क्या एक शब्द बदल देने से देश में खत्म हो जाएगी गरीबी?

देश बदल रहा है. इतना बदल रहा है कि अब समस्याओं को हल करने की भी आवश्यकता नहीं रह गई है. बस उनका नाम बदल दीजिए, परिभाषा बदल दीजिए, सरकारी फॉर्म से उनका उल्लेख हटा दीजिए और समस्या अपने आप समाप्त हो जाएगी.
कम-से-कम भीकू तो यही मानता है. भीकू पेशे से भिखारी है. या शायद अब यह कहना गलत होगा. क्योंकि खबर आई है कि आगामी जनगणना में ‘बेगर्स’ अर्थात भिखारी नाम का कोई कॉलम ही नहीं होगा. यह सुनते ही भीकू और उसके जैसे लाखों लोगों ने राहत की सांस ली. अब सरकारी कागजों में वे भिखारी नहीं कहलाएंगे. यानी देश में भिखारियों की संख्या भी कम हो जाएगी. आखिर सरकारी आंकड़ों में जो नहीं है, वह वास्तविकता में कैसे हो सकता है? भीकू को लगा कि सरकार ने आखिरकार उसके आत्मसम्मान का ख्याल रखा है. वर्षों से लोग उसे भिखारी कहते थे. कभी भिक्षुक कहकर सम्मानजनक बनाने की कोशिश हुई, कभी वंचित वर्ग कहकर. लेकिन पेट भरने के लिए हाथ तो उसे ही फैलाना पड़ता था. अब कम-से-कम सरकारी रिकॉर्ड में उसकी पहचान बदल जाएगी और पहचान बदल जाए, तो शायद जिंदगी भी बदल जाए.
हमारे देश में समस्याओं से निपटने की एक अनोखी परंपरा रही है. कहीं गंदगी हो तो दीवार खड़ी कर दो. कहीं झुग्गियां दिखती हों तो टीन की चादरें लगा दो. कहीं बदहाली नजर आती हो तो रास्ता बदल दो. और अगर गरीबी दिखाई देती हो तो उसकी गिनती ही बंद कर दो. भीकू को याद है, जब विदेशी मेहमान भारत आए थे, तब उनके रास्ते में पड़ने वाली झुग्गियों को बड़े-बड़े पर्दों और दीवारों से ढंक दिया गया था. विदेशी मेहमान लौट गए, लेकिन झुग्गियां वहीं रहीं. तब भीकू ने पहली बार समझा था कि गरीबी मिटाने और गरीबी छिपाने में बहुत फर्क होता है. आज जनगणना से भिखारी शब्द हटाने की खबर सुनकर उसे वही दृश्य याद आ गया. शायद अब देश ने गरीबी छिपाने से एक कदम आगे बढ़कर उसे कागजों से मिटाने का निर्णय ले लिया है.
भीकू सोच रहा था कि अब उसके पेशे का नया नाम क्या होगा. भिखारी तो पुराना और अपमानजनक शब्द है. शायद उसे ‘सामाजिक करुणा संग्रहक’ कहा जाएगा. या ‘अनौपचारिक वित्तीय पुनर्वितरण एजेंट’ या फिर ‘मानवीय संवेदनाओं का क्षेत्रीय समन्वयक’. आजकल नाम बदलने का बड़ा महत्व है. बेरोजगार को ‘जॉब सीकर’ कहिए. ठेका कर्मचारी को ‘आउटसोर्स्ड प्रोफेशनल’ कहिए. झुग्गी को ‘अनौपचारिक आवासीय क्लस्टर’ कहिए और भिखारी को कुछ भी कह दीजिए, बस भिखारी मत कहिए. नाम बदलने से वास्तविकता तो नहीं बदलती, लेकिन रिपोर्ट जरूर सुंदर दिखने लगती है.
भीकू को एक और सवाल परेशान करता है कि, आखिर भिखारी किसे कहा जाए, सड़क पर खड़ा होकर दो रुपये मांगने वाले को, या चुनाव के मौसम में घर-घर जाकर वोट मांगने वाले को, सत्ता के लिए गठबंधन मांगने वाले को, बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए रियायतें मांगने वाले उद्योगपतियों को, बैंक ऋण माफी मांगने वालों को, विदेशी निवेश के लिए दुनिया भर में घूमकर विनती करने वालों को, सोशल मीडिया पर लाइक, शेयर और फॉलोअर मांगने वालों को. अगर मांगना ही भिक्षा है, तो फिर इस देश में भिखारियों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक है. फर्क केवल इतना है कि कुछ लोग फटे कपड़ों में भीख मांगते हैं और कुछ लोग सूट-बूट पहनकर.
देश में आज भी करोड़ों लोगों को मुफ्त राशन दिया जा रहा है. यह एक बड़ी सामाजिक आवश्यकता है. लेकिन इसके साथ ही हमें लगातार बताया जाता है कि गरीबी तेजी से घट रही है. भीकू को यह गणित समझ नहीं आता. जिस व्यक्ति को हर महीने सरकारी अनाज की जरूरत है, वह गरीब नहीं है, तो फिर गरीब कौन है. जिस परिवार को दो वक्त की रोटी के लिए सरकारी सहायता चाहिए, वह समृद्ध है तो फिर समृद्धि की परिभाषा क्या है. लेकिन शायद यह भीकू की समझ से बाहर की अर्थव्यवस्था है. उसे केवल इतना समझ में आता है कि अगर आंकड़ों में उसका नाम नहीं रहेगा, तो हो सकता है कि गरीबी भी कम दिखाई देने लगे.
सरकारें अक्सर उपलब्धियों के आंकड़े गिनाती हैं. इतने करोड़ लोगों को लाभ मिला. इतने करोड़ बैंक खाते खुले. इतने करोड़ घर बने. इतने करोड़ लोगों को राशन मिला. लेकिन भीकू के लिए सबसे बड़ा आंकड़ा शाम को मिलने वाली रोटियों की संख्या है. उसके लिए अर्थव्यवस्था का मतलब शेयर बाजार नहीं, पेट भरना है. उसके लिए विकास का मतलब विदेशी निवेश नहीं, रात को भूखा न सोना है और उसके लिए सम्मान का मतलब जनगणना के फॉर्म में नाम बदल जाना नहीं, बल्कि ऐसा जीवन है जिसमें उसे हाथ फैलाने की मजबूरी न हो.
जनगणना से भिखारी शब्द हट सकता है. रिपोर्टों में संख्या घट सकती है. सरकारी दस्तावेजों में नई शब्दावली आ सकती है. लेकिन क्या शहरों के चौराहों से वे लोग गायब हो जाएंगे, जो आज भी दो वक्त की रोटी के लिए हाथ फैलाते हैं. क्या मंदिरों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों के बाहर बैठे लोग अचानक आत्मनिर्भर हो जाएंगे. क्या भूख केवल इसलिए खत्म हो जाएगी, क्योंकि उसका उल्लेख सरकारी फॉर्म में नहीं होगा. सवाल यही है और यही सवाल भीकू भी पूछ रहा है.
किसी समाज की सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने अपनी समस्याओं के लिए कितने आकर्षक शब्द खोज लिए. सफलता इस बात से मापी जाती है कि उसने उन समस्याओं को कितना कम किया. यदि भिखारी शब्द हटाने के साथ-साथ भिक्षावृत्ति भी कम हो जाए, तो यह स्वागतयोग्य कदम होगा. यदि गरीबी का उल्लेख कम होने के साथ-साथ गरीबों की संख्या भी कम हो जाए, तो यह उपलब्धि होगी. यदि आंकड़ों में सुधार के साथ जीवन में भी सुधार दिखे, तो वह विकास कहलाएगा. लेकिन यदि केवल शब्द बदलें और हालात वहीं रहें, तो वह सुधार नहीं, शब्दों की बाजीगरी है.
भीकू आज भी उसी चौराहे पर खड़ा है. फर्क बस इतना है कि कल तक लोग उसे भिखारी कहते थे, और शायद कल कोई नया नाम देंगे. लेकिन उसके हाथ अब भी फैले हुए हैं. उसका पेट अब भी भूखा है और उसका सवाल अब भी वही है कि, साहब, अगर मैं भिखारी नहीं हूं, तो फिर इस देश में भिखारी है कौन?

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