व्यवस्था को आईना दिखाते तुकाराम मुंढे

इस समय महाराष्ट्र में अन्न सुरक्षा व औषध प्रशासन यानी एफडीए आयुक्त के तौर पर अपनी बेधडक कार्रवाईयों के चलते पूरे राज्य में चर्चित रहनेवाले आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे का कल अमरावती आगमन होने जा रहा है. जिनके दौरे को लेकर आम नागरिकों में विशेषकर युवाओं में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है तथा हर कोई एफडीए आयुक्त तुकाराम मुंढे का स्वागत करने के लिए काफी हदतक बेताब है और उनके स्वागत के लिए अमरावती शहर में जबरदस्त तैयारियां भी चल रही है. जिसके मद्देनजर यह सवाल पूछा जा सकता है कि, आखिर पेशे से एक प्रशासनिक अधिकारी रहनेवाले तुकाराम मुंढे को लेकर लोगों में इस हद तक स्वीकार्यता व लोकप्रियता क्यों है? क्योंकि अमरावती शहर व जिले सहित राज्य एवं देश में आईएएस व आईपीएस अधिकारियों की कोई कमी नहीं है. तो ऐसे में वह क्या बात है, जो तुकाराम मुंढे को अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों से अलग करती है.
कहना अतिशोयक्तिपूर्ण नहीं होगा कि, भारत में ईमानदार अधिकारियों की चर्चा अक्सर दो कारणों से होती है, या तो वे किसी बड़े घोटाले का पर्दाफाश करते हैं, या फिर वे उन नियमों को लागू करने की कोशिश करते हैं, जिन्हें समाज ने वर्षों से केवल कागजों तक सीमित कर रखा है. महाराष्ट्र कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे ऐसे ही अधिकारियों में शामिल हैं. उनकी कार्यशैली को लेकर मतभेद हो सकते हैं, उनके निर्णयों पर बहस हो सकती है, लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने जहां भी काम किया, वहां व्यवस्था को उसकी जिम्मेदारियों का एहसास कराया. आज जब तुकाराम मुंढे खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) के आयुक्त के रूप में होटल, रेस्तरां, क्लब और खाद्य प्रतिष्ठानों पर सख्त कार्रवाई कर रहे हैं, तब एक बार फिर वही पुरानी बहस शुरू हो गई है कि, क्या वे जरूरत से ज्यादा कठोर हैं, क्या वे केवल दिखावटी कार्रवाई करते हैं, या फिर वे उन लोगों को असुविधा पहुंचा रहे हैं, जो वर्षों से नियमों की अनदेखी करके लाभ कमाते रहे हैं. इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए पहले हमें स्वयं से एक सवाल पूछना होगा कि, क्या कानून का पालन करवाना किसी अधिकारी का अपराध है?
हम ऐसे समाज में रहते हैं, जहां अधिकांश लोग नियमों का सम्मान स्वेच्छा से नहीं, बल्कि दंड के भय से करते हैं. ट्रैफिक सिग्नल पर पुलिस न हो तो लाल बत्ती पार करना सामान्य बात समझी जाती है. सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाना, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, गलत दिशा में वाहन चलाना, सिफारिश और प्रभाव के आधार पर काम करवाना, टैक्स चोरी करना या नियमों को ‘मैनेज’ कर लेना कई लोगों को चतुराई लगता है. यही कारण है कि जब कोई अधिकारी नियमों को गंभीरता से लागू करता है, तो वह अचानक चर्चा का विषय बन जाता है. वास्तव में यह स्थिति किसी अधिकारी की असाधारणता नहीं, बल्कि समाज की विफलता को दर्शाती है. यदि सभी लोग नियमों का पालन करें, यदि संस्थाएं नियमित रूप से काम करें, तो किसी अधिकारी की सख्ती समाचार नहीं बनेगी. लेकिन दुर्भाग्य से भारत में अक्सर वही अधिकारी चर्चित होता है, जो सामान्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों को भी पूरी ईमानदारी से निभाता है. तुकाराम मुंढे इसी विरोधाभास का प्रतीक हैं. वे जहां भी गए, उन्होंने वहां व्यवस्था को चुनौती दी तथा अपने स्तर पर व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त करने का काम भी किया.
तुकाराम मुंढे का प्रशासनिक जीवन देखें तो एक बात स्पष्ट दिखाई देती है, उन्होंने कभी भी लोकप्रियता की राजनीति नहीं की. नगर निगमों से लेकर परिवहन विभाग, स्वास्थ्य प्रशासन और अन्य जिम्मेदारियों तक, उन्होंने हर जगह नियमों को प्राथमिकता दी. नागपुर महानगरपालिका में रहते हुए उन्होंने राजस्व वसूली, अतिक्रमण और प्रशासनिक अनुशासन के मुद्दों पर सख्त रुख अपनाया. बेस्ट और अन्य संस्थाओं में काम करते समय उन्होंने वित्तीय अनुशासन और जवाबदेही पर जोर दिया. कोविड काल में भी उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर कई कठोर लेकिन आवश्यक निर्णय लिए. यही कारण है कि उनका प्रशासनिक रिकॉर्ड अक्सर विवादों और तबादलों से जुड़ा दिखाई देता है. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उनके अधिकांश विवाद राजनीतिक हस्तक्षेप, हित समूहों के दबाव और व्यवस्था में व्याप्त जड़ता से टकराव के कारण पैदा हुए.
उल्लेखनीय है कि, खाद्य एवं औषधि प्रशासन का काम सीधे नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ा है. यदि किसी होटल में खराब खाद्य सामग्री का उपयोग हो रहा है, यदि एक्सपायरी उत्पाद बेचे जा रहे हैं, यदि स्वच्छता के मानकों का पालन नहीं हो रहा है, यदि नकली या मिलावटी उत्पाद बाजार में पहुंच रहे हैं, तो इसका सीधा असर लाखों लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है. ऐसे में यदि एफडीए आयुक्त के रूप में तुकाराम मुंढे निरीक्षण करते हैं, लाइसेंस नियमों की जांच करते हैं और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं, तो यह कोई सनसनीखेज काम नहीं बल्कि उनका संवैधानिक और प्रशासनिक दायित्व है. वास्तव में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मुंढे कार्रवाई क्यों कर रहे हैं. सवाल यह होना चाहिए कि उनके आने से पहले नियमों का पालन क्यों नहीं हो रहा था?
आज भारतीय राजनीति और प्रशासन दोनों में एक बड़ी समस्या यह है कि कई लोग लोकप्रिय बनने की कोशिश करते हैं, लेकिन जवाबदेह बनने की नहीं. तुकाराम मुंढे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने लोकप्रियता की बजाय जवाबदेही को प्राथमिकता दी. कई बार उनके निर्णय लोगों को कठोर लग सकते हैं. कई व्यापारी, राजनीतिक कार्यकर्ता या प्रभावशाली समूह उनकी कार्यशैली से असहमत हो सकते हैं. लेकिन प्रशासन का उद्देश्य हर किसी को खुश रखना नहीं होता. प्रशासन का उद्देश्य कानून को समान रूप से लागू करना होता है. यदि नियम गरीब के लिए हैं तो अमीर के लिए भी होने चाहिए. यदि लाइसेंस की शर्तें छोटे व्यवसायी पर लागू होती हैं तो बड़े प्रतिष्ठानों पर भी होनी चाहिए. यदि कानून का पालन आम नागरिक को करना है तो प्रभावशाली लोगों को भी उससे छूट नहीं मिलनी चाहिए. मुंढे की कार्यशैली इसी सिद्धांत पर आधारित दिखाई देती है. ऐसे अधिकारी व्यवस्था की आवश्यकता हैं.
यह सच है कि किसी भी लोकतंत्र में व्यक्ति व्यवस्था से बड़ा नहीं हो सकता. मजबूत संस्थाएं ही अच्छे शासन की पहचान होती हैं. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि संस्थाओं को मजबूत बनाने के लिए कुछ लोगों को पहल करनी पड़ती है. यदि हर अधिकारी यह सोचकर चुप बैठ जाए कि व्यवस्था स्वयं सुधर जाएगी, तो परिवर्तन कभी संभव नहीं होगा. भारत के प्रशासनिक इतिहास में टी.एन. शेषन, ई. श्रीधरन, किरण बेदी, अशोक खेमका और अनेक अधिकारियों ने अपने-अपने क्षेत्र में स्थापित व्यवस्थाओं को चुनौती दी. इन सभी के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन एक बात समान थी, उन्होंने सुविधा की बजाय कर्तव्य को चुना. तुकाराम मुंढे भी उसी परंपरा का हिस्सा हैं.
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम ईमानदार अधिकारियों की प्रशंसा तो करते हैं, लेकिन उनके द्वारा लागू किए गए नियमों का पालन स्वयं नहीं करना चाहते. हम चाहते हैं कि भ्रष्टाचार खत्म हो, लेकिन व्यक्तिगत लाभ के लिए शॉर्टकट भी तलाशते रहते हैं. हम चाहते हैं कि व्यवस्था सुधरे, लेकिन नियम हमारे ऊपर लागू न हों. जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक तुकाराम मुंढे जैसे अधिकारी आते रहेंगे, संघर्ष करते रहेंगे और व्यवस्था के भीतर अकेले लड़ते रहेंगे. समाज को यह समझना होगा कि सुशासन केवल सरकार या अधिकारियों की जिम्मेदारी नहीं है. नागरिक अनुशासन, सामाजिक जिम्मेदारी और कानून के प्रति सम्मान भी उतना ही आवश्यक है. यदि समाज स्वयं नियमों का पालन करने लगे, तो किसी अधिकारी को कठोर बनने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.
तुकाराम मुंढे को केवल एक अधिकारी के रूप में देखना उनकी भूमिका को सीमित करना होगा. वे उस संघर्ष का प्रतीक हैं जो नियमों और अव्यवस्था, जवाबदेही और लापरवाही, कानून और प्रभावशाली हितों के बीच लगातार चलता रहता है. उनकी कार्यशैली पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि ऐसे अधिकारी व्यवस्था को झकझोरते हैं, प्रशासन को सक्रिय करते हैं और समाज को यह याद दिलाते हैं कि कानून केवल किताबों में लिखी हुई पंक्तियां नहीं, बल्कि नागरिक जीवन का आधार हैं. आज जब व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास कई बार डगमगाता दिखाई देता है, तब तुकाराम मुंढे जैसे अधिकारी यह संदेश देते हैं कि शासन केवल आदेशों से नहीं, बल्कि साहस, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से चलता है. यदि भारत को वास्तव में पारदर्शी, जवाबदेह और नियम-आधारित लोकतंत्र बनाना है, तो ऐसे अधिकारियों की संख्या बढ़नी चाहिए, न कि उनकी प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिह्न लगाया जाना चाहिए.