पूर्वी विदर्भ में छह साल में 25 हजार लड़कियां कम जन्मीं

बढ़ी सामाजिक चिंता

नागपुर /दि.12- पूर्वी विदर्भ में जन्म के समय लड़का-लड़की अनुपात में लगातार असंतुलन चिंता का विषय बनता जा रहा है. स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली के आंकड़ों के अनुसार पिछले छह वर्षों में क्षेत्र में लड़कों की तुलना में 25,036 कम लड़कियां जन्मी हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति आगे भी बनी रही तो आने वाले वर्षों में विवाह योग्य युवकों के लिए जीवनसाथी तलाशना कठिन हो सकता है.
आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020-21 से 2025-26 के दौरान नागपुर, भंडारा, चंद्रपुर, गड़चिरोली, गोंदिया और वर्धा जिलों में कुल 4,71,918 लड़कों तथा 4,46,882 लड़कियों का जन्म हुआ. इस अवधि में प्रति एक हजार लड़कों पर औसतन केवल 947 लड़कियां जन्मीं, जो प्राकृतिक संतुलित अनुपात से कम माना जा रहा है. सबसे अधिक अंतर नागपुर जिले में दर्ज किया गया, जहां छह वर्षों में 2,07,628 लड़कों के मुकाबले 1,98,066 लड़कियां जन्मीं. यानी जिले में लड़कों की तुलना में 9,562 लड़कियां कम पैदा हुईं. विशेषज्ञों का कहना है कि जनसांख्यिकी में इस स्थिति को मैरेज स्क्वीज़ कहा जाता है. जब किसी पीढ़ी में पुरुषों की संख्या महिलाओं से अधिक होती है, तब विवाह के लिए उपयुक्त जीवनसाथी मिलने में कठिनाई बढ़ जाती है. इससे विवाह की आयु बढ़ने, अविवाहित पुरुषों की संख्या में वृद्धि, महिलाओं के पलायन तथा विभिन्न सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं की आशंका बढ़ जाती है. डॉ. उदय नारलावार ने कहा कि केवल आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भविष्य में हजारों पुरुषों का विवाह नहीं हो पाएगा, क्योंकि प्रवास, मृत्यु दर और अन्य सामाजिक कारक भी प्रभाव डालते हैं. हालांकि, लगातार गिरता लिंगानुपात निश्चित रूप से चिंता का विषय है. विशेषज्ञों का मानना है कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान और लिंग चयन रोकने के लिए बनाए गए कानूनों के बावजूद अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा है. इसलिए कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ समाज की सोच में बदलाव लाना भी आवश्यक है, ताकि बेटियों के जन्म को समान सम्मान और स्वीकृति मिल सके.

Back to top button