चंद्रपुर में उजागर हुआ नकली डिग्री रैकेट, मास्टरमाइंड गिरफ्तार
नागपुर से दबोचा गया परिमल गौरकर, कई विश्वविद्यालयों के नाम पर चल रहा था कथित फर्जीवाड़ा

* सरकारी नौकरी और पदोन्नति के लिए लाखों में बेची जा रही थीं फर्जी डिग्रियां, मार्कशीट और माइग्रेशन सर्टिफिकेट
* 5 से 10 लाख रुपये में धडल्ले के साथ बेचे जा रहे थे विभिन्न विश्वविद्यालयों के फर्जी प्रमाणपत्र
चंद्रपुर/दि.28- नकली शैक्षणिक दस्तावेजों के एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश करते हुए चंद्रपुर के दुर्गापुर पुलिस थाना क्षेत्र की पुलिस ने कथित मास्टरमाइंड परिमल गौरकर को नागपुर से गिरफ्तार किया है. आरोप है कि वह विभिन्न विश्वविद्यालयों के नाम पर फर्जी डिग्रियां, अंकसूचियां (मार्कशीट) और माइग्रेशन सर्टिफिकेट तैयार कर उन्हें लाखों रुपये में बेचने का कारोबार चला रहा था. पुलिस ने शुक्रवार सुबह नागपुर स्थित एक मकान पर छापा मारकर परिमल गौरकर और उसके एक सहयोगी को हिरासत में लिया. गौरकर की गिरफ्तारी को इस पूरे फर्जी प्रमाणपत्र नेटवर्क की सबसे बड़ी कड़ी माना जा रहा है. जांच एजेंसियों को उम्मीद है कि उससे पूछताछ में इस रैकेट से जुड़े कई महत्वपूर्ण खुलासे हो सकते हैं.
पुलिस जांच में सामने आया है कि नकली डिग्री, मार्कशीट और माइग्रेशन सर्टिफिकेट की कीमत 5 लाख से 10 लाख रुपये तक वसूली जाती थी. प्रारंभिक जांच के अनुसार इन दस्तावेजों का उपयोग सरकारी नौकरियां हासिल करने, पदोन्नति प्राप्त करने और विभिन्न शैक्षणिक व प्रशासनिक प्रक्रियाओं में किया जा रहा था. इस खुलासे ने सरकारी तंत्र और भर्ती प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब चंद्रपुर निवासी वैभव माशीरकर ने दुर्गापुर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. शिकायत की गंभीरता को देखते हुए पुलिस निरीक्षक संतोष शेगावकर और पुलिस उपनिरीक्षक रवींद्र नक्कनवार ने तकनीकी साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर जांच शुरू की. जांच के दौरान पुलिस पहले ही वैभव सोनुले नामक एक आरोपी को गिरफ्तार कर चुकी थी. अब परिमल गौरकर और उसके सहयोगी की गिरफ्तारी के बाद इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों की संख्या तीन हो गई है.
पुलिस सूत्रों के अनुसार गिरफ्तार परिमल गौरकर और पहले गिरफ्तार किए गए वैभव सोनुले आपस में रिश्तेदार हैं. इस कारण पुलिस यह भी जांच कर रही है कि दोनों की भूमिका क्या थी और नकली दस्तावेज तैयार करने तथा उन्हें बेचने का नेटवर्क किस प्रकार संचालित किया जा रहा था. जांच में सामने आया है कि आरोपी कथित तौर पर राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय, गोंडवाना विश्वविद्यालय सहित महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के कई विश्वविद्यालयों के नाम पर फर्जी डिग्रियां और अंकसूचियां तैयार कर रहा था. इसके अलावा कोल्हापुर, सोलापुर, राजस्थान और कर्नाटक के विभिन्न विश्वविद्यालयों के नाम भी इस कथित फर्जीवाड़े में सामने आए हैं. पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि दस्तावेज तैयार करने के लिए कौन-सी तकनीक और उपकरणों का उपयोग किया जाता था तथा विश्वविद्यालयों से संबंधित जानकारी आरोपियों तक कैसे पहुंचती थी.
* सरकारी विभागों में उपयोग की आशंका से बढ़ी चिंता
इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल सरकारी नौकरियों और पदोन्नति प्रक्रियाओं में किए जाने की आशंका व्यक्त की जा रही है. यदि जांच में यह तथ्य सही साबित होता है तो कई विभागों में बड़े स्तर पर सत्यापन अभियान चलाना पड़ सकता है. पुलिस अब यह भी पता लगाने में जुटी है कि ऐसे दस्तावेज खरीदने वाले लोग कौन हैं, कितनों ने उनका उपयोग किया और क्या किसी सरकारी विभाग में इनके आधार पर नियुक्तियां या पदोन्नतियां प्राप्त की गईं.
* पूरे नेटवर्क का खुलासा होने की संभावना
पुलिस अधिकारियों का मानना है कि परिमल गौरकर इस रैकेट का प्रमुख संचालक हो सकता है. उसकी गिरफ्तारी के बाद अब जांच का दायरा और बढ़ाया जा रहा है. पुलिस प्रमाणपत्र तैयार करने वालों, दलालों, खरीदारों तथा संभावित लाभार्थियों तक पहुंचने का प्रयास कर रही है. जांच एजेंसियों के अनुसार आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं. साथ ही यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि अब तक कितनी फर्जी डिग्रियां और प्रमाणपत्र तैयार किए गए तथा इस पूरे नेटवर्क के जरिए कितने करोड़ रुपये का कारोबार किया गया.