खाद्य सुरक्षा अब बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट

एफडीए आयुक्त के रूप में 100 दिन पूरे होने पर बोले तुकाराम मुंढे

* अनियंत्रित नमक, चीनी और अस्वास्थ्यकर वसा का सेवन बढ़ा रहा बीमारियों का बोझ
मुंबई/दि.7 – महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) आयुक्त के रूप में आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे ने 100 दिन पूरे कर लिए हैं. इस दौरान खाद्य एवं औषधि क्षेत्र में कई कड़े फैसले लेने और विभिन्न प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई करने वाले मुंढे ने अब राज्य की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर चेतावनी दी है. उनका कहना है कि खाद्य सुरक्षा की समस्या केवल मिलावट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बड़े पैमाने पर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुकी है.
एक अंग्रेजी दैनिक को दिए एक साक्षात्कार में एफडीए आयुक्त मुंढे ने अपने शुरुआती 100 दिनों के अनुभव, एफडीए की प्रयोगशालाओं में लंबित जांच, अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री एवं दवाओं के नियमन तथा स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले भोजन से जुड़े फैसलों पर भी बात की. खाद्य क्षेत्र की समस्या क्या अब तक सामने आए मामलों से कहीं अधिक गंभीर है? इस सवाल के जवाब में मुंढे ने इसे बड़े पैमाने का सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बताया. उन्होंने कहा कि सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस दिशा में चिंता व्यक्त कर चुके हैं.
मुंढे के अनुसार, स्वतंत्रता के समय देश में बीमारियों के कुल बोझ में संक्रामक बीमारियों की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत थी. आज स्थिति इसके उलट है और गैर-संचारी रोगों का हिस्सा लगभग 70 प्रतिशत तक पहुंच गया है. उनके मुताबिक, इसके पीछे दो प्रमुख कारक आहार और दवाओं का सेवन हैं. विशेष रूप से अस्वास्थ्यकर वसा, अधिक चीनी और अधिक नमक वाले खाद्य पदार्थों का अनियंत्रित सेवन चिंता का विषय है. मुंढे ने खाद्य आपूर्ति और मांग के बीच बढ़ते अंतर का भी उल्लेख किया. उन्होंने बताया कि आबादी बढ़ने के साथ खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ी है और उसकी पूर्ति के लिए बाहरी स्रोतों पर निर्भरता भी बढ़ रही है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि महाराष्ट्र में प्रतिदिन 1.5 करोड़ से अधिक अंडे बाहर से मंगाने पड़ते हैं, क्योंकि राज्य का स्थानीय उत्पादन मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं है.
दूध की उपलब्धता को लेकर भी मुंढे ने सवाल उठाया. उनके अनुसार, राज्य में प्रतिदिन करीब 1.8 से 2 करोड़ लीटर दूध उत्पादन होने की बात कही जाती है. लेकिन राज्य में दूध देने वाले पशुओं की संख्या को देखते हुए यह उत्पादन आंकड़ा पूरी तरह मेल नहीं खाता. ऐसे में सवाल उठता है कि बाजार में उपलब्ध अतिरिक्त दूध कहां से आ रहा है. मुंढे ने इसे केवल होटल या दूध से बने उत्पादों में मिलावट का मामला मानने के बजाय सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा व्यापक मुद्दा बताया.
अपने 100 दिन के कार्यकाल के अनुभव साझा करते हुए मुंढे ने ऋऊ- की प्रयोगशालाओं में लंबित नमूनों की जांच का भी उल्लेख किया. खाद्य एवं औषधि संबंधी नमूनों की समय पर जांच और रिपोर्टिंग नियामक कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण है. इसलिए लंबित जांच को कम करना भी प्रशासन के सामने अहम चुनौती है.
एफडीए के दायरे में आने वाले अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली दवाओं और विभिन्न चिकित्सा सामग्रियों के नियमन पर भी मुंढे ने अपनी भूमिका स्पष्ट की. उनका कहना है कि खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ दवाओं और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी वस्तुओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से उतना ही महत्वपूर्ण है.
मुंढे के 100 दिनों के कार्यकाल के दौरान की गई कार्रवाइयों के बाद अब खाद्य सुरक्षा को लेकर उनका यह बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है. उनका स्पष्ट संकेत है कि खाद्य सुरक्षा को केवल मिलावट विरोधी कार्रवाई तक सीमित रखने के बजाय इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के व्यापक मुद्दे के रूप में देखना होगा.

Back to top button