शहर में माँ दुर्गा के नए चेहरे के पैटर्न अपनाए जा रहे हैं
नवरात्रौत्सव की आहट तेज

मंडलों की कार्यकारिणी घोषित होना प्रारंभ
अमरावती /दि.30– अंबानगरी वैसे भी देवी पूजक शहर है. ऐसे में अश्विन नवरात्रि की आहट तेज हो गई है. दोनों ही देवी मंदिरों अंबा और एकवीरा संस्थानों द्वारा आनेवाले लाखों श्रद्धालुओं की सुविधार्थ पंडाल और प्रबंध करना प्रारंभ कर दिया है. इस बीच विविध मंडलों में देखा गया कि, देवी के स्वरुप में परिवर्तन किया जा रहा है. अंबानगरी को यह परिवर्तन रास भी आ रहा है. ढोल बजने और शहर के त्योहारी रोशनियों में जगमगाने से पहले एक शांत पल आता है. जब मिट्टी को एक चेहरा मिलता है और आँखों की एक जोड़ी एक मूर्ति को ‘माँ दुर्गा’ में बदल देती है. भौंहों का घुमाव, आँखों का फैलाव, होठों की कोमलता और जबड़े की मजबूती न सिर्फ ये बदलती है कि देवी कैसी दिखती हैं, बल्कि ये भी कि वे कैसी महसूस होती हैं.
सक्करसाथ और कुंभारवाडा जहाँ नवरात्रि के दौरान दुर्गा की मूर्तियाँ बनती हैं, पिछले तीन दशकों में देवी के चेहरे में धीरे-धीरे बदलाव आया है. सबसे बड़ा बदलाव आँखों में है, लेकिन ये परिवर्तन माथे, भौंहों से लेकर नाक, होंठ, गाल और जबड़े तक लगभग हर चेहरे की बारीकी तक फैला है.
* कलाकार की नजर से
कोलकाता के कृष्णानगर से आने वाले दूसरी पीढ़ी के मूर्तिकार सुभाष पाल के अनुसार, हर चेहरे की अपनी भाषा होती है. आँखें सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील हिस्सा हैं. वे ही मूर्ति को भाव देती हैं और चेहरे को जीवंत बनाती हैं.
* पहले और अब में फर्क
– पहले : मूर्तियों में आमतौर पर गोल चेहरे, नरम गाल, धीरे-धीरे घुमावदार भौहें और तुलनात्मक रूप से शांत आँखें होती थीं, जो माँ दुर्गा को एक शांत और मातृत्व भरा रूप देती थीं.
– अब : चेहरे की बनावट तेज हो रही है. आँखें अक्सर लंबी और ज्यादा उभरी हुई बनाई जा रही हैं, उठी हुई भौहें देवी को शक्तिशाली, योद्धा जैसी दृष्टि देती हैं.
अलग-अलग कलात्मक प्रभाव भी देखने को मिलते हैं. पारंपरिक बंगाली और बोनेडी-स्टाइल (पुरानी विरासत वाली शैली) के साथ-साथ कोलकाता और कुमारटोली से प्रेरित चेहरे भी मौजूद हैं, वहीं स्थानीय कलाकारों ने अपनी खुद की व्याख्याएं विकसित की हैं. कुछ मूर्तियों में कोमल, दयालु भाव है, तो कुछ में नुकीली नाक, उभरी हुई गाल की हड्डियाँ, सुडौल होंठ और मजबूत जबड़ा है जो ज्यादा नाटकीय रूप देता है.





