विद्यार्थियों के जीवन के शिल्पकार होते हैं गुरुजी
आज शिक्षक दिवस पर विशेष

शिक्षक केवल वह व्यक्ति नहीं है, जो कक्षा में खड़े होकर किताब का पाठ पढ़ाता है. सच्चा शिक्षक वह होता है, जो अपने विद्यार्थियों के भीतर ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित करता है, उनकी प्रतिभा को पहचानता है, कमियों को दूर करने में मदद करता है और उन्हें जीवन की सही दिशा दिखाता है. इसीलिए शिक्षक को विद्यार्थियों के जीवन का शिल्पकार कहा जाता है. जिस प्रकार एक शिल्पकार पत्थर को तराशकर सुंदर प्रतिमा का रूप देता है, उसी प्रकार शिक्षक अपने ज्ञान, संस्कार और मार्गदर्शन से विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को आकार देता है. 5 सितंबर शिक्षक दिवस हमें ऐसे ही आदर्श शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है. यह दिन केवल शिक्षक को सम्मानित करने का दिन नहीं, बल्कि उस गुरु परंपरा को नमन करने का दिन है, जिसने पीढ़ियों को ज्ञान, संस्कार और मानवता की राह दिखाई है.
4 सितंबर की रात शिक्षक दिवस के बारे में सोचते-सोचते मैं सो गया. नींद में मुझे अपने विद्यालय के मराठी विषय के प्रिय गुरुजी दिखाई दिए. मैंने मन ही मन उनसे संवाद शुरू किया. मेरे विद्यालयीन जीवन में मुझे अनेक शिक्षक मिले, लेकिन मराठी पढ़ाने वाले मेरे गुरुजी मेरे सबसे प्रिय रहे. उनका रहन-सहन बेहद साधारण और विचार अत्यंत ऊंचे थे. वे समय के पाबंद थे और कभी कक्षा में देर से नहीं आते थे. उनके चेहरे पर हमेशा खिली रहने वाली मुस्कान विद्यार्थियों का तनाव दूर कर देती थी. उनकी पढ़ाने की शैली बेहद सरल, रोचक और प्रभावी थी. कठिन से कठिन पाठ को भी वे कहानी, उदाहरण और जीवन से जुड़ी घटनाओं के माध्यम से इतनी सहजता से समझाते कि विषय बोझ नहीं, आनंद बन जाता. वे हमें केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं देते थे, बल्कि नैतिक मूल्य, अनुशासन, संस्कार और जीवन जीने की कला भी सिखाते थे. कक्षा में मेधावी विद्यार्थी हो या पढ़ाई में पीछे रहने वाला, उनके लिए सभी समान थे. किसी विद्यार्थी को कोई कठिनाई होती तो वे उसे डांटने के बजाय धैर्य और प्रेम से समझाते. गलती होने पर सजा देने के बजाय उसे सुधारने का अवसर देते.
जब आदर्श शिक्षक की बात होती है तो हमारे सामने महात्मा ज्योतिराव फुले और क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले का जीवन आदर्श बनकर सामने आता है. उन्होंने उस दौर में शिक्षा की अलख जगाई, जब समाज का एक बड़ा वर्ग लड़कियों की शिक्षा के विरोध में था. सावित्रीबाई फुले ने सामाजिक विरोध और अपमान की परवाह किए बिना लड़कियों के लिए स्कूल शुरू किया. रास्ते में उनके ऊपर कीचड़, गोबर और पत्थर तक फेंके गए, लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे. उनका समर्पण इस बात का प्रमाण है कि सच्चा शिक्षक परिस्थितियों से नहीं डरता, बल्कि अपने विद्यार्थियों के भविष्य के लिए हर चुनौती का सामना करता है.
मेरे आदर्श गुरुजी भी महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले के इन्हीं आदर्शों पर चलने का प्रयास करते थे. वे प्रत्येक विद्यार्थी को अपने बच्चे की तरह मानते और उनमें अच्छे संस्कार विकसित करने का प्रयास करते थे. मेरे गुरुजी का मराठी भाषा और व्याकरण पर अद्भुत अधिकार था. उनके बोलने में मिठास और व्यवहार में आत्मीयता थी. कविता पढ़ाते समय वे केवल कविता का अर्थ नहीं बताते, बल्कि उसे गाकर और भावों के साथ प्रस्तुत करते. देखते ही देखते पूरी कक्षा कविता के साथ एकाकार हो जाती.
इसी प्रभावी अध्यापन शैली के कारण मेरे मन में मराठी विषय के प्रति गहरी रुचि और प्रेम पैदा हुआ. गुरुजी का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि विद्यार्थी के भीतर सीखने की जिज्ञासा पैदा करना है. वे विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ-साथ खेल, कला, वक्तृत्व, निबंध और कविता प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करते थे. विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी उनका हमेशा सक्रिय योगदान रहता था.
एक आदर्श शिक्षक की पहचान केवल कक्षा में नहीं होती. जब विद्यार्थी कठिन परिस्थिति में होता है, तब शिक्षक का वास्तविक व्यक्तित्व सामने आता है. मेरे गुरुजी संकट के समय मित्र की तरह विद्यार्थियों के साथ खड़े रहते और सही मार्गदर्शन देते थे. उन्हें देखकर हमें हर दिन कुछ नया सीखने की प्रेरणा मिलती थी. उनका प्रयास रहता था कि विद्यार्थी केवल अच्छे अंक हासिल करने वाला छात्र न बने, बल्कि अच्छा इंसान और जिम्मेदार नागरिक बने. यही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य भी है. किताबें हमें जानकारी देती हैं, लेकिन शिक्षक उस जानकारी को जीवन के अनुभव और संस्कार से जोड़कर ज्ञान में बदलता है.
गुरुजी के साथ मेरा यह संवाद चल ही रहा था कि मैंने स्वप्न में उनके चरण स्पर्श करने के लिए अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए. तभी मेरी आंख खुल गई. घड़ी में सुबह के पांच बज रहे थे. मुझे स्कूल जाने की तैयारी करनी थी. उस दिन शिक्षक दिवस के अवसर पर ‘शिक्षक विद्यार्थियों के जीवन के शिल्पकार’ विषय पर वक्तृत्व प्रतियोगिता होने वाली थी. दो दिन पहले ही मेरे गुरुजी ने मेरी नोटबुक में इस प्रतियोगिता के लिए मेरा नाम लिख दिया था. मैंने गुरुजी का आशीर्वाद लिया और विद्यालय पहुंचा. वक्तृत्व प्रतियोगिता शुरू हुई. जब संचालक ने मेरा नाम पुकारा तो मंच पर पहुंचते ही मेरे सामने मेरे स्वप्न के आदर्श गुरुजी का व्यक्तित्व घूमने लगा. मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ उनके व्यक्तित्व और आदर्श शिक्षक के गुणों को शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास किया. जब प्रतियोगिता का परिणाम घोषित हुआ तो प्रथम स्थान मेरा था. मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था. मेरे गुरुजी भी उतने ही खुश थे. उस समय मैंने अपने गुरुजी के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया. उस क्षण मुझे महसूस हुआ कि शिक्षक द्वारा विद्यार्थी के भीतर जगाई गई प्रतिभा ही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि होती है.
एक शिक्षक की कलम, उसकी वाणी और उसका व्यवहार विद्यार्थी के पूरे जीवन पर प्रभाव डाल सकता है. शिक्षक की कही हुई एक अच्छी बात कई बार विद्यार्थी की जिंदगी की दिशा बदल देती है. इसलिए शिक्षक का दायित्व केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि एक बेहतर समाज और बेहतर पीढ़ी का निर्माण करना है. आज शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक और आधुनिक साधनों का विस्तार हो रहा है. स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा और ऑनलाइन माध्यमों ने सीखने के तरीके बदल दिए हैं, लेकिन एक संवेदनशील और आदर्श शिक्षक की भूमिका कभी समाप्त नहीं हो सकती. तकनीक ज्ञान उपलब्ध करा सकती है, लेकिन ज्ञान का सही उपयोग, संस्कार और मानवीय संवेदना शिक्षक ही विकसित कर सकता है. शिक्षक दिवस के अवसर पर मेरी यही सदिच्छा है कि हर विद्यार्थी को ऐसा गुरु मिले, जो उसे केवल सफल विद्यार्थी नहीं, बल्कि श्रेष्ठ मनुष्य और जिम्मेदार नागरिक बनने की राह दिखाए.
अपने जीवन को सही दिशा देने वाले सभी गुरुजनों को शत-शत नमन. शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!
– प्रा. अरुण बाबारावजी बुंदेले
महात्मा फुले राज्यस्तरीय आदर्श शिक्षक पुरस्कार प्राप्त
साहित्यकार एवं कवि, अमरावती
मो.नं. 8087748609





