्टर बेटियों ने रूढ़ियों को पीछे छोड़ मां को दी अंतिम विदाई, समाज के सामने पेश किया संवेदनशील मिसाल

अमरावती/दि.30 – बदलते दौर में बेटियां किसी भी जिम्मेदारी में बेटों से कम नहीं हैं. इसका भावपूर्ण उदाहरण अमरावती में उस समय देखने को मिला, जब दो चिकित्सक बेटियों ने अपनी दिवंगत मां की अर्थी को न केवल कंधा दिया, बल्कि श्मशान भूमि पहुंचकर पूरे विधि-विधान के साथ उनकी चिता को मुखाग्नि भी दी. मां के प्रति प्रेम, कर्तव्य और जिम्मेदारी का यह दृश्य वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर गया.
अमरावती निवासी संध्या संजय खड़से का कुछ दिनों पूर्व अल्प बीमारी के बाद निधन हो गया. उनके निधन की खबर मिलते ही रिश्तेदार, परिचित और शुभचिंतक अंतिम दर्शन के लिए उनके घर पहुंचे. घर में मातम का माहौल था और हर आंख नम थी. इसी बीच एक स्वाभाविक सवाल भी सामने आया कि परिवार में पुत्र नहीं होने की स्थिति में दिवंगत संध्या खड़से की चिता को मुखाग्नि कौन देगा और अंतिम संस्कार की परंपरागत रस्में कौन निभाएगा? लेकिन इन सवालों का जवाब उनकी दोनों बेटियों ने अपने दृढ़ फैसले से दिया. पेशे से चिकित्सक उनकी दोनों बेटियों सरकारी चिकित्सक अधिकारी डॉ. स्वाति वाटणे और इरविन अस्पताल में फिजियोथेरेपिस्ट के रूप में कार्यरत डॉ. स्वप्नजा निम्भोरकर ने मां के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी स्वयं उठाने का निर्णय लिया. दोनों बेटियों ने मां की अर्थी को अपने कंधों पर उठाया और अंतिम यात्रा में शामिल हुईं.
* श्मशान भूमि पहुंचने के बाद
उन्होंने पूरे धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए मां की चिता को मुखाग्नि दी. मां को अंतिम विदाई देते समय दोनों बेटियों की आंखों से आंसू छलक पड़े. यह दृश्य देखकर वहां मौजूद परिजन और रिश्तेदार भी भावुक हो गए.
* मां के प्रति कर्तव्य निभाकर दिया संदेश
दोनों बेटियों ने अपने इस कदम से यह संदेश दिया कि संतान का कर्तव्य बेटा या बेटी होने से तय नहीं होता, बल्कि माता-पिता के प्रति प्रेम, सम्मान और जिम्मेदारी से तय होता है. उन्होंने न केवल अपनी मां की अंतिम इच्छा और सम्मान का ख्याल रखा, बल्कि समाज में चली आ रही उस धारणा को भी पीछे छोड़ दिया कि अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी केवल बेटे की होती है. डॉ. स्वाति वाटणे और डॉ. स्वप्नजा निम्भोरकर के इस भावपूर्ण निर्णय की समाज के विभिन्न वर्गों की ओर से सराहना की जा रही है. मां को अंतिम विदाई देते हुए दोनों बेटियों ने जिस तरह पुत्र धर्म निभाया, वह परिवार और समाज के लिए एक संवेदनशील और प्रेरणादायी उदाहरण बन गया है.





