स्वजीवन को सेवा-विश्वविद्यालय में रूपांतरित करने वाले कुलपति दादासाहेब कालमेघ

29वीं पुण्यतिथि पर विशेष लेख

पृथ्वी पर समाज जागरण, जनकल्याण और मानव उत्थान के महान कार्य ईश्वर की प्रेरणा से महामानवों के माध्यम से संपन्न होते हैं. ऐसे महामानवों को बचपन में ही अपने जीवन का उद्देश्य और कार्य समझ में आ जाता है. यही कारण है कि वे समाज के लिए प्रेरणा और आदर्श बनकर अविस्मरणीय कार्यों के धनी बनते हैं. ऐसे ही एक संवेदनशील, करुणाशील और समाजसेवा को समर्पित महामानव थे राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति तथा श्री शिवाजी शिक्षण संस्था, अमरावती के पूर्व अध्यक्ष प्रा. वासुदेव मोतीरामजी उपाख्य दादासाहेब कालमेघ.
उनके जीवन के अनेक प्रसंग और घटनाएं आज भी समाज प्रबोधन के लिए अत्यंत प्रेरणादायी हैं. जन्म के बाद माता-पिता की छत्रछाया में बाल्यकाल व्यतीत करने के पश्चात उपलब्ध परिस्थितियों में सर्वांगीण विकास की दिशा में आगे बढ़ना ही जीवन की पहली परीक्षा होती है. दादासाहेब कालमेघ ने अपने जीवन के आरंभिक दिनों से ही अपनी तीक्ष्ण बुद्धिमत्ता और संघर्षशीलता का परिचय दिया.
आर्थिक कठिनाइयों के कारण परिवार को जिन परिस्थितियों में आश्रय लेना पड़ा, वहां बालक वासुदेव ने अपनी शारीरिक क्षमता के अनुरूप श्रम करना शुरू किया. क्या यह राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज की ग्रामगीता को सच्ची श्रद्धांजलि नहीं थी? शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध न होने के बावजूद उन्होंने भौगोलिक और आर्थिक कठिनाइयों को पराजित करते हुए प्राथमिक शिक्षा पूरी की और फिर शिक्षण महर्षि डॉ. पंजाबराव उपाख्य भाऊसाहेब देशमुख के शैक्षणिक संस्थान का द्वार खटखटाया. यह मानो नियति द्वारा निर्धारित मार्ग था. निष्काम कर्मयोगी डॉ. भाऊसाहेब देशमुख ने वासुदेव की प्रतिभा और शिक्षा प्राप्त करने की तीव्र जिज्ञासा को पहचान लिया. उन्होंने उन्हें सदानंद छात्रावास में प्रवेश देकर जीवन का नया मार्ग प्रदान किया. डॉ. देशमुख की अपेक्षाओं के अनुरूप वासुदेव कालमेघ केवल छात्र ही नहीं रहे, बल्कि छात्रावास के अनुशासित सेवक भी बने.
अंजनगांव (सुर्जी) के निकट स्थित जन्मगांव चौसाला से वरुड (बोंदरे) और फिर अमरावती के श्रद्धानंद छात्रावास तक का उनका संघर्षपूर्ण सफर अत्यंत कठिन था. किंतु इस यात्रा ने उनके मन को इतना मजबूत बना दिया कि जीवन की कोई भी चुनौती उन्हें विचलित नहीं कर सकी. आज कठिन परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त कर रहे प्रत्येक विद्यार्थी के लिए उनका जीवन एक प्रेरक उदाहरण है. आज शासन द्वारा संचालित अर्न एंड लर्न योजना को आधुनिक शिक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है, लेकिन दादासाहेब ने दशकों पहले ही इसे अपने जीवन में अपनाया था. छात्रावास में सेवा करके उसी से शिक्षा का खर्च जुटाना उनकी दूरदर्शिता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक था.
उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्होंने सागर विश्वविद्यालय और बाद में आईआईटी खड़गपुर का रुख किया. इसके बाद नागपुर के प्रतिष्ठित लक्ष्मीनारायण इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एल.आई.टी.) में प्राध्यापक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की. सन् 1978 में दादासाहेब कालमेघ नागपुर विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए. वे उस समय देश के सबसे कम आयु के कुलपतियों में गिने जाते थे. विश्वविद्यालय में उन्होंने अनुशासन, प्रशासनिक दक्षता और दूरदर्शी नेतृत्व का परिचय दिया. राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के प्रारंभिक विस्तार में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा और वे इस योजना के पहले विश्वविद्यालय समन्वयकों में शामिल थे.
कुलपति पद के बाद उन्हें श्री शिवाजी शिक्षण संस्था, अमरावती के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी मिली. लगभग दस वर्षों तक उन्होंने इस संस्था का नेतृत्व किया और अध्यक्ष पद की एक नई परिभाषा स्थापित की. उन्होंने संस्था के आजीवन सदस्यों को सम्मान और प्रतिष्ठा प्रदान कर उनकी भूमिका को नई ऊंचाई दी. दादासाहेब ने महाराष्ट्र में शिक्षा के प्रचार-प्रसार को नई दिशा दी. उनके मार्गदर्शन में अनेक शिक्षण संस्थाएं विकसित हुईं. डॉक्टर, प्राध्यापक, शिक्षक, समाजसेवक, कृषि विशेषज्ञ और राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा. वे विद्यार्थियों को हमेशा आत्मनिर्भर बनने की सीख देते थे. उनका स्पष्ट संदेश था-काम करो, पसीना बहाओ और उसी के बल पर उच्च शिक्षा प्राप्त करो. वे जीवनभर स्वाभिमान और सम्मान के साथ जीने की प्रेरणा देते रहे.
विश्वविख्यात शिक्षाविद् और बहु-डिग्रीधारी डॉ. श्रीकांत जिचकार दादासाहेब के विचारों से अत्यंत प्रभावित थे. यह उनके व्यक्तित्व की महानता का एक बड़ा उदाहरण है. विदर्भवीर जांबुवंतराव धोटे उनके घनिष्ठ मित्र थे, जबकि भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा से उनके अत्यंत निकट संबंध थे. राष्ट्रीय सेवा योजना में उनके नेतृत्व के कारण नागपुर विश्वविद्यालय को देशभर में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ. उल्लेखनीय बात यह रही कि इतने महत्वपूर्ण कार्य के लिए उन्होंने कभी कोई मानदेय स्वीकार नहीं किया. वे सच्चे अर्थों में निष्काम कर्मयोगी थे. विज्ञान के प्राध्यापक होते हुए भी उन्होंने अध्यात्म के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया. भारवाडी के संत सत्यदेव बाबा उनके आध्यात्मिक गुरु थे. विदर्भ के संत वासुदेव महाराज और संत अच्युत महाराज से भी उनके आत्मीय संबंध थे, जिससे उनके आध्यात्मिक चिंतन को और अधिक गहराई मिली.
दादासाहेब के निधन के बाद उनके दोनों पुत्रों ने भी संघर्षपूर्ण परिस्थितियों का सामना करते हुए नागपुर में उनके नाम पर दंत चिकित्सा महाविद्यालय की स्थापना की. आज यह संस्थान अपनी गुणवत्ता, शैक्षणिक स्तर, राष्ट्रीय मूल्यांकन और उपलब्धियों के कारण प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका है. प्रत्येक वर्ष 29 जुलाई को नागपुर और अमरावती में एक साथ आयोजित होने वाले स्मृति समारोहों में आज भी बड़ी संख्या में लोग उपस्थित होते हैं. यह उनके प्रति समाज के प्रेम, सम्मान और श्रद्धा का प्रमाण है. मेरे जैसे अनेक विद्यार्थी, जो डॉ. भाऊसाहेब देशमुख की शिक्षण परंपरा से जुड़े रहे हैं, दादासाहेब कालमेघ को अपना प्रेरणास्रोत और आदर्श मानते हैं. अपने जीवन को समाज के लिए एक सेवा-विश्वविद्यालय में रूपांतरित करने वाले इस महामानव को उनकी 29वीं पुण्यतिथि पर मैं विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं.
– प्रो. गजानन रामकृष्ण भारसाकले
अध्यक्ष, माजी विद्यार्थी संघटना
अभियांत्रिकी एवं तंत्रज्ञान महाविद्यालय, अकोला
मो. 9552226925

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