वरुड बगाजी में महालक्ष्मी उत्सव की 119 वर्ष पुरानी परंपरा
वर्धा नदी के जरिए महालक्ष्मी के दर्शन की रही अनूठी परंपरा

धामणगांव रेलवे/दि.15 – तहसील के वरुड (बगाजी) गांव में एड. प्रदीप देशमुख के यहां आयोजित होने वाले महालक्ष्मी उत्सव की परंपरा इस वर्ष 119वें वर्ष में प्रवेश कर रही है. अमरावती जिले के वरुड (बगाजी) और आसपास के ग्रामीणों के लिए यह उत्सव आस्था और सामाजिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है.
बताया जाता है कि प्रगतिशील किसान कर्मयोगी स्व. बापूरावजी उर्फ काकासाहेब देशमुख ने करीब एक सदी पहले आर्थिक रूप से कमजोर, पिछड़े वर्ग, आदिवासी, किसान और खेत मजदूर परिवारों के लिए अपने वाड़े में महाप्रसाद की परंपरा शुरू की थी. आज भी उनके सुपुत्र एड. प्रदीप देशमुख इस परंपरा को श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ा रहे हैं. महालक्ष्मी के अवसर पर ग्रामीणों को भोजन के साथ मिष्ठान्न और आंबील का प्रसाद दिया जाता है. इस दिन कई घरों में महालक्ष्मी की स्थापना होने के कारण अलग चूल्हा नहीं जलाने की भी परंपरा है.
इस वर्ष महालक्ष्मी उत्सव 17, 18 और 19 सितंबर को अनुराधा नक्षत्र के अवसर पर आयोजित किया जाएगा. उत्सव के दौरान मानकरी परिवारों को भोजन का निमंत्रण दिया जाता है. पहले दिन आरती के साथ महालक्ष्मी का आगमन होता है. दूसरे दिन 16 प्रकार की सब्जियों, मिष्ठान्न और आंबील का नैवेद्य अर्पित किया जाता है. आघाड़ा, केना, दूर्वा और सुगंधित फूल भी अर्पित किए जाते हैं. तीसरे दिन सुहागिन महिलाओं द्वारा ओटी भरकर पूजा की जाती है, जबकि चौथे दिन आंबील और फलों का प्रसाद वितरित कर कार्यक्रम का समापन होता है. नवविवाहित जोड़ों के हाथों आरती कराने की भी परंपरा है.
ग्रामीणों के अनुसार, देशमुख परिवार में यह महालक्ष्मी उत्सव करीब 312 वर्षों से मनाया जा रहा है और इसकी परंपरा ऐतिहासिक भोंसलेकाल से जुड़ी मानी जाती है. पहले यह उत्सव देशमुख परिवार की ऐतिहासिक गढ़ी में आयोजित होता था. यह गढ़ी अब बगाजी सागर बांध में समा चुकी है. ग्रामीण बताते हैं कि गढ़ी में करीब 100 फुट ऊंचे चार बड़े बुर्ज थे और पूर्वी बुर्ज के पास स्थित चौक में महालक्ष्मी की स्थापना की जाती थी.
* वर्धा नदी से दर्शन की अनूठी परंपरा
इस उत्सव से जुड़ी सबसे खास परंपरा वर्धा नदी से जुड़ी रही है. ग्रामीणों के अनुसार, पांच वर्ष में एक बार वर्धा नदी, जिसका पौराणिक नाम वशिष्ठा बताया जाता है, बाढ़ के दौरान देशमुखों के वाड़े तक पहुंचती थी और इसी दौरान महालक्ष्मी के दर्शन होने को श्रद्धालु सौभाग्य मानते थे. इस अवसर को ग्रामीणों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता था. महालक्ष्मी उत्सव के अवसर पर इस वर्ष खंजेरी भजन प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया है.





