विदर्भ के छह जिले बने बाघों के नए ‘हॉट स्पॉट’
जंगलों से निकलकर गांवों तक पहुंच रहा वनराज

* व्याघ्र परियोजनाओं की सीमाएं लांघ रहे बाघ
* संरक्षण और मानव सुरक्षा की दोहरी चुनौती से जूझ रहा वन विभाग
अमरावती/दि.17 – महाराष्ट्र में बाघों की बढ़ती संख्या अब वन्यजीव संरक्षण की सफलता के साथ-साथ नई चुनौतियां भी लेकर आई है. राज्य में बाघों की संख्या 400 के पार पहुंचने के बाद अब उनका दायरा पारंपरिक व्याघ्र परियोजनाओं तक सीमित नहीं रहा है. विशेष रूप से विदर्भ क्षेत्र में बड़ी संख्या में बाघ संरक्षित टाइगर रिजर्व से बाहर निकलकर प्रादेशिक वन क्षेत्रों और गांवों के आसपास विचरण कर रहे हैं. इससे वन विभाग के सामने एक ओर बाघों के संरक्षण और संवर्धन की जिम्मेदारी है, तो दूसरी ओर मानव जीवन और पशुधन की सुरक्षा सुनिश्चित करने की चुनौती भी खड़ी हो गई है.
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार पूर्वी विदर्भ के नागपुर, चंद्रपुर, गड़चिरोली, भंडारा, गोंदिया और वर्धा जिले अब बाघों की बढ़ती मौजूदगी के कारण नए टाइगर हॉट स्पॉट के रूप में उभर रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति राज्य में सफल संरक्षण प्रयासों का परिणाम है, लेकिन इसके लिए दीर्घकालिक प्रबंधन रणनीति की आवश्यकता भी बढ़ गई है.
* टाइगर रिजर्व से बाहर बढ़ा बाघों का दायरा
महाराष्ट्र में वर्तमान में पेंच, नवेगांव-नागझिरा, मेलघाट, ताडोबा-अंधारी और बोर टाइगर रिजर्व जैसे प्रमुख व्याघ्र प्रकल्प कार्यरत हैं. इसके अलावा उमरेड-करांडला, टिपेश्वर, काटेपूर्णा और वैनगंगा जैसे अभयारण्यों में भी बाघों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. वन अधिकारियों के अनुसार अब बाघ केवल संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं. नागपुर वनवृत्त के अंतर्गत आने वाले कई प्रादेशिक वन क्षेत्रों में उनकी स्थायी मौजूदगी दर्ज की जा रही है. विशेष रूप से वर्धा, भंडारा, गोंदिया और नागपुर जिलों के प्रादेशिक वन क्षेत्रों में करीब 125 से 130 बाघ व्याघ्र परियोजनाओं के बाहर गांवों और कृषि क्षेत्रों के आसपास विचरण करते पाए गए हैं.
* बदल रहा है बाघों का व्यवहार
वन विभाग के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है. पहले बाघ आमतौर पर 15 से 20 किलोमीटर के दायरे में ही अपनी गतिविधियां सीमित रखते थे, लेकिन अब वे सैकड़ों किलोमीटर लंबी यात्राएं कर नए आवास क्षेत्रों और वन गलियारों (कॉरिडोर) की तलाश कर रहे हैं. विदर्भ के कई बाघ अब महाराष्ट्र की सीमाएं पार कर तेलंगाना के आदिलाबाद, मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और बैतूल, तथा छत्तीसगढ़ तक पहुंच रहे हैं. इसके अलावा नांदेड, यवतमाल, वाशीम, अमरावती और पांढुर्णा क्षेत्रों में भी बाघों की आवाजाही दर्ज की गई है. वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रवृत्ति बताती है कि बाघ नए क्षेत्रों में अपना वर्चस्व स्थापित करने और सुरक्षित आवास खोजने का प्रयास कर रहे हैं. बढ़ती आबादी के कारण युवा बाघ अपने मूल क्षेत्र छोड़कर नए इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं.
* गांवों के नजदीक बढ़ी मौजूदगी
बाघों के जंगलों से बाहर आने का असर ग्रामीण क्षेत्रों में स्पष्ट दिखाई देने लगा है. कई स्थानों पर खेतों, जलस्रोतों और गांवों के निकट बाघों की मौजूदगी दर्ज की जा रही है. इससे ग्रामीणों में भय का वातावरण बन रहा है. हालांकि वन विभाग का कहना है कि अधिकांश मामलों में बाघ मनुष्यों से दूरी बनाए रखते हैं, लेकिन उनके बढ़ते विचरण क्षेत्र के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका बढ़ जाती है. पशुधन पर हमले और ग्रामीण क्षेत्रों में दहशत की घटनाएं भी समय-समय पर सामने आती रहती हैं.
* रेस्क्यू और पुनर्वास के प्रयास भी सीमित
वन विभाग ने पिछले कुछ वर्षों में नवेगांव-नागझिरा, ब्रह्मपुरी, समुद्रपुर, रामटेक, नागपुर, भंडारा, ताडोबा और पेंच क्षेत्रों से कई बाघों को पकड़कर अन्य वन क्षेत्रों में स्थानांतरित किया है. अब तक 70 से अधिक बाघों का रेस्क्यू और पुनर्वास किया जा चुका है. इन बाघों को पश्चिम महाराष्ट्र, बोर और पैनगंगा जैसे क्षेत्रों में छोड़ा गया, ताकि मुख्य आवास क्षेत्रों पर दबाव कम किया जा सके. हालांकि अधिकारियों का मानना है कि इस उपाय से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाए हैं, क्योंकि बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है और नए क्षेत्रों में उनका विस्तार जारी है.
* वन विभाग के सामने दोहरी चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान स्थिति में वन विभाग को दो मोर्चों पर काम करना पड़ रहा है, बाघों और उनके प्राकृतिक आवास का संरक्षण तथा ग्रामीण आबादी और पशुधन की सुरक्षा. इसके लिए वन गलियारों का संरक्षण, मानव-बाघ संघर्ष कम करने की योजनाएं, त्वरित मुआवजा प्रणाली, आधुनिक निगरानी तकनीक और जनजागरूकता कार्यक्रमों को और मजबूत करने की आवश्यकता है.
* संरक्षण की सफलता, लेकिन सतर्कता जरूरी
वन्यजीव विभाग के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एम. एस. रेड्डी के अनुसार चंद्रपुर सहित विदर्भ के कई क्षेत्रों में बड़ी संख्या में बाघ प्रादेशिक जंगलों में विचरण कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि बाघ स्वभाव से भ्रमणशील वन्यजीव है और किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता. ऐसे में उसकी सुरक्षा के साथ-साथ लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी वन विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है. वन विशेषज्ञों का मानना है कि विदर्भ में बाघों की बढ़ती संख्या भारत की संरक्षण नीति की सफलता का प्रतीक है. हालांकि आने वाले वर्षों में यदि वन गलियारों का वैज्ञानिक प्रबंधन, आवास विस्तार और मानव-वन्यजीव संघर्ष नियंत्रण की प्रभावी रणनीति नहीं बनाई गई, तो यह सफलता नई चुनौतियों में बदल सकती है. फिलहाल विदर्भ देश के उन चुनिंदा क्षेत्रों में शामिल हो गया है जहां बाघों की मौजूदगी तेजी से बढ़ रही है और यही कारण है कि इसे अब ‘टाइगर हॉट स्पॉट’ के रूप में देखा जा रहा है.