कावड़ पर टिकी जिंदगी और दोपहिया पर मौत!

नागपुर/दि.12- गढ़चिरौली, मेलघाट, नंदूरबार, पालघर… नक्शे पर हरे ’जंगल की देन’ दिखाने वाले ये क्षेत्र सरकार के दस्तावेजों में ’विकास की राह पर’ बताए जाते हैं; लेकिन वास्तविकता में वहां के आदिवासियों के हिस्से में अभी भी कावड़ पर लादकर अस्पताल ले जाई जाने वाली जिंदगी और दोपहिया वाहन पर आड़ा लिटाकर मृत्यु की ओर धकेले जाने वाले लोग आ रहे हैं. यह केवल प्रशासन की लापरवाही नहीं है, बल्कि व्यवस्था ने आदिवासियों की जान की कितनी कीमत समझी है? यह उसका प्रमाण है.
गढ़चिरौली के एटापल्ली तहसील के कांदोली की मीरा लेकामी की मृत्यु केवल एक महिला की मृत्यु नहीं है; वह स्वास्थ्य व्यवस्था पर लगा एक काला धब्बा है. इस गंभीर बीमार महिला को दोपहिया वाहन पर आड़ा सुलाकर अस्पताल ले जाना पड़ता है, एम्बुलेंस का चालक छुट्टी पर होता है, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के उपकरण खराब होते हैं.
लोकमत के प्रतिनिधि को यह बात बेचैन करती है और अंततः उन्हें खुद एम्बुलेंस चलानी पड़ती है… सरकार करोड़ों की योजनाओं के बोर्ड लगाती है, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों के अस्पतालों में इंसान को बचाने के लिए आवश्यक मामूली व्यवस्था भी उपलब्ध नहीं होती. ऐसे समय में विकास की परिभाषा कैसे तय की जाए? दूसरी ओर भामरागड़ के दर्भा इलाके में तेंदूपत्ता संग्रहण के लिए गए मल्ला पिडसे पर जंगली सुअर ने हमला कर दिया. घायल अवस्था में उन्हें बांस की कावड़ पर बांधकर पहाड़ी रास्तों से पैदल चलते हुए मुख्य सड़क तक लाना पड़ा. यह दृश्य हृदयविदारक है. गढ़चिरौली जैसे कुछ हिस्सों में नागरिकों के पास आज भी एम्बुलेंस नहीं है, सड़क नहीं है, उपचार नहीं है. जंगल के वन्यप्राणियों से ज्यादा यहां के लोगों को प्रशासन की उदासीनता से डर लगना चाहिए, ऐसा चित्र है.
सच तो यह है कि पहले इनका ही बंदोबस्त किया जाना चाहिए. तेंदूपत्ते के करोड़ों के कारोबार से शासन को राजस्व मिलता है, ठेकेदारों को मुनाफा मिलता है; लेकिन जिन हाथों से यह जंगल अर्थव्यवस्था को आधार देता है, उन मजदूरों की जान की सुरक्षा की जिम्मेदारी मात्र कोई नहीं लेता. बीमा नहीं है, आपातकालीन सुविधाएं नहीं हैं, सुरक्षित सड़कें नहीं हैं. उनके हिस्से में सिर्फ संघर्ष और मृत्यु का भय है.
आज गढ़चिरौली में जो घट रहा है, वही चित्र मेलघाट में कुपोषण के रूप में, नंदूरबार में स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में और पालघर में प्रवासी मजदूरों की वेदना में दिखता है. सरकारें बदलीं, योजनाएं बदलीं, घोषणाएं बदलीं; लेकिन आदिवासियों का भाग्य नहीं बदला. क्योंकि इस व्यवस्था को आदिवासियों की वेदना से अधिक आंकड़े महत्वपूर्ण लगते हैं. अब जांच समितियां, रिपोर्ट और निलंबन की कार्रवाई भी होगी; लेकिन सवाल यह है कि अभी और कितनी मीरा लेकामी को मरना होगा? और कितने घायलों को कावड़ पर ढोना पड़ेगा? आदिवासियों की जान की कीमत सरकार को आखिर कब समझ आएगी? जंगल के इंसान के नसीब में सिर्फ संघर्ष, उपेक्षा और मृत्यु की राह है, यह चक्र रुकना ही चाहिए…!





