न्यायाधीश को धमकाना वकील पिता-पुत्र को पड़ा भारी

हाईकोर्ट ने लगाया एक लाख रुपये का दावा खर्च और चार हजार रुपये जुर्माना

अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए मामला बार काउंसिल को भेजा
नागपुर/दि. 6 – अदालत में न्यायाधीश को धमकाना, ऊंची आवाज में बात करना और न्यायिक कामकाज में बाधा डालना बेहद गंभीर कृत्य है. यह केवल न्यायाधीश का अपमान नहीं, बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था की प्रतिष्ठा पर हमला है. यह कड़ी टिप्पणी मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने वकील पिता-पुत्र के मामले में की है. अदालत ने दोनों वकीलों पर कुल एक लाख रुपये का दावा खर्च और चार हजार रुपये जुर्माना लगाया है. साथ ही अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए मामला बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा को भेजने का आदेश दिया है. न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फलके और न्यायमूर्ति राज वाकोडे की पीठ ने सोमवार को यह फैसला सुनाया. आरोपी वकीलों की पहचान एड. सागर राठोड और उनके पिता एड. दुर्गादास राठोड (आर्णी, जि. यवतमाल) के रूप में हुई है.
यह मामला 26 नवंबर 2020 का है. उस समय प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी साजिदुज्जमान मोहम्मद हनीफ शाहिद की अदालत में एक आरोपी का वारंट रद्द नहीं किया गया था. इससे नाराज दोनों वकीलों ने न्यायाधीश के साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया और ऊंची आवाज में बात करते हुए धमकी दी थी. मामले में वकीलों द्वारा न्यायाधीश से कथित रूप से कहा गया था कि ‘हम आपको देख लेंगे, बार का प्रस्ताव लेकर कार्रवाई करेंगे और भ्रष्टाचार के सबूत वरिष्ठ अधिकारियों को देंगे.’ इस व्यवहार को हाईकोर्ट ने न्यायिक कार्य में गंभीर हस्तक्षेप माना.
* अनुकूल आदेश के लिए न्यायाधीशों को डराना स्वीकार्य नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी अनुकूल आदेश को हासिल करने के लिए न्यायाधीशों को डराना या धमकाना किसी भी सभ्य न्याय व्यवस्था में स्वीकार नहीं किया जा सकता. इस प्रकार का व्यवहार न्यायाधीशों की स्वतंत्र कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है और न्याय व्यवस्था की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाता है. अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारियों को दबाव में लाने का कोई भी प्रयास गंभीरता से देखा जाना चाहिए. न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए ऐसे मामलों की अनदेखी नहीं की जा सकती.
* बिना शर्त माफी भी स्वीकार नहीं
दोनों वकीलों ने हाईकोर्ट के समक्ष बिना शर्त माफी मांगी थी. हालांकि पीठ ने उनकी माफी स्वीकार करने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि माफी वास्तविक पश्चाताप का प्रतीक होनी चाहिए. यदि माफी केवल सजा से बचने की रणनीति या औपचारिक ‘कागजी माफी’ हो तो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता. न्यायालय ने कहा कि न्याय व्यवस्था की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए इस तरह के आचरण के प्रति सख्त रुख जरूरी है. इसी के तहत दोनों वकीलों पर आर्थिक दंड लगाने के साथ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए मामला बार काउंसिल को भेजा गया है.

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