एसबीआई कर्मचारी ‘लोकसेवक’ नहीं, धारा 353 के तहत मामला नहीं बनता

नागपुर खंडपीठ ने अकोला अतिरिक्त सत्र न्यायालय का आदेश किया रद्द

* बैंक कर्मचारी पर कथित हमले के मामले में आरोप तय करने को माना कानूनी रूप से उचित नहीं
नागपुर/दि.4 – भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) का कर्मचारी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 21 के अर्थ में ‘लोकसेवक’ नहीं है. ऐसे में उसके साथ कथित मारपीट या आपराधिक बल के इस्तेमाल के मामले में आईपीसी की धारा 353 के तहत अपराध कायम करने के लिए आवश्यक मूलभूत शर्त पूरी नहीं होती. मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट करते हुए अकोला अतिरिक्त सत्र न्यायालय का आदेश रद्द कर दिया.
न्यायमूर्ति मेहरोज पठाण ने बार्शी टाकली स्थित प्रतिमा शिक्षण प्रसारक मंडल के अध्यक्ष मधुकर पवार द्वारा दायर फौजदारी पुनर्विचार आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया. अकोला अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने 1 नवंबर 2025 को पवार का दोषमुक्ति आवेदन खारिज करते हुए उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 353 के तहत आरोप तय किए थे. इस आदेश को पवार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. मामले में शिकायतकर्ता भारतीय स्टेट बैंक का कर्मचारी था. पवार की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि बैंक कर्मचारी होने के कारण शिकायतकर्ता को आईपीसी की धारा 21 के तहत ‘लोकसेवक’ नहीं माना जा सकता. इसलिए उस पर कथित हमले के मामले में धारा 353 लागू करने का कानूनी आधार नहीं बनता. पवार की ओर से अपनी दलील के समर्थन में दिल्ली हाईकोर्ट के रघुनाथ राय कुमार तथा मुंबई हाईकोर्ट के एन. वाघुल मामले में दिए गए फैसलों का हवाला दिया गया. इन मामलों में बैंक कर्मचारियों को आईपीसी की धारा 21 के तहत लोकसेवक नहीं माने जाने की बात सामने आई थी.
दूसरी ओर, सरकार की ओर से दलील दी गई कि एसबीआई कर्मचारी को लोकसेवक माना जाना चाहिए. इसके लिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सीबीआई, बैंक सिक्योरिटीज एंड फ्रॉड सेल बनाम रमेश गेल्ली मामले में दिए गए फैसले का संदर्भ दिया. दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने धारा 353 के कानूनी प्रावधानों और ‘लोकसेवक’ की परिभाषा पर विचार किया. अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 353 के तहत अपराध बनने के लिए संबंधित व्यक्ति का लोकसेवक होना आवश्यक है. इसके अलावा आरोपी द्वारा उस व्यक्ति पर हमला या जानबूझकर आपराधिक बल का इस्तेमाल किया जाना तथा उसे अपने कर्तव्य के निर्वहन से रोकने अथवा परावृत्त करने का उद्देश्य होना भी आवश्यक है. अदालत ने पाया कि मौजूदा मामले में शिकायतकर्ता आईपीसी की धारा 21 के तहत लोकसेवक की श्रेणी में नहीं आता. इसलिए धारा 353 के अपराध का मूलभूत तत्व ही पूरा नहीं होता.
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब धारा 353 के तहत संज्ञेय अपराध ही स्थापित नहीं होता, तो उससे जुड़े आईपीसी की धारा 504 और 506 के आरोपों को भी इसी आधार पर कायम नहीं रखा जा सकता. अदालत के अनुसार इन धाराओं के तहत कार्रवाई के लिए संबंधित दंडाधिकारी की अनुमति आवश्यक होती है. इन कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पवार का पुनर्विचार आवेदन मंजूर कर लिया तथा अकोला अतिरिक्त सत्र न्यायालय के 1 नवंबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया. इस आदेश के जरिए पवार का दोषमुक्ति आवेदन खारिज किया गया था और धारा 353 के तहत आरोप तय किए गए थे.

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