बच्चियों को डर नहीं, आत्मविश्वास दें, रविनगर हत्याकांड से लें सबक
बेटियों को आत्मरक्षा सिखाना अब विकल्प नहीं, समय की जरूरत

अमरावती में 17 वर्षीय नाबालिग छात्रा की दिनदहाड़े हुई हत्या ने केवल एक परिवार को नहीं, बल्कि पूरे समाज को झकझोर दिया है. एक बेटी का यूं अचानक दुनिया से चले जाना हर संवेदनशील व्यक्ति के लिए पीड़ादायक है. इस घटना ने जहां कानून-व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, वहीं समाज और अभिभावकों के सामने भी आत्ममंथन का एक बड़ा अवसर रखा है. उक्त नाबालिग छात्रा पर सार्वजनिक स्थान पर हुआ जानलेवा हमला समाज के सामने एक गंभीर सवाल छोड़ गया है, जब एक लड़की पर हमला हो रहा था, तब आसपास मौजूद लोगों ने क्या किया? क्या हम केवल तमाशबीन बनकर रह गए? क्या किसी संकटग्रस्त व्यक्ति की सहायता करना अब हमारी सामाजिक जिम्मेदारी नहीं रही? यह सवाल किसी एक व्यक्ति या समूह को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक मानसिकता पर विचार करने के लिए है. संकट के समय पीड़ित की सहायता के लिए आगे आने का साहस और मानसिक तैयारी समाज में विकसित करनी होगी.
आज अमरावती सहित पूरे समाज में महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के साथ होने वाली हिंसा, छेड़छाड़, अत्याचार और अपराध की घटनाएं चिंता का विषय बन रही हैं. ऐसे समय में केवल यह सोच लेना पर्याप्त नहीं है कि संकट आने पर कोई दूसरा व्यक्ति हमारी बेटी की मदद के लिए आगे आएगा. समाज को ऐसा जरूर बनाना होगा कि कोई भी व्यक्ति संकट में फंसे तो आसपास के लोग उसकी सहायता के लिए आगे आएं. इसके साथ ही हमारी बेटियां भी इतनी आत्मविश्वासी और सक्षम हों कि विपरीत परिस्थिति में घबराने के बजाय उसका सामना कर सकें. आज जरूरत इस बात की है कि प्रत्येक बेटी के मन में यह विश्वास पैदा हो कि ‘मैं संकट का सामना कर सकती हूं और जरूरत पड़ने पर अपना बचाव कर सकती हूं.’
कराटे, तायक्वांदो, जूडो, कुंगफू और हैप्किडो जैसे मार्शल आर्ट केवल शारीरिक प्रशिक्षण नहीं हैं. इनके माध्यम से बच्चों में शारीरिक तंदुरुस्ती के साथ आत्मविश्वास, अनुशासन, एकाग्रता, मानसिक मजबूती और विपरीत परिस्थितियों में तुरंत निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है. आत्मरक्षा का अर्थ किसी से लड़ना नहीं है. इसका वास्तविक उद्देश्य खतरे को पहचानना, घबराहट पर नियंत्रण रखना, सुरक्षित तरीके से प्रतिक्रिया देना और आवश्यकता पड़ने पर स्वयं को बचाने की क्षमता विकसित करना है. अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा, कपड़े, मनोरंजन, होटलिंग, यात्राओं और अन्य सुविधाओं पर खर्च करते हैं. यह स्वाभाविक भी है. लेकिन जब बात शारीरिक सुरक्षा और आत्मरक्षा के प्रशिक्षण की आती है, तो कई बार इसे अतिरिक्त खर्च मान लिया जाता है. बेटी को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिलाने पर किया गया खर्च केवल एक खेल या गतिविधि पर किया गया खर्च नहीं है, बल्कि उसके आत्मविश्वास और सुरक्षा की दिशा में किया गया निवेश है. जैसे हम बच्चे को शिक्षा देकर भविष्य के लिए तैयार करते हैं, वैसे ही उसे आत्मरक्षा का प्रशिक्षण देकर जीवन की अनिश्चित परिस्थितियों के लिए भी तैयार किया जा सकता है.
आज भी कुछ अभिभावकों के मन में कराटे अथवा मार्शल आर्ट को लेकर यह धारणा है कि इससे बच्चा ‘मारपीट करना’ सीखता है. वास्तव में मार्शल आर्ट का उद्देश्य हिंसा को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि शरीर और मन पर नियंत्रण विकसित करना है. नियमित प्रशिक्षण से बच्चों में अनुशासन, एकाग्रता, आत्मसंयम और निर्णय क्षमता विकसित होती है. वे अपने शरीर को फिट रखते हैं और कठिन परिस्थितियों में मानसिक रूप से अधिक सजग रहने का अभ्यास करते हैं. इसलिए माता-पिता को अपनी बेटियों के साथ-साथ बेटों को भी मार्शल आर्ट और आत्मरक्षा प्रशिक्षण के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए.
मोबाइल फोन और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते इस्तेमाल ने बच्चों की दिनचर्या को काफी बदल दिया है. घंटों मोबाइल, सोशल मीडिया और स्क्रीन पर समय बिताने से शारीरिक गतिविधियां कम होती जा रही हैं. ऐसे वातावरण में कराटे जैसे खेल बच्चों को नियमित व्यायाम और सक्रिय जीवनशैली की ओर ले जा सकते हैं. इससे केवल शरीर मजबूत नहीं होता, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और अनुशासन को भी मजबूती मिलती है. बेटियों को आत्मरक्षा सिखाना जरूरी है, लेकिन केवल बेटियों को सुरक्षा का जिम्मा सौंप देना समस्या का पूरा समाधान नहीं है. समाज को अपने बेटों को भी महिलाओं का सम्मान करना, ‘ना’ का अर्थ समझना, किसी पर जबरदस्ती न करना और दूसरे की स्वतंत्रता एवं गरिमा का सम्मान करना सिखाना होगा. परिवार, स्कूल और समाज-तीनों की जिम्मेदारी है कि बच्चों में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना विकसित हो. तभी हम ऐसा वातावरण बना सकेंगे जहां बेटियों को हर समय डरकर जीने की आवश्यकता न पड़े.
आज आवश्यकता है कि स्कूलों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से लड़कियों के लिए प्राथमिक आत्मरक्षा प्रशिक्षण को प्रोत्साहित किया जाए. प्रत्येक लड़की को कम से कम इतना प्रशिक्षण जरूर मिलना चाहिए कि वह खतरे की स्थिति को पहचान सके, स्वयं को सुरक्षित रखने के प्राथमिक उपाय जान सके और संकट के समय घबराए नहीं. हालांकि आत्मरक्षा का प्रशिक्षण कानून-व्यवस्था का विकल्प नहीं है. अपराध रोकने के लिए प्रभावी पुलिस व्यवस्था, त्वरित कार्रवाई, कठोर कानूनी प्रक्रिया और सुरक्षित सार्वजनिक वातावरण भी उतने ही आवश्यक हैं. लेकिन इन व्यवस्थाओं के साथ नागरिक जागरूकता और व्यक्तिगत सुरक्षा की तैयारी भी जरूरी है.
विगत दिनों रविनगर में घटित दुखद घटना को केवल एक आपराधिक घटना मानकर भूल जाना उचित नहीं होगा. यह घटना हमें कई स्तरों पर सोचने के लिए मजबूर करती है-हमारी बेटियां कितनी सुरक्षित हैं? समाज संकट के समय कितना संवेदनशील है? अभिभावक बच्चों को सुरक्षा और आत्मविश्वास के लिए कितना तैयार कर रहे हैं? और क्या हम अपने बच्चों को केवल सफल इंसान बनाने की कोशिश कर रहे हैं या जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक भी बना रहे हैं? ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कानून-सुव्यवस्था मजबूत करना जरूरी है, लेकिन इसके साथ समाज में जागरूकता, नागरिक साहस और बेटियों में आत्मविश्वास पैदा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.
हर बेटी को डर के साये में नहीं, आत्मविश्वास के साथ जीने का अधिकार है. इसलिए अभिभावक आज से ही पहल करें-बेटियों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दें, उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाएं और उन्हें यह विश्वास दिलाएं कि वे कमजोर नहीं हैं.
दाई सेंसाई राजूजी नन्नावरे,
मो.नं. 9960129806 / 9168180355





