शादीशुदा बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना असंवैधानिक

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

नई दिल्ली /दि.3 – सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल शादी हो जाने से कोई बेटी अपने माता-पिता के परिवार से अलग या पराई नहीं हो जाती. अदालत ने कहा कि शादीशुदा बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति और आश्रित कोटे के लाभों से बाहर रखना लैंगिक भेदभाव है और संविधान के समानता के सिद्धांत के विरुद्ध है.
न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्मा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि यह धारणा कि विवाह के बाद बेटी अपने मूल परिवार का हिस्सा नहीं रहती, केवल लिंग आधारित पूर्वाग्रह है, जिसे कानून स्वीकार नहीं करता. अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि आज के समय में अनेक विवाहित बेटियां अपने माता-पिता के साथ रहती हैं, उनकी देखभाल करती हैं और आर्थिक सहायता भी प्रदान करती हैं. कई मामलों में वे स्वयं भी अपने माता-पिता पर निर्भर होती हैं. ऐसे में केवल विवाह के आधार पर उन्हें परिवार की परिभाषा से बाहर करना उचित नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के उस तर्क को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि विवाहित बेटियों को लाभ नहीं दिया जा सकता क्योंकि वे अक्सर दूसरे स्थान पर रहती हैं. अदालत ने कहा कि यदि शादीशुदा बेटे को परिवार का सदस्य माना जा सकता है, तो शादीशुदा बेटी को इससे बाहर रखना समानता के अधिकार का उल्लंघन है.
पीठ ने कहा कि यह मान्यता कि विवाह के बाद बेटी दूसरे परिवार की हो जाती है और अपने माता-पिता से उसका संबंध समाप्त हो जाता है, संविधान में निहित समानता और गैर-भेदभाव के सिद्धांतों के विपरीत है. इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. अब केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति या आश्रित लाभों से वंचित नहीं किया जा सकेगा.

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